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Aarti

Jai Santoshi Mata

आरती श्री संतोषी माँ जी की

12 lines · 51 Chalisa Sangraha evam Aartiyan (Randhir Prakashan, Haridwar), book p240

जय संतोषी माता मैया जय संतोषी माता।
अपने सेवक जन को सुख सम्पत्ति दाता॥

सुन्दर चीर सुनहरी माँ धारण कीन्हों।
हीरा पन्ना दमके तन शृंगार लीन्हों॥

गेरू लाल छटा छवि बदन कमल सोहे।
मन्द हँसत करुणामयी त्रिभुवन जन मोहे॥

स्वर्ण सिंहासन बैठी चँवर ढुरे प्यारे।
धूप, दीप, मधुमेवा, भोग धरें न्यारे॥

गुड़ अरु चना परम प्रिय तामें संतोष कियो।
संतोषी कहलाई भक्तन वैभव दियो॥

शुक्रवार प्रिय मानत आज दिवस सोही।
भक्त मण्डली छाई कथा सुनत मोही॥

मन्दिर जगमग ज्योति मंगल ध्वनि छाई।
विनय करें हम बालक चरनन सिर नाई॥

भक्ति भावमय पूजा अंगीकृत कीजै।
जो मन बसै हमारे इच्छा फल दीजै॥

दुखी, दरिद्री, रोगी, संकटमुक्त किए।
बहु धन-धान्य भरे घर, सुख सौभाग्य दिए॥

ध्यान धर्यो जिस जन ने, मनवांछित फल पायो।
पूजा कथा श्रवण कर, घर आनंद आयो॥

शरण गहे की लज्जा, राखियो जगदंबे।
संकट तू ही निवारे, दयामयी अंबे॥

संतोषी माँ की आरती, जो कोई नर गावे।
ऋद्धि-सिद्धि सुख संपत्ति, जी भरकर पावे॥