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Chalisa · Shiv ji

Shri Bhairav Chalisa

श्री भैरव चालीसा

41 lines · 51 Chalisa Sangraha evam Aartiyan (Randhir Prakashan, Haridwar), book p64–67

Shiv ji

Shiv ji

The still centre; Monday's deity

Opening doha

श्री भैरव संकट हरन, मंगल करन कृपालु।

करहु दया निज दास पे, निशिदिन दीनदयालु।

Chaupai

1

जय डमरूधर नयन विशाला, श्याम वर्ण, वपु महा कराला।

2

जय त्रिशूलधर जय डमरूधर, काशी कोतवाल, संकटहर।

3

जय गिरिजासुत परमकृपाला, संकटहरण, हरहु भ्रमजाला।

4

जयति बटुक भैरव भयहारी, जयति काल भैरव बलधारी।

5

अष्टरूप तुम्हरे सब गायें, सफल एक ते एक सिवाये।

6

शिवस्वरूप शिव के अनुगामी, गणाधीश तुम सबके स्वामी।

7

जटाजूट पर मुकुट सुहावै।
भालचन्द्र अति शोभा पावै।

8

कटि करधनी घुँघुरू बाजैं, दर्शन करत सकल भय भाजैं।

9

कर त्रिशूल डमरू अति सुन्दर, मोरपंख को चंवर मनोहर।

10

खप्पर खड्ग लिए बलवाना, रूप चतुर्भुज नाथ बखाना।

11

वाहन श्वान सदा सुखरासी, तुम अनन्त प्रभु तुम अविनासी।

12

जय जय जय भैरव भय भंजन, जय कृपालु भक्तन मनरंजन।

13

नयन विशाल लाल अति भारी, रक्तवर्ण तुम अहहु पुरारी।

14

बं बं बं बोलत दिनराती, शिव कहँ भजहु असुर आराती।

15

एकरूप तुम शम्भु कहाये, दूजे भैरव रूप बनाये।

16

सेवक तुमहिं तुमहिं प्रभु स्वामी, सब जग के तुम अन्तर्यामी।

17

रक्तवर्ण वपु अहहि तुम्हारा, श्यामवर्ण कहुँ होइ प्रचारा।

18

श्वेतवर्ण पुनि कहा बखानी, तीनि वर्ण तुम्हरे गुणखानी।

19

तीनि नयन प्रभु परम सुहावहिं, सुरनर मुनि सब ध्यान लगावहिं।

20

व्याघ्र चर्मधर तुम जग स्वामी, प्रेतनाथ तुम पूर्ण अकामी।

21

चक्रनाथ नकुलेश प्रचण्डा, निमिष दिगम्बर कीरति चण्डा।

22

क्रोधवत्स भूतेश कालधर, चक्रतुण्ड दशबाहु व्यालधर।

23

अहहिं कोटि प्रभु नाम तुम्हारे, जपत सदा मेटत दुःख भारे।

24

चौंसठ योगिनी नाचहिं संगा, क्रोधवान तुम अति रणरंगा।

25

भूतनाथ तुम परम पुनीता, तुम भविष्य तुम अहहु अतीता।

26

वर्तमान तुम्हरो शुचि रूपा, कालमयी तुम परम अनूपा।

27

ऐलादी को संकट टार्यो, साद भक्त को कारज सार्यो।

28

कालीपुत्र कहावहु नाथा, तब चरणन नावहुं नित माथा।

29

श्रीक्रोधेश कृपा विस्तारहु, दीन जानि मोहि पार उतारहु।

30

भवसागर बूढ़त दिनराती, होहु कृपालु दुष्ट आराती।

31

सेवक जानि कृपा प्रभु कीजै, मोहिं भगति अपनी अब दीजै।

32

करहुँ सदा भैरव की सेवा, तुम समान दूजो को देवा।

33

अश्वनाथ तुम परम मनोहर, दुष्टन कहँ प्रभु अहहु भयंकर।

34

तुम्हरो दास जहाँ जो होई, ताकहँ संकट परे न कोई।

35

हरहु नाथ तुम जन की पीरा, तुम समान प्रभु को बलवीरा।

36

सब अपराध क्षमा करि दीजै, दीन जानि आपुन मोहिं कीजै।

37

जो यह पाठ करे चालीसा, तापै कृपा करहु जगदीशा।

Closing doha

जय भैरव जय भूतपति जय जय जय सुखकन्द।

करहु कृपा नित दास पे, देहु सदा आनन्द।