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स्तोत्र · शिव जी

प्रदोष स्तोत्र

28 पंक्तियाँ · बोलने में लगभग 1 मिनट · Skanda Purana, Brahmottara Khanda 7.59–66

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शिव जी

शिव जी

शांत स्वरूप; सोमवार के देवता

१

जय देव जगन्नाथ जय शङ्कर शाश्वत ।

jaya deva jagannātha jaya śaṅkara śāśvata .

जय हो देव, जगत के नाथ; जय हो शंकर, शाश्वत;

जय सर्वसुराध्यक्ष जय सर्वसुरार्चित ॥

jaya sarvasurādhyakṣa jaya sarvasurārcita .

जय हो सब देवताओं के अध्यक्ष; जय हो, जिनकी सब देवता पूजा करते हैं।

२

जय सर्वगुणातीत जय सर्ववरप्रद ।

jaya sarvaguṇātīta jaya sarvavaraprada .

जय हो सब गुणों से परे; जय हो सब वर देने वाले;

जय नित्य निराधार जय विश्वम्भराव्यय ॥

jaya nitya nirādhāra jaya viśvambharāvyaya .

जय हो नित्य, निराधार; जय हो विश्व को धारण करने वाले, अविनाशी।

३

जय विश्वैकवेद्येश जय नागेन्द्रभूषण ।

jaya viśvaikavedyeśa jaya nāgendrabhūṣaṇa .

जय हो, विश्व में जानने योग्य एक ईश्वर; जय हो नागराज को आभूषण बनाने वाले;

जय गौरीपते शम्भो जय चन्द्रार्धशेखर ॥

jaya gaurīpate śambho jaya candrārdhaśekhara .

जय हो गौरीपति शंभु; जय हो, जिनके मस्तक पर अर्धचंद्र है।

४

जय कोट्यर्कसङ्काश जयानन्तगुणाश्रय ।

jaya koṭyarkasaṅkāśa jayānantaguṇāśraya .

जय हो करोड़ों सूर्यों के समान तेजस्वी; जय हो अनंत गुणों के आश्रय;

जय रुद्र विरूपाक्ष जयाचिन्त्य निरञ्जन ॥

jaya rudra virūpākṣa jayācintya nirañjana .

जय हो विरूपाक्ष रुद्र; जय हो अचिंत्य, निरंजन।

५

जय नाथ कृपासिन्धो जय भक्तार्तिभञ्जन ।

jaya nātha kr̥pāsindho jaya bhaktārtibhañjana .

जय हो नाथ, कृपा के सागर; जय हो भक्तों का दुःख तोड़ने वाले;

जय दुस्तरसंसारसागरोत्तारण प्रभो ॥

jaya dustarasaṁsārasāgarottāraṇa prabho .

जय हो प्रभु, इस दुस्तर संसार-सागर से पार उतारने वाले।

६

प्रसीद मे महादेव संसारार्तस्य खिद्यतः ।

prasīda me mahādeva saṁsārārtasya khidyataḥ .

महादेव, मुझ पर प्रसन्न होइए — संसार के दुःख से पीड़ित और थके मन पर।

सर्वपापभयं हृत्वा रक्ष मां परमेश्वर ॥

sarvapāpabhayaṁ hr̥tvā rakṣa māṁ parameśvara .

सारे पापों का भय हरकर मेरी रक्षा कीजिए, परमेश्वर।

७

महादारिद्र्यमग्नस्य महापापहतस्य च ।

mahādāridryamagnasya mahāpāpahatasya ca .

मैं घोर दरिद्रता में हूँ, बड़े पापों से आहत हूँ,

महाशोकविनष्टस्य महारोगातुरस्य च ॥

mahāśokavinaṣṭasya mahārogāturasya ca .

गहरे शोक से व्याकुल हूँ, बड़े रोगों से पीड़ित हूँ,

८

ऋणभारपरीतस्य दह्यमानस्य कर्मभिः ।

r̥ṇabhāraparītasya dahyamānasya karmabhiḥ .

ऋण के भार तले हूँ, अपने कर्मों की आँच में हूँ,

ग्रहैः प्रपीड्यमानस्य प्रसीद मम शङ्कर ॥

grahaiḥ prapīḍyamānasya prasīda mama śaṅkara .

ग्रहों से पीड़ित हूँ — शंकर, मुझ पर प्रसन्न होइए।

९

दरिद्रः प्रार्थयेदेवं पूजान्ते गिरिजापतिम् ।

daridraḥ prārthayedevaṁ pūjānte girijāpatim .

निर्धन व्यक्ति पूजा के अंत में गिरिजापति से इस प्रकार प्रार्थना करे;

अर्थाढ्यो वापि राजा वा प्रार्थयेद्देवमीश्वरम् ॥

arthāḍhyo vāpi rājā vā prārthayeddevamīśvaram .

धनवान हो या राजा, वह भी ईश्वर देव से प्रार्थना करे।

१०

दीर्घमायुः सदारोग्यं कोशवृद्धिर्बलोन्नतिः ।

dīrghamāyuḥ sadārogyaṁ kośavr̥ddhirbalonnatiḥ .

"दीर्घ आयु, सदा आरोग्य, धन की वृद्धि और बल की उन्नति —

ममास्तु नित्यमानन्दः प्रसादात्तव शङ्कर ॥

mamāstu nityamānandaḥ prasādāttava śaṅkara .

और नित्य आनंद, हे शंकर, आपकी कृपा से ये मुझे प्राप्त हों।

११

शत्रवः संक्षयं यान्तु प्रसीदन्तु मम ग्रहाः ।

śatravaḥ saṁkṣayaṁ yāntu prasīdantu mama grahāḥ .

मेरे शत्रु नष्ट हों और मेरे ग्रह अनुकूल हों;

नश्यन्तु दस्यवो राष्ट्रे जनाः सन्तु निरापदः ॥

naśyantu dasyavo rāṣṭre janāḥ santu nirāpadaḥ .

राष्ट्र के लुटेरे नष्ट हों और सब लोग संकट से मुक्त रहें।

१२

दुर्भिक्षमारीसन्तापाः शमं यान्तु महीतले ।

durbhikṣamārīsantāpāḥ śamaṁ yāntu mahītale .

पृथ्वी पर अकाल, महामारी और संताप शांत हों;

सर्वसस्यसमृद्धिश्च भूयात्सुखमया दिशः ॥

sarvasasyasamr̥ddhiśca bhūyātsukhamayā diśaḥ .

सब फसलें भरपूर हों और सब दिशाएँ सुखमय हों।"

१३

एवमाराधयेद्देवं प्रदोषे गिरिजापतिम् ।

evamārādhayeddevaṁ pradoṣe girijāpatim .

इस प्रकार प्रदोष में गिरिजापति देव की आराधना करे;

ब्राह्मणान्भोजयेत्पश्चाद्दक्षिणाभिश्च तोषयेत् ॥

brāhmaṇānbhojayetpaścāddakṣiṇābhiśca toṣayet .

उसके बाद ब्राह्मणों को भोजन कराए और दक्षिणा देकर उन्हें संतुष्ट करे।

१४

सर्वपापक्षयकरी सर्वदारिद्र्यनाशिनी ।

sarvapāpakṣayakarī sarvadāridryanāśinī .

यह सब पापों का नाश करने वाली और सब दरिद्रता को मिटाने वाली है —

शिवपूजा मयाख्याता सर्वाभीष्टवरप्रदा ॥

śivapūjā mayākhyātā sarvābhīṣṭavarapradā .

मैंने जो शिव-पूजा बताई है, वह सब मनोवांछित वर देने वाली है।