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स्तोत्र · माँ दुर्गा

श्री सूक्त

16 पंक्तियाँ · बोलने में लगभग 1 मिनट · sanskritdocuments.org (shrI sUkta, Rigveda); sa.wikisource (श्रीसूक्तम्)

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माँ दुर्गा

माँ दुर्गा

नवरात्रि की देवी

हिरण्यवर्णां हरिणीं सुवर्णरजतस्रजाम् ।
चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आवह ॥

हे जातवेद अग्नि देव, स्वर्ण-सी कांति वाली, हरिणी-सी सुंदर, सोने और चाँदी की मालाएँ धारण करने वाली, चंद्रमा-सी उज्ज्वल, स्वर्णमयी लक्ष्मी माँ को मेरे पास ले आइए।

तां म आवह जातवेदो लक्ष्मीमनपगामिनीम् ।
यस्यां हिरण्यं विन्देयं गामश्वं पुरुषानहम् ॥

हे जातवेद, मेरे पास उन लक्ष्मी माँ को ले आइए जो कभी छोड़कर न जाएँ, जिनकी कृपा से मैं स्वर्ण, गौ, अश्व और अपने लोग पाऊँ।

अश्वपूर्वां रथमध्यां हस्तिनादप्रबोधिनीम् ।
श्रियं देवीमुपह्वये श्रीर्मादेवीर्जुषताम् ॥

जिनके आगे अश्व चलते हैं, जो रथों के मध्य विराजती हैं, जिन्हें हाथियों की चिंघाड़ जगाती है, उन श्री देवी का मैं आवाहन करूँ। वे श्री देवी मुझ पर प्रसन्न हों।

कां सोस्मितां हिरण्यप्राकारामार्द्रां ज्वलन्तीं तृप्तां तर्पयन्तीम् ।
पद्मे स्थितां पद्मवर्णां तामिहोपह्वये श्रियम् ॥

जो आनंदस्वरूपा हैं, मंद-मंद मुस्काती हैं, स्वर्ण के प्राकार में विराजती हैं, करुणा से आर्द्र हैं, दीप्तिमान हैं, स्वयं तृप्त हैं और सबको तृप्त करती हैं, कमल पर स्थित हैं और कमल-वर्णा हैं, उन श्री को मैं यहाँ आमंत्रित करूँ।

चन्द्रां प्रभासां यशसा ज्वलन्तीं श्रियं लोके देवजुष्टामुदाराम् ।
तां पद्मिनीमीं शरणमहं प्रपद्येऽलक्ष्मीर्मे नश्यतां त्वां वृणे ॥

चंद्रमा-सी सुंदर, प्रभा से युक्त, यश से दीप्त, संसार में देवताओं द्वारा सेवित, उदार, कमल वाली उन श्री की मैं शरण लूँ। मेरी दरिद्रता नष्ट हो; मैं आपका ही वरण करूँ।

आदित्यवर्णे तपसोऽधिजातो वनस्पतिस्तव वृक्षोऽथ बिल्वः ।
तस्य फलानि तपसा नुदन्तु मायान्तरायाश्च बाह्या अलक्ष्मीः ॥

हे सूर्य-सी कांति वाली माँ, आपके तप से वनस्पतियों में श्रेष्ठ बिल्व वृक्ष उत्पन्न हुआ। उसके फल तप के बल से मेरे भीतर और बाहर की दरिद्रता को दूर करें।

उपैतु मां देवसखः कीर्तिश्च मणिना सह ।
प्रादुर्भूतोऽस्मि राष्ट्रेऽस्मिन् कीर्तिमृद्धिं ददातु मे ॥

देवताओं के सखा कुबेर, कीर्ति और मणि के साथ मेरे पास आएँ। इस देश में मेरा जन्म हुआ है; वे मुझे कीर्ति और समृद्धि दें।

क्षुत्पिपासामलां ज्येष्ठामलक्ष्मीं नाशयाम्यहम् ।
अभूतिमसमृद्धिं च सर्वां निर्णुद मे गृहात् ॥

भूख-प्यास और मलिनता वाली ज्येष्ठा अलक्ष्मी को मैं दूर करूँ। हे माँ, मेरे घर से सब अभाव और असमृद्धि को निकाल दीजिए।

गंधद्वारां दुराधर्षां नित्यपुष्टां करीषिणीम् ।
ईश्वरीं सर्वभूतानां तामिहोपह्वये श्रियम् ॥

सुगंध जिनकी पहचान है, जिन्हें कोई पराजित नहीं कर सकता, जो सदा पुष्ट हैं, गोधन से समृद्ध हैं, सब प्राणियों की ईश्वरी हैं, उन श्री का मैं यहाँ आवाहन करूँ।

मनसः काममाकूतिं वाचः सत्यमशीमहि ।
पशूनां रूपमन्नस्य मयि श्रीः श्रयतां यशः ॥

हम मन की कामना और संकल्प, तथा वाणी की सत्यता प्राप्त करें। पशुओं और अन्न की शोभा, श्री और यश मुझमें निवास करें।

कर्दमेन प्रजाभूता मयि सम्भव कर्दम ।
श्रियं वासय मे कुले मातरं पद्ममालिनीम् ॥

कर्दम ऋषि से लक्ष्मी माँ संतानवती हुईं। हे कर्दम, आप मेरे यहाँ निवास करें, और कमल की माला पहनने वाली माता श्री को मेरे कुल में बसाइए।

आपः सृजन्तु स्निग्धानि चिक्लीत वस मे गृहे ।
नि च देवीं मातरं श्रियं वासय मे कुले ॥

जल स्निग्ध और मंगल पदार्थ उत्पन्न करे। हे चिक्लीत, आप मेरे घर में निवास करें, और माता श्री देवी को मेरे कुल में बसाइए।

आर्द्रां पुष्करिणीं पुष्टिं पिङ्गलां पद्ममालिनीम् ।
चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आवह ॥

हे जातवेद, करुणा से आर्द्र, कमल-सरोवरों में रहने वाली, पुष्टि देने वाली, पिंगल वर्ण की, कमल की माला धारण करने वाली, चंद्रमा-सी सुंदर, स्वर्णमयी लक्ष्मी माँ को मेरे पास ले आइए।

आर्द्रां यः करिणीं यष्टिं सुवर्णां हेममालिनीम् ।
सूर्यां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आवह ॥

हे जातवेद, करुणा से आर्द्र, हाथ में दंड धारण करने वाली, सुंदर वर्ण वाली, स्वर्ण की माला पहनने वाली, सूर्य-सी तेजस्वी, स्वर्णमयी लक्ष्मी माँ को मेरे पास ले आइए।

तां म आवह जातवेदो लक्ष्मीमनपगामिनीम् ।
यस्यां हिरण्यं प्रभूतं गावो दास्योऽश्वान्विन्देयं पुरुषानहम् ॥

हे जातवेद, कभी न छोड़ने वाली उन लक्ष्मी माँ को मेरे पास ले आइए, जिनकी कृपा से मैं प्रचुर स्वर्ण, गौएँ, सेवक, अश्व और अपने लोग पाऊँ।

यः शुचिः प्रयतो भूत्वा जुहुयादाज्यमन्वहम् ।
श्रियः पञ्चदशर्चं च श्रीकामः सततं जपेत् ॥

जो श्री की कामना करे, वह पवित्र और संयत होकर प्रतिदिन अग्नि में घी की आहुति दे, और श्री के इन पंद्रह मंत्रों का निरंतर जप करे।