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स्तोत्र · शिव जी

प्रदोष स्तोत्राष्टकम्

18 पंक्तियाँ · बोलने में लगभग 1 मिनट · Skanda Purana, Brahmottara Khanda 6.73–79

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शिव जी

शिव जी

शांत स्वरूप; सोमवार के देवता

१

सत्यं ब्रवीमि परलोकहितं ब्रवीमि सारं ब्रवीम्युपनिषद्धृदयं ब्रवीमि ।

satyaṁ bravīmi paralokahitaṁ bravīmi sāraṁ bravīmyupaniṣaddhr̥dayaṁ bravīmi .

मैं सत्य कहता हूँ, परलोक के हित की बात कहता हूँ, सार कहता हूँ, उपनिषदों का हृदय कहता हूँ —

संसारमुल्बणमसारमवाप्य जन्तोः सारोऽयमीश्वरपदाम्बुरुहस्य सेवा ॥

saṁsāramulbaṇamasāramavāpya jantoḥ sāro'yamīśvarapadāmburuhasya sevā .

इस कठोर और असार संसार में जीव के लिए सार यही है — ईश्वर के चरण-कमलों की सेवा।

२

ये नार्चयन्ति गिरिशं समये प्रदोषे ये नार्चितं शिवमपि प्रणमन्ति चान्ये ।

ye nārcayanti giriśaṁ samaye pradoṣe ye nārcitaṁ śivamapi praṇamanti cānye .

जो प्रदोष के समय गिरीश की पूजा नहीं करते, और जो दूसरों द्वारा पूजित शिव को प्रणाम तक नहीं करते,

एतत्कथां श्रुतिपुटैर्न पिबन्ति मूढास्ते जन्मजन्मसु भवन्ति नरा दरिद्राः ॥

etatkathāṁ śrutipuṭairna pibanti mūḍhāste janmajanmasu bhavanti narā daridrāḥ .

और जो मूढ़ इस कथा को कानों से नहीं पीते — वे जन्म-जन्म में दरिद्र रहते हैं।

३

ये वै प्रदोषसमये परमेश्वरस्य कुर्वन्त्यनन्यमनसोऽङ्घ्रिसरोजपूजाम् ।

ye vai pradoṣasamaye parameśvarasya kurvantyananyamanaso'ṅghrisarojapūjām .

जो प्रदोष के समय एकाग्र मन से परमेश्वर के चरण-कमलों की पूजा करते हैं,

नित्यं प्रवृद्धधनधान्यकलत्रपुत्रसौभाग्यसम्पदधिकास्त इहैव लोके ॥

nityaṁ pravr̥ddhadhanadhānyakalatraputrasaubhāgyasampadadhikāsta ihaiva loke .

वे इसी लोक में धन, धान्य, पत्नी, पुत्र, सौभाग्य और संपदा में सदा बढ़ते रहते हैं।

४

कैलासशैलभवने त्रिजगज्जनित्रीं गौरीं निवेश्य कनकाञ्चितरत्नपीठे ।

kailāsaśailabhavane trijagajjanitrīṁ gaurīṁ niveśya kanakāñcitaratnapīṭhe .

कैलास पर्वत के भवन में तीनों लोकों की जननी गौरी को सोने से जड़े रत्नों के आसन पर बिठाकर,

नृत्यं विधातुमभिवाञ्छति शूलपाणौ देवाः प्रदोषसमयेऽनुभजन्ति सर्वे ॥

nr̥tyaṁ vidhātumabhivāñchati śūlapāṇau devāḥ pradoṣasamaye'nubhajanti sarve .

जब त्रिशूलधारी प्रदोष के समय नृत्य करना चाहते हैं, तब सब देवता उनकी सेवा में आ जुटते हैं।

५

वाग्देवी धृतवल्लकी शतमखो वेणुं दधत्पद्मजस्तालोन्निद्रकरो रमा भगवती गेयप्रयोगान्विता ।

vāgdevī dhr̥tavallakī śatamakho veṇuṁ dadhatpadmajastālonnidrakaro ramā bhagavatī geyaprayogānvitā .

वाग्देवी सरस्वती वीणा लिए हैं, इंद्र बाँसुरी, ब्रह्मा जी ताल देते हैं, और भगवती लक्ष्मी गायन करती हैं;

विष्णुः सान्द्रमृदङ्गवादनपटुर्देवाः समन्तात्स्थिताः सेवन्ते तमनु प्रदोषसमये देवं मृडानीपतिम् ॥

viṣṇuḥ sāndramr̥daṅgavādanapaṭurdevāḥ samantātsthitāḥ sevante tamanu pradoṣasamaye devaṁ mr̥ḍānīpatim .

विष्णु जी गंभीर मृदंग बजाते हैं, और चारों ओर देवता खड़े हैं — इस प्रकार प्रदोष के समय सब मृडानीपति शिव की सेवा करते हैं।

६

गन्धर्वयक्षपतगोरगसिद्धसाध्या विद्याधरामरवराप्सरसां गणांश्च ।

gandharvayakṣapatagoragasiddhasādhyā vidyādharāmaravarāpsarasāṁ gaṇāṁśca .

गंधर्व, यक्ष, पक्षी, नाग, सिद्ध, साध्य, विद्याधर, देवता और अप्सराओं के समूह,

येऽन्ये त्रिलोकनिलयाः सहभूतवर्गाः प्राप्ते प्रदोषसमये हरपार्श्वसंस्थाः ॥

ye'nye trilokanilayāḥ sahabhūtavargāḥ prāpte pradoṣasamaye harapārśvasaṁsthāḥ .

और तीनों लोकों में रहने वाले अन्य सब, भूतगणों सहित — प्रदोष का समय आते ही हर के पास आ खड़े होते हैं।

७

अतः प्रदोषे शिव एक एव पूज्योऽथ नान्ये हरिपद्मजाद्याः ।

ataḥ pradoṣe śiva eka eva pūjyo'tha nānye haripadmajādyāḥ .

इसलिए प्रदोष में केवल शिव ही पूजनीय हैं, हरि, ब्रह्मा आदि अन्य नहीं;

तस्मिन्महेशे विधिनेज्यमाने सर्वे प्रसीदन्ति सुराधिनाथाः ॥

tasminmaheśe vidhinejyamāne sarve prasīdanti surādhināthāḥ .

क्योंकि विधि से महेश की पूजा होने पर सब देवताओं के स्वामी प्रसन्न हो जाते हैं।

८

एष ते तनयः पूर्वजन्मनि ब्राह्मणोत्तमः ।

eṣa te tanayaḥ pūrvajanmani brāhmaṇottamaḥ .

"तुम्हारा यह पुत्र पिछले जन्म में श्रेष्ठ ब्राह्मण था;

प्रतिग्रहैर्वयो निन्ये न दानाद्यैः सुकर्मभिः ॥

pratigrahairvayo ninye na dānādyaiḥ sukarmabhiḥ .

उसने अपना जीवन दान लेने में बिताया, दान आदि शुभ कर्मों में नहीं।

९

अतो दारिद्र्यमापन्नः पुत्रस्ते द्विजभामिनि ।

ato dāridryamāpannaḥ putraste dvijabhāmini .

हे ब्राह्मणी, इसी कारण तुम्हारा पुत्र दरिद्रता में पड़ा है;

तद्दोषपरिहारार्थं शरणं यातु शङ्करम् ॥

taddoṣaparihārārthaṁ śaraṇaṁ yātu śaṅkaram .

उस दोष को दूर करने के लिए वह शंकर की शरण में जाए।"