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श्लोक · कार्तिकेय जी

कार्तिक ठाकुर का ध्यान

2 पंक्तियाँ · बोलने में लगभग 1 मिनट · Kartikeya's dhyana as Purohit Darpan (no. 37) and Bharatsastra print it

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कार्तिकेय जी

कार्तिकेय जी

कार्तिकेय; दक्षिण में मंगलवार

ॐ कार्त्तिकेयं महाभागं मयूरोपरिसंस्थितम्।
तप्तकाञ्चनवर्णाभं शक्तिहस्तं वरप्रदम्॥

oṁ kārttikeyaṁ mahābhāgaṁ mayūroparisaṁsthitam. taptakāñcanavarṇābhaṁ śaktihastaṁ varapradam.

ॐ। महाभाग कार्तिकेय, मयूर पर विराजमान, तपे हुए सोने जैसी कांति, हाथ में शक्ति, वर देने वाले;

द्विभुजं शत्रुहन्तारं नानालङ्कारभूषितम्।
प्रसन्नवदनं देवं षडाननं सुतप्रदम्॥

dvibhujaṁ śatruhantāraṁ nānālaṅkārabhūṣitam. prasannavadanaṁ devaṁ ṣaḍānanaṁ sutapradam.

द्विभुज, शत्रुओं का नाश करने वाले, अनेक आभूषणों से विभूषित, प्रसन्न मुख — षडानन, पुत्र देने वाले। उनका ध्यान।