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स्तोत्र · माँ दुर्गा

देवी कवच

59 पंक्तियाँ · Traditional; the Devi Kavach

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माँ दुर्गा

माँ दुर्गा

नवरात्रि की देवी

१

मार्कण्डेय उवाच ।
ॐ यद्गुह्यं परमं लोके सर्वरक्षाकरं नृणाम् ।
यन्न कस्यचिदाख्यातं तन्मे ब्रूहि पितामह॥

mārkaṇḍeya uvāca . oṁ yadguhyaṁ paramaṁ loke sarvarakṣākaraṁ nr̥ṇām . yanna kasyacidākhyātaṁ tanme brūhi pitāmaha.

मार्कण्डेय जी ने कहा — हे पितामह! संसार में जो परम गोपनीय है और मनुष्यों की सब प्रकार रक्षा करता है, जो आज तक किसी को नहीं बताया गया, वह मुझे बताइए।

२

ब्रह्मोवाच ।
अस्ति गुह्यतमं विप्र सर्वभूतोपकारकम् ।
देव्यास्तु कवचं पुण्यं तच्छृणुष्व महामुने॥

brahmovāca . asti guhyatamaṁ vipra sarvabhūtopakārakam . devyāstu kavacaṁ puṇyaṁ tacchr̥ṇuṣva mahāmune.

ब्रह्मा जी ने कहा — हे विप्र! सब प्राणियों का उपकार करने वाला एक परम गोपनीय साधन है — देवी का पुण्यमय कवच; हे महामुने, उसे सुनो।

३

प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्मचारिणी ।
तृतीयं चन्द्रघण्टेति कूष्माण्डेति चतुर्थकम्॥

prathamaṁ śailaputrī ca dvitīyaṁ brahmacāriṇī . tr̥tīyaṁ candraghaṇṭeti kūṣmāṇḍeti caturthakam.

पहली शैलपुत्री, दूसरी ब्रह्मचारिणी, तीसरी चन्द्रघण्टा और चौथी कूष्माण्डा।

४

पञ्चमं स्कन्दमातेति षष्ठं कात्यायनीति च ।
सप्तमं कालरात्रीति महागौरीति चाष्टमम्॥

pañcamaṁ skandamāteti ṣaṣṭhaṁ kātyāyanīti ca . saptamaṁ kālarātrīti mahāgaurīti cāṣṭamam.

पाँचवीं स्कन्दमाता, छठी कात्यायनी, सातवीं कालरात्रि और आठवीं महागौरी।

५

नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गाः प्रकीर्तिताः ।
उक्तान्येतानि नामानि ब्रह्मणैव महात्मना॥

navamaṁ siddhidātrī ca navadurgāḥ prakīrtitāḥ . uktānyetāni nāmāni brahmaṇaiva mahātmanā.

नौवीं सिद्धिदात्री — ये नवदुर्गा कही गई हैं। ये नाम स्वयं महात्मा ब्रह्मा ने कहे हैं।

६

अग्निना दह्यमानस्तु शत्रुमध्ये गतो रणे ।
विषमे दुर्गमे चैव भयार्त्ताः शरणं गताः॥

agninā dahyamānastu śatrumadhye gato raṇe . viṣame durgame caiva bhayārttāḥ śaraṇaṁ gatāḥ.

जो अग्नि में जल रहा हो, रण में शत्रुओं से घिरा हो, या किसी विषम संकट में पड़ा हो — ऐसे भयातुर जन जब देवी की शरण में जाते हैं,

७

न तेषां जायते किंचिदशुभं रणसंकटे ।
नापदं तस्य पश्यामि शोकदुःखभयं न हि॥

na teṣāṁ jāyate kiṁcidaśubhaṁ raṇasaṁkaṭe . nāpadaṁ tasya paśyāmi śokaduḥkhabhayaṁ na hi.

तो रण के संकट में उनका कुछ भी अशुभ नहीं होता। मैं उन पर कोई विपत्ति नहीं देखता, न शोक, न दुःख, न भय।

८

यैस्तु भक्त्या स्मृता नूनं तेषां वृद्धिः प्रजायते ।
ये त्वां स्मरन्ति देवेशि रक्षसे तान्न संशयः॥

yaistu bhaktyā smr̥tā nūnaṁ teṣāṁ vr̥ddhiḥ prajāyate . ye tvāṁ smaranti deveśi rakṣase tānna saṁśayaḥ.

जो भक्ति से देवी का स्मरण करते हैं, उनकी निश्चय ही वृद्धि होती है। हे देवेश्वरी, जो तुम्हें स्मरण करते हैं, तुम उनकी रक्षा करती हो — इसमें संदेह नहीं।

९

प्रेतसंस्था तु चामुण्डा वाराही महिषासना ।
ऐन्द्री गजसमारूढा वैष्णवी गरुडासना॥

pretasaṁsthā tu cāmuṇḍā vārāhī mahiṣāsanā . aindrī gajasamārūḍhā vaiṣṇavī garuḍāsanā.

चामुण्डा प्रेत पर विराजमान हैं, वाराही महिष पर, ऐन्द्री हाथी पर आरूढ़ हैं और वैष्णवी गरुड़ पर आसीन हैं।

१०

माहेश्वरी वृषारूढा कौमारी शिखिवाहना ।
लक्ष्मीः पद्मासना देवी पद्महस्ता हरिप्रिया॥

māheśvarī vr̥ṣārūḍhā kaumārī śikhivāhanā . lakṣmīḥ padmāsanā devī padmahastā haripriyā.

माहेश्वरी वृषभ पर आरूढ़ हैं, कौमारी मयूर पर; हरि की प्रिया लक्ष्मी देवी कमल पर बैठी हैं, हाथ में कमल लिए।

११

श्वेतरूपधरा देवी ईश्वरी वृषवाहना ।
ब्राह्मी हंससमारूढा सर्वाभरणभूषिता॥

śvetarūpadharā devī īśvarī vr̥ṣavāhanā . brāhmī haṁsasamārūḍhā sarvābharaṇabhūṣitā.

श्वेत रूप धारण करने वाली ईश्वरी देवी वृषभ पर सवार हैं; सब आभूषणों से सजी ब्राह्मी हंस पर आरूढ़ हैं।

१२

इत्येता मातरः सर्वाः सर्वयोगसमन्विताः ।
नानाभरणशोभाढ्या नानारत्नोपशोभिताः॥

ityetā mātaraḥ sarvāḥ sarvayogasamanvitāḥ . nānābharaṇaśobhāḍhyā nānāratnopaśobhitāḥ.

ये सब मातृशक्तियाँ समस्त योग-शक्तियों से सम्पन्न हैं, अनेक आभूषणों की शोभा से युक्त और अनेक रत्नों से सुशोभित हैं।

१३

दृश्यन्ते रथमारूढा देव्यः क्रोधसमाकुलाः ।
शङ्खं चक्रं गदां शक्तिं हलं च मुसलायुधम्॥

dr̥śyante rathamārūḍhā devyaḥ krodhasamākulāḥ . śaṅkhaṁ cakraṁ gadāṁ śaktiṁ halaṁ ca musalāyudham.

ये देवियाँ रथ पर आरूढ़ और क्रोध से भरी दिखाई देती हैं; ये शंख, चक्र, गदा, शक्ति, हल और मूसल,

१४

खेटकं तोमरं चैव परशुं पाशमेव च ।
कुन्तायुधं त्रिशूलं च शार्ङ्गमायुधमुत्तमम्॥

kheṭakaṁ tomaraṁ caiva paraśuṁ pāśameva ca . kuntāyudhaṁ triśūlaṁ ca śārṅgamāyudhamuttamam.

ढाल, तोमर, परशु, पाश, कुन्त, त्रिशूल और उत्तम शार्ङ्ग धनुष धारण करती हैं।

१५

दैत्यानां देहनाशाय भक्तानामभयाय च ।
धारयन्त्यायुधानीत्थं देवानां च हिताय वै॥

daityānāṁ dehanāśāya bhaktānāmabhayāya ca . dhārayantyāyudhānītthaṁ devānāṁ ca hitāya vai.

दैत्यों के शरीर के नाश के लिए, भक्तों को अभय देने के लिए और देवताओं के हित के लिए ये इन अस्त्रों को धारण करती हैं।

१६

नमस्तेऽस्तु महारौद्रे महाघोरपराक्रमे ।
महाबले महोत्साहे महाभयविनाशिनि॥

namaste'stu mahāraudre mahāghoraparākrame . mahābale mahotsāhe mahābhayavināśini.

हे महारौद्री, महाघोर पराक्रम वाली, महाबल और महान उत्साह वाली, महाभय का नाश करने वाली देवी — तुम्हें नमस्कार है।

१७

त्राहि मां देवि दुष्प्रेक्ष्ये शत्रूणां भयवर्द्धिनि ।
प्राच्यां रक्षतु मामैन्द्री आग्नेय्यामग्निदेवता॥

trāhi māṁ devi duṣprekṣye śatrūṇāṁ bhayavarddhini . prācyāṁ rakṣatu māmaindrī āgneyyāmagnidevatā.

हे देवी, जिन्हें देखना कठिन है और जो शत्रुओं का भय बढ़ाती हैं — मेरी रक्षा करो। पूर्व में ऐन्द्री और अग्निकोण में अग्निदेवता मेरी रक्षा करें।

१८

दक्षिणेऽवतु वाराही नैरृत्यां खड्गधारिणी ।
प्रतीच्यां वारुणी रक्षेद्वायव्यां मृगवाहिनी॥

dakṣiṇe'vatu vārāhī nairr̥tyāṁ khaḍgadhāriṇī . pratīcyāṁ vāruṇī rakṣedvāyavyāṁ mr̥gavāhinī.

दक्षिण में वाराही और नैर्ऋत्य में खड्गधारिणी रक्षा करें; पश्चिम में वारुणी और वायव्य में मृगवाहिनी मेरी रक्षा करें।

१९

उदीच्यां पातु कौमारी ऐशान्यां शूलधारिणी ।
ऊर्ध्वं ब्रह्माणि मे रक्षेदधस्ताद्वैष्णवी तथा॥

udīcyāṁ pātu kaumārī aiśānyāṁ śūladhāriṇī . ūrdhvaṁ brahmāṇi me rakṣedadhastādvaiṣṇavī tathā.

उत्तर में कौमारी और ईशान में शूलधारिणी रक्षा करें; ऊपर से ब्रह्माणी और नीचे से वैष्णवी मेरी रक्षा करें।

२०

एवं दश दिशो रक्षेच्चामुण्डा शववाहना ।
जया मे चाग्रतः पातु विजया पातु पृष्ठतः॥

evaṁ daśa diśo rakṣeccāmuṇḍā śavavāhanā . jayā me cāgrataḥ pātu vijayā pātu pr̥ṣṭhataḥ.

इस प्रकार शव पर सवार चामुण्डा दसों दिशाओं में रक्षा करें। जया आगे से और विजया पीछे से मेरी रक्षा करें।

२१

अजिता वामपार्श्वे तु दक्षिणे चापराजिता ।
शिखामुद्योतिनी रक्षेदुमा मूर्ध्नि व्यवस्थिता॥

ajitā vāmapārśve tu dakṣiṇe cāparājitā | śikhāṃ me dyotinī rakṣedumā mūrdhni vyavasthitā || 21 || [udyotinī]

अजिता बाएँ और अपराजिता दाएँ पार्श्व की रक्षा करें। द्योतिनी मेरी शिखा की रक्षा करें और मस्तक पर विराजमान उमा उसकी रक्षा करें।

२२

मालाधरी ललाटे च भ्रुवौ रक्षेद्यशस्विनी ।
त्रिनेत्रा च भ्रुवोर्मध्ये यमघण्टा च नासिके॥

mālādharī lalāṭe ca bhruvau rakṣedyaśasvinī | trinetrā ca bhruvormadhye yamaghaṇṭā ca nāsike || 22 ||

मालाधरी ललाट की और यशस्विनी भौंहों की रक्षा करें; त्रिनेत्रा भौंहों के बीच की और यमघण्टा नासिका की रक्षा करें।

२३

शङ्खिनी चक्षुषोर्मध्ये श्रोत्रयोर्द्वारवासिनी ।
कपोलौ कालिका रक्षेत् कर्णमूले तु शाङ्करी॥

śaṅkhinī cakṣuṣormadhye śrotrayordvāravāsinī | kapolau kālikā rakṣet karṇamūle tu śāṅkarī || 23 ||

शंखिनी दोनों नेत्रों के बीच की और द्वारवासिनी कानों की रक्षा करें; कालिका कपोलों की और शांकरी कानों की जड़ की रक्षा करें।

२४

नासिकायां सुगन्धा च उत्तरोष्ठे च चर्चिका ।
अधरे चामृताकला जिह्वायां च सरस्वती॥

nāsikāyāṃ sugandhā ca uttaroṣṭhe ca carcikā | adhare cāmṛtākalā jihvāyāṃ ca sarasvatī || 24 ||

सुगन्धा नासिका की और चर्चिका ऊपर के होंठ की रक्षा करें; अमृतकला नीचे के होंठ की और सरस्वती जिह्वा की रक्षा करें।

२५

दन्तान् रक्षतु कौमारी कण्ठमध्ये तु चण्डिका ।
घण्टिकां चित्रघण्टा च महामाया च तालुके॥

dantān rakṣatu kaumārī kaṇṭhamadhye tu caṇḍikā | ghaṇṭikāṃ citraghaṇṭā ca mahāmāyā ca tāluke || 25 ||

कौमारी दाँतों की और चण्डिका कण्ठ के मध्य की रक्षा करें; चित्रघण्टा कौए की और महामाया तालु की रक्षा करें।

२६

कामाक्षी चिबुकं रक्षेद्वाचं मे सर्वमङ्गला ।
ग्रीवायां भद्रकाली च पृष्ठवंशे धनुर्धरी॥

kāmākṣī cibukaṃ rakṣedvācaṃ me sarvamaṅgalā | grīvāyāṃ bhadrakālī ca pṛṣṭhavaṃśe dhanurdharī || 26 ||

कामाक्षी ठोड़ी की और सर्वमंगला मेरी वाणी की रक्षा करें; भद्रकाली गर्दन की और धनुर्धरी रीढ़ की रक्षा करें।

२७

नीलग्रीवा बहिःकण्ठे नलिकां नलकूबरी ।
स्कन्धयोः खड्गिनी रक्षेद्बाहू मे वज्रधारिणी॥

nīlagrīvā bahiḥkaṇṭhe nalikāṃ nalakūbarī | skandhayoḥ khaḍginī rakṣedbāhū me vajradhāriṇī || 27 ||

नीलग्रीवा कण्ठ के बाहरी भाग की और नलकूबरी कण्ठनली की रक्षा करें; खड्गिनी कंधों की और वज्रधारिणी मेरी भुजाओं की रक्षा करें।

२८

हस्तयोर्दण्डिनी रक्षेदम्बिका चाङ्गुलीषु च ।
नखाञ्छूलेश्वरी रक्षेत् कुक्षौ रक्षेत्कुलेश्वरी॥

hastayordaṇḍinī rakṣedambikā cāṅgulīṣu ca | nakhāñchūleśvarī rakṣet kukṣau rakṣennareśvarī || 28 || [kuleśvarī]

दण्डिनी दोनों हाथों की और अम्बिका उँगलियों की रक्षा करें; शूलेश्वरी नाखूनों की और नरेश्वरी उदर की रक्षा करें।

२९

स्तनौ रक्षेन्महादेवी मनः शोकविनाशिनी ।
हृदयं ललिता देवी उदरे शूलधारिणी॥

stanau rakṣenmahādevī manaḥ śokavināśinī | hṛdayaṃ lalitā devī udare śūladhāriṇī || 29 ||

महादेवी स्तनों की और शोकविनाशिनी मन की रक्षा करें; ललिता देवी हृदय की और शूलधारिणी पेट की रक्षा करें।

३०

नाभौ च कामिनी रक्षेद्गुह्यं गुह्येश्वरी तथा ।
भूतनाथा च मेढ्रं मे गुदे महिषवाहिनी॥

nābhau ca kāminī rakṣedguhyaṃ guhyeśvarī tathā | bhūtanāthā ca meḍhraṃ me ūrū mahiṣavāhinī || 30 || [gude]

कामिनी नाभि की और गुह्येश्वरी गुप्त अंगों की रक्षा करें; भूतनाथा मेढ्र की और महिषवाहिनी मेरी जाँघों की रक्षा करें।

३१

कट्यां भगवती रक्षेज्जानुनी विन्ध्यवासिनी ।
जङ्घे महाबला प्रोक्ता सर्वकामप्रदायिनी॥

kaṭyāṃ bhagavatī rakṣejjānunī vindhyavāsinī | jaṅghe mahābalā proktā sarvakāmapradāyinī || 31 ||

भगवती कमर की और विन्ध्यवासिनी घुटनों की रक्षा करें; सब कामनाएँ देने वाली महाबला पिंडलियों की रक्षा करें।

३२

गुल्फयोर्नारसिंही च पादपृष्ठामितौजसी ।
पादाङ्गुलीषु श्रीरक्षेत् पादाधःस्थलवासिनी॥

gulphayornārasiṃhī ca pādapṛṣṭhāmitaujasī | pādāṅgulīṣu śrīrakṣet pādādhaḥsthalavāsinī || 32 ||

नारसिंही टखनों की और अमितौजसी पैरों के ऊपरी भाग की रक्षा करें; श्री पैर की उँगलियों की और पादाधःस्थलवासिनी तलवों की रक्षा करें।

३३

नखान् दंष्ट्रा कराली च केशांश्चैवोर्ध्वकेशिनी ।
रोमकूपेषु कौबेरी त्वचं वागीश्वरी तथा॥

nakhān daṃṣṭrā karālī ca keśāṃścaivordhvakeśinī | romakūpeṣu kauberī tvacaṃ vāgīśvarī tathā || 33 ||

दंष्ट्राकराली पैर के नाखूनों की और ऊर्ध्वकेशिनी केशों की रक्षा करें; कौबेरी रोमकूपों की और वागीश्वरी त्वचा की रक्षा करें।

३४

रक्तमज्जावसामांसान्यस्थिमेदांसि पार्वती ।
अन्त्राणि कालरात्रिश्च पित्तं च मुकुटेश्वरी॥

raktamajjāvasāmāṃsānyasthimedāṃsi pārvatī | antrāṇi kālarātriśca pittaṃ ca mukuṭeśvarī || 34 ||

पार्वती रक्त, मज्जा, वसा, मांस, अस्थि और मेद की रक्षा करें; कालरात्रि आँतों की और मुकुटेश्वरी पित्त की रक्षा करें।

३५

पद्मावती पद्मकोशे कफे चूडामणिस्तथा ।
ज्वालामुखी नखज्वालामभेद्या सर्वसन्धिषु॥

padmāvatī padmakośe kaphe cūḍāmaṇistathā | jvālāmukhī nakhajvālāmabhedyā sarvasandhiṣu || 35 ||

पद्मावती मूलाधार आदि कमल-चक्रों की और चूड़ामणि कफ की रक्षा करें; ज्वालामुखी नाखूनों के तेज की और अभेद्या सब संधियों की रक्षा करें।

३६

शुक्रं ब्रह्माणि मे रक्षेच्छायां छत्रेश्वरी तथा ।
अहङ्कारं मनो बुद्धिं रक्षेन्मे धर्मधारिणी॥

śukraṃ brahmāṇi me rakṣecchāyāṃ chatreśvarī tathā | ahaṅkāraṃ mano buddhiṃ rakṣenme dharmadhāriṇī || 36 ||

ब्रह्माणी मेरे वीर्य की और छत्रेश्वरी छाया की रक्षा करें; धर्मधारिणी मेरे अहंकार, मन और बुद्धि की रक्षा करें।

३७

प्राणापानौ तथा व्यानमुदानं च समानकम् ।
वज्रहस्ता च मे रक्षेत्प्राणं कल्याणशोभना॥

prāṇāpānau tathā vyānamudānaṃ ca samānakam | vajrahastā ca me rakṣetprāṇaṃ kalyāṇaśobhanā || 37 ||

प्राण, अपान, व्यान, उदान और समान — इन पाँच प्राणों की वज्रहस्ता रक्षा करें; कल्याणशोभना मेरे प्राणों की रक्षा करें।

३८

रसे रूपे च गन्धे च शब्दे स्पर्शे च योगिनी ।
सत्त्वं रजस्तमश्चैव रक्षेन्नारायणी सदा॥

rase rūpe ca gandhe ca śabde sparśe ca yoginī | sattvaṃ rajastamaścaiva rakṣennārāyaṇī sadā || 38 ||

रस, रूप, गन्ध, शब्द और स्पर्श — इन विषयों में योगिनी रक्षा करें; सत्त्व, रज और तम की नारायणी सदा रक्षा करें।

३९

आयू रक्षतु वाराही धर्मं रक्षतु वैष्णवी ।
यशः कीर्तिं च लक्ष्मीं च धनं विद्यां च चक्रिणी॥

āyū rakṣatu vārāhī dharmaṃ rakṣatu vaiṣṇavī | yaśaḥ kīrtiṃ ca lakṣmīṃ ca dhanaṃ vidyāṃ ca cakriṇī || 39 ||

वाराही आयु की और वैष्णवी धर्म की रक्षा करें; चक्रिणी यश, कीर्ति, लक्ष्मी, धन और विद्या की रक्षा करें।

४०

गोत्रमिन्द्राणि मे रक्षेत्पशून्मे रक्ष चण्डिके ।
पुत्रान् रक्षेन्महालक्ष्मीर्भार्यां रक्षतु भैरवी॥

gotramindrāṇi me rakṣetpaśūnme rakṣa caṇḍike | putrān rakṣenmahālakṣmīrbhāryāṃ rakṣatu bhairavī || 40 ||

हे इन्द्राणी, मेरे गोत्र की रक्षा करो; हे चण्डिके, मेरे पशुओं की रक्षा करो; महालक्ष्मी पुत्रों की और भैरवी पत्नी की रक्षा करें।

४१

धनेश्वरी धनं रक्षेत् कौमारी कन्यकां तथा ।
पन्थानं सुपथा रक्षेन्मार्गं क्षेमङ्करी तथा॥

dhaneśvarī dhanaṃ rakṣet kaumārī kanyakāṃ tathā | panthānaṃ supathā rakṣenmārgaṃ kṣemaṅkarī tathā || 43 ||

धनेश्वरी धन की और कौमारी कन्या की रक्षा करें; सुपथा मेरे पथ की और क्षेमंकरी मार्ग की रक्षा करें।

४२

राजद्वारे महालक्ष्मीर्विजया सतत स्थिता ।
रक्षाहीनं तु यत् स्थानं वर्जितं कवचेन तु॥

rājadvāre mahālakṣmīrvijayā satata sthitā | rakṣāhīnaṃ tu yat sthānaṃ varjitaṃ kavacena tu || 44 ||

राजद्वार पर महालक्ष्मी और विजया सदा स्थित रहें। और जो स्थान इस कवच से छूट गया हो, रक्षा से रहित हो —

४३

तत्सर्वं रक्ष मे देवि जयन्ती पापनाशिनी ।
सर्वरक्षाकरं पुण्यं कवचं सर्वदा जपेत्॥

tatsarvaṃ rakṣa me devi jayantī pāpanāśinī | sarvarakṣākaraṃ puṇyaṃ kavacaṃ sarvadā japet || 45 ||

हे पापनाशिनी जयन्ती देवी, उस सबकी तुम रक्षा करो। सब प्रकार रक्षा करने वाले इस पुण्य कवच का सदा जप करना चाहिए।

४४

इदं रहस्यं विप्रर्षे भक्त्या तव मयोदितम् ।
पादमेकं न गच्छेत् तु यदीच्छेच्छुभमात्मनः॥

idaṃ rahasyaṃ viprarṣe bhaktyā tava mayoditam | pādamekaṃ na gacchet tu yadīcchecchubhamātmanaḥ || 46 ||

हे विप्रर्षि, यह रहस्य मैंने तुम्हें भक्तिपूर्वक कहा है। जो अपना कल्याण चाहे, वह इसके बिना एक पग भी न चले।

४५

कवचेनावृतो नित्यं यत्र यत्रैव गच्छति ।
तत्र तत्रार्थलाभश्व विजयः सार्वकालिकः॥

kavacenāvṛto nityaṃ yatra yatraiva gacchati | tatra tatrārthalābhaśva vijayaḥ sārvakālikaḥ || 47 ||

कवच से सदा सुरक्षित मनुष्य जहाँ-जहाँ जाता है, वहाँ-वहाँ उसे धन-लाभ और सब काल में विजय मिलती है।

४६

यं यं चिन्तयते कामं तं तं प्राप्नोति निश्चितम् ।
परमैश्वर्यमतुलं प्राप्स्यते भूतले पुमान्॥

yaṃ yaṃ cintayate kāmaṃ taṃ taṃ prāpnoti niścitam | paramaiśvaryamatulaṃ prāpsyate bhūtale pumān || 48 ||

वह जिस-जिस कामना का चिन्तन करता है, उसे निश्चय ही पा लेता है; वह पुरुष पृथ्वी पर अतुल परम ऐश्वर्य पाता है।

४७

निर्भयो जायते मर्त्यः सङ्ग्रामेष्वपराजितः ।
त्रैलोक्ये तु भवेत्पूज्यः कवचेनावृतः पुमान्॥

nirbhayo jāyate martyaḥ saṅgrāmeṣvaparājitaḥ | trailokye tu bhavetpūjyaḥ kavacenāvṛtaḥ pumān || 49 ||

कवच से सुरक्षित मनुष्य निर्भय हो जाता है, संग्राम में अपराजित रहता है और तीनों लोकों में पूज्य हो जाता है।

४८

इदं तु देव्याः कवचं देवानामपि दुर्लभम् ।
यः पठेत्प्रयतो नित्यं त्रिसन्ध्यं श्रद्धयान्वितः॥

idaṃ tu devyāḥ kavacaṃ devānāmapi durlabham | yaḥ paṭhetprayato nityaṃ trisandhyaṃ śraddhayānvitaḥ || 50 ||

देवी का यह कवच देवताओं के लिए भी दुर्लभ है। जो संयमपूर्वक, श्रद्धा से, नित्य तीनों संध्याओं में इसका पाठ करता है,

४९

दैवीकला भवेत्तस्य त्रैलोक्ये चापराजितः ।
जीवेद्वर्षशतं साग्रमपमृत्युविवर्जितः॥

daivīkalā bhavettasya trailokye cāparājitaḥ | jīvedvarṣaśataṃ sāgramapamṛtyuvivarjitaḥ || 51 ||

उसे दैवी कला प्राप्त होती है और वह तीनों लोकों में अपराजित रहता है; वह अपमृत्यु से बचकर सौ वर्ष से भी अधिक जीता है।

५०

नश्यन्ति व्याधयः सर्वे लूताविस्फोटकादयः ।
स्थावरं जङ्गमं चैव कृत्रिमं चैव यद्विषम्॥

naśyanti vyādhayaḥ sarve lūtāvisphoṭakādayaḥ | sthāvaraṃ jaṅgamaṃ caiva kṛtrimaṃ caiva yadviṣam || 52 ||

लूता, विस्फोटक आदि सब रोग नष्ट हो जाते हैं; स्थावर, जंगम और कृत्रिम — जो भी विष हो,

५१

अभिचाराणि सर्वाणि मन्त्रयन्त्राणि भूतले ।
भूचराः खेचराश्चैव कुलजाश्चौपदेशिकाः॥

abhicārāṇi sarvāṇi mantrayantrāṇi bhūtale | bhūcarāḥ khecarāścaiva kulajāścaupadeśikāḥ || 53 ||

पृथ्वी पर के सब अभिचार, मन्त्र और यन्त्र; भूचर और खेचर, कुलजात और उपदेश से उत्पन्न,

५२

सहजा कुलजा माला डाकिनी शाकिनी तथा ।
अन्तरिक्षचरा घोरा डाकिन्यश्च महारवाः॥

sahajā kulajā mālā ḍākinī śākinī tathā | antarikṣacarā ghorā ḍākinyaśca mahāravāḥ || 54 ||

सहज और कुलज, माला, डाकिनी और शाकिनी, अन्तरिक्ष में विचरने वाली घोर और महारव करने वाली डाकिनियाँ,

५३

ग्रहभूतपिशाचाश्च यक्षगन्धर्वराक्षसाः ।
ब्रह्मराक्षसवेतालाः कूष्माण्डा भैरवादयः॥

grahabhūtapiśācāśca yakṣagandharvarākṣasāḥ | brahmarākṣasavetālāḥ kūṣmāṇḍā bhairavādayaḥ || 55 ||

ग्रह, भूत, पिशाच, यक्ष, गन्धर्व, राक्षस, ब्रह्मराक्षस, वेताल, कूष्माण्ड और भैरव आदि —

५४

नश्यन्ति दर्शनात्तस्य कवचेनावृतो हि यः ।
मानोन्नतिर्भवेद्राज्ञस्तेजोवृद्धिः परा भवेत्॥

naśyanti darśanāttasya kavacenāvṛto hi yaḥ | mānonnatirbhavedrājñastejovṛddhiḥ parā bhavet || 56 ||

ये सब कवच से सुरक्षित मनुष्य को देखते ही नष्ट हो जाते हैं। राजा से उसका मान बढ़ता है और उसका तेज परम वृद्धि पाता है।

५५

यशोवृद्धिर्भवेत् पुंसां कीर्तिवृद्धिश्च जायते ।
तस्मात् जपेत् सदा भक्तः कवचं कामदं मुने॥

yaśovṛddhirbhavet puṃsāṃ kīrtivṛddhiśca jāyate | tasmāt japet sadā bhaktaḥ kavacaṃ kāmadaṃ mune || 57 ||

उसका यश बढ़ता है और कीर्ति की वृद्धि होती है। इसलिए हे मुने, भक्त सदा इस कामनापूर्ण कवच का जप करे।

५६

जपेत् सप्तशतीं चण्डीं कृत्वा तु कवचं पुरा ।
निर्विघ्नेन भवेत् सिद्धिश्चण्डीजपसमुद्भवा॥

japet saptaśatīṃ caṇḍīṃ kṛtvā tu kavacaṃ purā | nirvighnena bhavet siddhiścaṇḍījapasamudbhavā || 58 ||

पहले कवच का पाठ करके फिर सप्तशती चण्डी का जप करे; तब चण्डी-जप से होने वाली सिद्धि निर्विघ्न प्राप्त होती है।

५७

यावद्भूमण्डलं धत्ते सशैलवनकाननम् ।
तावत्तिष्ठति मेदिन्यां सन्ततिः पुत्रपौत्रिकी॥

yāvadbhūmaṇḍalaṃ dhatte saśailavanakānanam | tāvattiṣṭhati medinyāṃ santatiḥ putrapautrikī || 59 ||

जब तक पर्वतों, वनों और काननों सहित यह भूमण्डल टिका है, तब तक उसकी पुत्र-पौत्रों की संतति पृथ्वी पर बनी रहती है।

५८

देहान्ते परमं स्थानं सुरैरपि सुदुर्लभम् ।
प्राप्नोति पुरुषो नित्यं महामायाप्रसादतः॥

dehānte paramaṃ sthānaṃ surairapi sudurlabham | prāpnoti puruṣo nityaṃ mahāmāyāprasādataḥ || 60 ||

देह के अन्त में वह पुरुष महामाया की कृपा से वह परम स्थान पाता है जो देवताओं के लिए भी अत्यन्त दुर्लभ है।

५९

तत्र गच्छति गत्वासौ पुनश्चागमनं नहि ।
लभते परमं स्थानं शिवेन समतां व्रजेत्॥

tatra gacchati gatvāsau punaścāgamanaṃ nahi । labhate paramaṃ sthānaṃ śivena samatāṃ vrajet ॥ 61 ॥

वहाँ जाकर वह फिर लौटकर नहीं आता; वह परम पद पाता है और शिव के समान हो जाता है।

इन दिनों पर