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Aarti

Jai Shri Rani Sati Maiya

आरती श्री राणीसती जी की

16 lines · 51 Chalisa Sangraha evam Aartiyan (Randhir Prakashan, Haridwar), book p287–288

जय श्री राणी सती मैया, जय जगदम्ब सती जी।

अपने भक्तजनों की दूर करो विपती॥

अपनि अनन्तर ज्योति अखण्डित मंडित चहुँककूंभा।

दुरजन दलन खडग की, विद्युतसम प्रतिभा॥

मरकत मणि मन्दिर अति मंजुल, शोभा लखि न बड़े।

ललित ध्वजा चहुँ ओर, कंचन कलश धरे॥

घण्टा घनन घड़ावल बाजत, शंख मृदंग घुरे।

किन्नर गायन करते, वेद ध्वनि उचरे॥

सप्त मातृका करें आरती, सुरगण ध्यान धरे।

विविध प्रकार के व्यंजन, श्री फल भेंट धरे॥

संकट विकट विदारणी, नाशनी हो कुमति।

सेवक जन हृदय पटले, मृदुल करन सुमति॥

अमल कमल दल लोचनी, मोचनी त्रय तापा।

दास आयो शरण आपकी, लाज रखो माता॥

श्री राणीसती मैयाजी की आरती, जो कोई नर गावे।

सदनसिद्धि नवनिधि, मनवांछित फल पावे॥