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स्तोत्र · माँ दुर्गा

श्री ललिता सहस्रनाम स्तोत्रम्

187 पंक्तियाँ · बोलने में लगभग 8 मिनट · Lalita Sahasranama, Brahmanda Purana (Lalitopakhyana)

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माँ दुर्गा

माँ दुर्गा

नवरात्रि की देवी

सिन्दूरारुणविग्रहां त्रिनयनां माणिक्यमौलिस्फुर- त्तारानायकशेखरां स्मितमुखीमापीनवक्षोरुहाम् ।
पाणिभ्यामलिपूर्णरत्नचषकं रक्तोत्पलं बिभ्रतीं सौम्यां रत्नघटस्थरक्तचरणां ध्यायेत्परामम्बिकाम् ॥

सिन्दूर-सी लाल देह वाली, तीन नेत्रों वाली, जिनके माणिक्य-मुकुट पर चन्द्रमा चमकता है, मुस्कराते मुख वाली, उन्नत वक्ष वाली, हाथों में मधु से भरा रत्न-पात्र और लाल कमल धारण करने वाली, सौम्य, रत्न-कलश पर लाल चरण टिकाए परा अम्बिका का ध्यान करें।

अरुणां करुणातरङ्गिताक्षीं धृतपाशाङ्कुशपुष्पबाणचापाम् ।
अणिमादिभिरावृतां मयूखै- रहमित्येव विभावये भवानीम् ॥

जो अरुण वर्ण की हैं, जिनकी आँखों में करुणा की लहरें उठती हैं, जो पाश, अंकुश, पुष्प-बाण और धनुष धारण करती हैं, और अणिमा आदि सिद्धियाँ किरणों की तरह जिन्हें घेरे रहती हैं — उन भवानी का मैं अपने ही स्वरूप के रूप में ध्यान करता हूँ।

ध्यायेत्पद्मासनस्थां विकसितवदनां पद्मपत्रायताक्षीं हेमाभां पीतवस्त्रां करकलितलसद्धेमपद्मां वराङ्गीम् ।
सर्वालङ्कारयुक्तां सततमभयदां भक्तनम्रां भवानीं श्रीविद्यां शान्तमूर्तिं सकलसुरनुतां सर्वसम्पत्प्रदात्रीम् ॥

कमल के आसन पर विराजमान, खिले मुख वाली, कमल-दल जैसी विशाल आँखों वाली, स्वर्ण-सी कान्ति वाली, पीले वस्त्र पहने, हाथ में दमकता सुनहरा कमल लिए, सुन्दर अंगों वाली, सब आभूषणों से सजी, सदा अभय देने वाली, जिनके आगे भक्त झुकते हैं, उन भवानी का ध्यान करें — जो श्रीविद्या हैं, शान्ति की मूर्ति हैं, सब देवता जिनकी स्तुति करते हैं और जो सब सम्पदा देती हैं।

सकुङ्कुमविलेपनामलिकचुम्बिकस्तूरिकां समन्दहसितेक्षणां सशरचापपाशाङ्कुशाम् ।
अशेषजनमोहिनीमरुणमाल्यभूषाम्बरां जपाकुसुमभासुरां जपविधौ स्मरेदम्बिकाम् ॥

जप के समय उन अम्बिका का स्मरण करें — जिनके अंगों पर कुमकुम का लेप है, माथे पर कस्तूरी का तिलक है, जिनकी दृष्टि में मन्द मुस्कान है, जो बाण, धनुष, पाश और अंकुश धारण करती हैं, जो सब लोगों को मोहित करती हैं, लाल मालाओं, आभूषणों और वस्त्रों से सजी हैं और गुड़हल के फूल की तरह दमकती हैं।

श्रीमाता श्रीमहाराज्ञी श्रीमत्सिंहासनेश्वरी ।
चिदग्निकुण्डसम्भूता देवकार्यसमुद्यता ॥
१ ॥

वे श्रीमाता हैं, महारानी हैं, श्रीयुक्त सिंहासन की स्वामिनी हैं; वे चेतना के अग्निकुण्ड से प्रकट हुईं और देवताओं का कार्य करने को तत्पर हैं।

उद्यद्भानुसहस्राभा चतुर्बाहुसमन्विता ।
रागस्वरूपपाशाढ्या क्रोधाकाराङ्कुशोज्ज्वला ॥
२ ॥

वे हज़ार उगते सूर्यों-सी दीप्त हैं, चार भुजाओं वाली हैं; वे राग-रूपी पाश धारण करती हैं और क्रोध-रूपी अंकुश से दमकती हैं।

मनोरूपेक्षुकोदण्डा पञ्चतन्मात्रसायका ।
निजारुणप्रभापूरमज्जद्ब्रह्माण्डमण्डला ॥
३ ॥

मन ही उनका ईख का धनुष है और पाँच तन्मात्राएँ उनके बाण हैं; उनकी अपनी अरुण प्रभा की बाढ़ में सारा ब्रह्माण्ड डूबा रहता है।

चम्पकाशोकपुन्नागसौगन्धिकलसत्कचा ।
कुरुविन्दमणिश्रेणीकनत्कोटीरमण्डिता ॥
४ ॥

उनके केश चम्पा, अशोक, पुन्नाग और सौगन्धिक फूलों से शोभित हैं; वे कुरुविन्द मणियों की पंक्तियों से जगमगाते मुकुट से सुशोभित हैं।

अष्टमीचन्द्रविभ्राजदलिकस्थलशोभिता ।
मुखचन्द्रकलङ्काभमृगनाभिविशेषका ॥
५ ॥

उनका ललाट अष्टमी के चन्द्रमा-सा चमकता है; उस पर कस्तूरी का तिलक उनके मुख-चन्द्र के कलंक जैसा शोभता है।

वदनस्मरमाङ्गल्यगृहतोरणचिल्लिका ।
वक्त्रलक्ष्मीपरीवाहचलन्मीनाभलोचना ॥
६ ॥

उनकी भौंहें कामदेव के घर — उनके मुख — के द्वार पर बँधे मंगल-तोरण जैसी हैं; उनकी आँखें मुख की शोभा के प्रवाह में तैरती मछलियों-सी हैं।

नवचम्पकपुष्पाभनासादण्डविराजिता ।
ताराकान्तितिरस्कारिनासाभरणभासुरा ॥
७ ॥

उनकी नासिका नए चम्पा-पुष्प-सी सुन्दर है; उनकी नथ की चमक तारों की कान्ति को भी मात देती है।

कदम्बमञ्जरीकॢप्तकर्णपूरमनोहरा ।
ताटङ्कयुगलीभूततपनोडुपमण्डला ॥
८ ॥

कानों पर कदम्ब की मंजरियाँ सजाए वे मनोहर हैं; सूर्य और चन्द्रमा उनके दो कर्णफूल हैं।

पद्मरागशिलादर्शपरिभाविकपोलभूः ।
नवविद्रुमबिम्बश्रीन्यक्कारिरदनच्छदा ॥
९ ॥

उनके गाल माणिक के दर्पण से भी अधिक दमकते हैं; उनके होंठ नए मूँगे और बिम्बफल की शोभा को भी फीका कर देते हैं।

शुद्धविद्याङ्कुराकारद्विजपङ्क्तिद्वयोज्ज्वला ।
कर्पूरवीटिकामोदसमाकर्षिदिगन्तरा ॥
१० ॥

उनकी दोनों दन्त-पंक्तियाँ शुद्ध विद्या के अंकुरों-सी उज्ज्वल हैं; उनके कपूर-युक्त पान की सुगन्ध सब दिशाओं को अपनी ओर खींचती है।

निजसल्लापमाधुर्यविनिर्भर्त्सितकच्छपी ।
मन्दस्मितप्रभापूरमज्जत्कामेशमानसा ॥
११ ॥

उनकी वाणी की मधुरता सरस्वती की कच्छपी वीणा को भी लजा देती है; उनकी मन्द मुस्कान की बाढ़ में कामेश्वर का मन डूब जाता है।

अनाकलितसादृश्यचिबुकश्रीविराजिता ।
कामेशबद्धमाङ्गल्यसूत्रशोभितकन्धरा ॥
१२ ॥

उनकी ठोड़ी की शोभा अनुपम है; उनका कण्ठ कामेश्वर द्वारा बाँधे मंगलसूत्र से सुशोभित है।

कनकाङ्गदकेयूरकमनीयभुजान्विता ।
रत्नग्रैवेयचिन्ताकलोलमुक्ताफलान्विता ॥
१३ ॥

उनकी भुजाएँ सोने के बाजूबन्द और केयूर से सुन्दर हैं; वे रत्न-जड़ित हार पहने हैं जिसमें मोतियों का लोलक झूलता है।

कामेश्वरप्रेमरत्नमणिप्रतिपणस्तनी ।
नाभ्यालवालरोमालिलताफलकुचद्वयी ॥
१४ ॥

कामेश्वर के प्रेम-रूपी रत्न के बदले वे अपना वक्ष देती हैं; उनकी नाभि-रूपी क्यारी से उठी रोमावली-लता के फल उनके दोनों स्तन हैं।

लक्ष्यरोमलताधारतासमुन्नेयमध्यमा ।
स्तनभारदलन्मध्यपट्टबन्धवलित्रया ॥
१५ ॥

उनकी कमर इतनी पतली है कि रोमावली-लता का आधार होने से ही उसका अनुमान होता है; वक्ष के भार से झुकती कमर को थामने वाली पट्टी-सी तीन वलियाँ बनी हैं।

अरुणारुणकौसुम्भवस्त्रभास्वत्कटीतटी ।
रत्नकिङ्किणिकारम्यरशनादामभूषिता ॥
१६ ॥

उनका कटि-प्रदेश उषा-सी लाल कुसुम्भी रेशम से दमकता है; वे रत्नों की घुँघरियों से सुन्दर करधनी पहने हैं।

कामेशज्ञातसौभाग्यमार्दवोरुद्वयान्विता ।
माणिक्यमुकुटाकारजानुद्वयविराजिता ॥
१७ ॥

उनकी जाँघों का सौन्दर्य और कोमलता केवल कामेश्वर जानते हैं; उनके घुटने माणिक के मुकुटों-से शोभते हैं।

इन्द्रगोपपरिक्षिप्तस्मरतूणाभजङ्घिका ।
गूढगुल्फा कूर्मपृष्ठजयिष्णुप्रपदान्विता ॥
१८ ॥

उनकी पिंडलियाँ लाल इन्द्रगोपों से घिरे कामदेव के तरकश-सी हैं; उनके टखने भरे-भरे और छिपे हुए हैं, और उनके पंजे कछुए की पीठ से भी सुन्दर हैं।

नखदीधितिसञ्छन्ननमज्जनतमोगुणा ।
पदद्वयप्रभाजालपराकृतसरोरुहा ॥
१९ ॥

उनके नखों की दीप्ति से प्रणाम करने वालों का अज्ञान-अन्धकार मिट जाता है; उनके दोनों चरणों की प्रभा कमल को भी पराजित कर देती है।

शिञ्जानमणिमञ्जीरमण्डितश्रीपदाम्बुजा ।
मरालीमन्दगमना महालावण्यशेवधिः ॥
२० ॥

उनके चरण-कमल रुनझुन करती मणि-जड़ित पायलों से सजे हैं; वे हंसिनी-सी मन्द चाल से चलती हैं और परम सौन्दर्य की निधि हैं।

सर्वारुणाऽनवद्याङ्गी सर्वाभरणभूषिता ।
शिवकामेश्वराङ्कस्था शिवा स्वाधीनवल्लभा ॥
२१ ॥

वे सब ओर से अरुण हैं, निर्दोष अंगों वाली हैं, सब आभूषणों से सजी हैं; वे शिव-कामेश्वर की गोद में विराजती हैं, स्वयं शिवा (कल्याणमयी) हैं, और उनके प्रियतम सदा उनके अधीन हैं।

सुमेरुमध्यशृङ्गस्था श्रीमन्नगरनायिका ।
चिन्तामणिगृहान्तस्था पञ्चब्रह्मासनस्थिता ॥
२२ ॥

वे सुमेरु के मध्य शिखर पर विराजती हैं, श्रीनगर की स्वामिनी हैं; वे चिन्तामणि के भवन में रहती हैं और पंचब्रह्म के आसन पर आसीन हैं।

महापद्माटवीसंस्था कदम्बवनवासिनी ।
सुधासागरमध्यस्था कामाक्षी कामदायिनी ॥
२३ ॥

वे महापद्म-वन में रहती हैं, कदम्ब-वन में निवास करती हैं; अमृत-सागर के बीच विराजती हैं, वे सुन्दर नेत्रों वाली कामाक्षी हैं और सब कामनाएँ पूरी करती हैं।

देवर्षिगणसङ्घातस्तूयमानात्मवैभवा ।
भण्डासुरवधोद्युक्तशक्तिसेनासमन्विता ॥
२४ ॥

देवताओं और ऋषियों के समूह उनकी महिमा का गान करते हैं; भण्डासुर के वध को उद्यत शक्तियों की सेना उनके साथ है।

सम्पत्करीसमारूढसिन्धुरव्रजसेविता ।
अश्वारूढाधिष्ठिताश्वकोटिकोटिभिरावृता ॥
२५ ॥

सम्पत्करी देवी के नेतृत्व में हाथियों के झुंड उनकी सेवा करते हैं; अश्वारूढा देवी के अधीन करोड़ों-करोड़ घोड़े उन्हें घेरे हैं।

चक्रराजरथारूढसर्वायुधपरिष्कृता ।
गेयचक्ररथारूढमन्त्रिणीपरिसेविता ॥
२६ ॥

वे चक्रराज रथ पर आरूढ़ हैं, सब आयुधों से सुसज्जित; गेयचक्र रथ पर सवार मन्त्रिणी देवी उनकी सेवा करती हैं।

किरिचक्ररथारूढदण्डनाथापुरस्कृता ।
ज्वालामालिनिकाक्षिप्तवह्निप्राकारमध्यगा ॥
२७ ॥

किरिचक्र रथ पर सवार दण्डनाथा देवी उनके आगे चलती हैं; वे ज्वालामालिनी द्वारा रचे अग्नि-प्राकार के मध्य में स्थित हैं।

भण्डसैन्यवधोद्युक्तशक्तिविक्रमहर्षिता ।
नित्यापराक्रमाटोपनिरीक्षणसमुत्सुका ॥
२८ ॥

भण्ड की सेना के संहार को उद्यत शक्तियों के पराक्रम से वे हर्षित होती हैं; नित्या देवियों के पराक्रम और उत्साह को देखने को वे उत्सुक रहती हैं।

भण्डपुत्रवधोद्युक्तबालाविक्रमनन्दिता ।
मन्त्रिण्यम्बाविरचितविषङ्गवधतोषिता ॥
२९ ॥

भण्ड के पुत्रों के वध को उद्यत बाला देवी के पराक्रम से वे आनन्दित होती हैं; मन्त्रिणी अम्बा द्वारा विषंग के वध से वे प्रसन्न होती हैं।

विशुक्रप्राणहरणवाराहीवीर्यनन्दिता ।
कामेश्वरमुखालोककल्पितश्रीगणेश्वरा ॥
३० ॥

विशुक्र के प्राण हरने वाली वाराही देवी के पराक्रम से वे आनन्दित होती हैं; कामेश्वर के मुख को निहारकर वे श्री गणेश को प्रकट करती हैं।

महागणेशनिर्भिन्नविघ्नयन्त्रप्रहर्षिता ।
भण्डासुरेन्द्रनिर्मुक्तशस्त्रप्रत्यस्त्रवर्षिणी ॥
३१ ॥

महागणेश द्वारा विघ्न-यन्त्र को तोड़ देने पर वे अति प्रसन्न होती हैं; असुरराज भण्ड के छोड़े हर शस्त्र पर वे प्रत्यस्त्र बरसाती हैं।

कराङ्गुलिनखोत्पन्ननारायणदशाकृतिः ।
महापाशुपतास्त्राग्निनिर्दग्धासुरसैनिका ॥
३२ ॥

अपनी उँगलियों के नखों से उन्होंने नारायण के दस अवतार प्रकट किए; महापाशुपत अस्त्र की अग्नि से उन्होंने असुरों की सेना को भस्म कर दिया।

कामेश्वरास्त्रनिर्दग्धसभण्डासुरशून्यका ।
ब्रह्मोपेन्द्रमहेन्द्रादिदेवसंस्तुतवैभवा ॥
३३ ॥

कामेश्वर अस्त्र से उन्होंने भण्डासुर को उसकी नगरी शून्यक सहित भस्म किया; ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र आदि देवता उनकी महिमा की स्तुति करते हैं।

हरनेत्राग्निसन्दग्धकामसञ्जीवनौषधिः ।
श्रीमद्वाग्भवकूटैकस्वरूपमुखपङ्कजा ॥
३४ ॥

शिव के नेत्र की अग्नि से भस्म हुए कामदेव को फिर जीवन देने वाली संजीवनी औषधि वे ही हैं; उनका मुख-कमल उनके मन्त्र का पहला भाग, वाग्भव कूट है।

कण्ठाधःकटिपर्यन्तमध्यकूटस्वरूपिणी ।
शक्तिकूटैकतापन्नकट्यधोभागधारिणी ॥
३५ ॥

कण्ठ से कटि तक वे मध्य कूट का स्वरूप हैं; कटि से नीचे का भाग शक्ति कूट ही है।

मूलमन्त्रात्मिका मूलकूटत्रयकलेवरा ।
कुलामृतैकरसिका कुलसङ्केतपालिनी ॥
३६ ॥

वे स्वयं मूल मन्त्र हैं, और उसके तीन कूट उनका शरीर हैं; वे कुल के अमृत की ही रसिका हैं और कुल-मार्ग के गुप्त संकेतों की रक्षा करती हैं।

कुलाङ्गना कुलान्तःस्था कौलिनी कुलयोगिनी ।
अकुला समयान्तःस्था समयाचारतत्परा ॥
३७ ॥

वे कुलांगना हैं, कुल के भीतर रहती हैं, कौलिनी हैं, कुलयोगिनी हैं; वे अकुला भी हैं, समय के भीतर रहती हैं और समयाचार में लीन हैं।

मूलाधारैकनिलया ब्रह्मग्रन्थिविभेदिनी ।
मणिपूरान्तरुदिता विष्णुग्रन्थिविभेदिनी ॥
३८ ॥

मूलाधार उनका निज निवास है, वे ब्रह्मग्रन्थि का भेदन करती हैं; मणिपूर में उदित होकर वे विष्णुग्रन्थि का भेदन करती हैं।

आज्ञाचक्रान्तरालस्था रुद्रग्रन्थिविभेदिनी ।
सहस्राराम्बुजारूढा सुधासाराभिवर्षिणी ॥
३९ ॥

आज्ञा चक्र के भीतर स्थित होकर वे रुद्रग्रन्थि का भेदन करती हैं; सहस्रार कमल पर आरूढ़ होकर वे अमृत की धाराएँ बरसाती हैं।

तटिल्लतासमरुचिः षट्चक्रोपरिसंस्थिता ।
महासक्तिः कुण्डलिनी बिसतन्तुतनीयसी ॥
४० ॥

वे बिजली की लता-सी दीप्त हैं और छह चक्रों के ऊपर स्थित हैं; वे महासक्ति हैं — शिव से मिलन के महोत्सव में रमने वाली; वे कुण्डलिनी हैं, कमलनाल के तन्तु से भी सूक्ष्म।

भवानी भावनागम्या भवारण्यकुठारिका ।
भद्रप्रिया भद्रमूर्तिर्भक्तसौभाग्यदायिनी ॥
४१ ॥

वे भवानी हैं, भावना (ध्यान) से प्राप्त होती हैं, संसार-रूपी वन के लिए कुल्हाड़ी हैं; मंगल उन्हें प्रिय है, वे स्वयं मंगल की मूर्ति हैं और भक्तों को सौभाग्य देती हैं।

भक्तिप्रिया भक्तिगम्या भक्तिवश्या भयापहा ।
शाम्भवी शारदाराध्या शर्वाणी शर्मदायिनी ॥
४२ ॥

वे भक्ति से प्रसन्न होती हैं, भक्ति से प्राप्त होती हैं, भक्ति के वश में होती हैं और भय हरती हैं; वे शाम्भवी हैं, शारदा (सरस्वती) उनकी आराधना करती हैं, वे शर्वाणी हैं और सुख देती हैं।

शाङ्करी श्रीकरी साध्वी शरच्चन्द्रनिभानना ।
शातोदरी शान्तिमती निराधारा निरञ्जना ॥
४३ ॥

वे शांकरी हैं, सुख और समृद्धि देने वाली, साध्वी, शरद के चन्द्रमा-से मुख वाली; पतली कमर वाली, शान्तिमयी, किसी आधार पर न टिकी, हर कलंक से अछूती।

निर्लेपा निर्मला नित्या निराकारा निराकुला ।
निर्गुणा निष्कला शान्ता निष्कामा निरुपप्लवा ॥
४४ ॥

वे निर्लेप, निर्मल, नित्य, निराकार और निराकुल हैं; वे निर्गुण, निष्कल, शान्त, निष्काम हैं और कोई उपद्रव उन्हें छू नहीं सकता।

नित्यमुक्ता निर्विकारा निष्प्रपञ्चा निराश्रया ।
नित्यशुद्धा नित्यबुद्धा निरवद्या निरन्तरा ॥
४५ ॥

वे नित्यमुक्त, निर्विकार, प्रपंच से परे और निराश्रय हैं; वे नित्यशुद्ध, नित्यबुद्ध, निर्दोष और सर्वत्र अखण्ड व्याप्त हैं।

निष्कारणा निष्कलङ्का निरुपाधिर्निरीश्वरा ।
नीरागा रागमथनी निर्मदा मदनाशिनी ॥
४६ ॥

वे अकारण हैं, निष्कलंक हैं, उपाधि से रहित हैं, उनके ऊपर कोई ईश्वर नहीं; वे राग से रहित हैं और राग का नाश करती हैं, मद से रहित हैं और मद का नाश करती हैं।

निश्चिन्ता निरहङ्कारा निर्मोहा मोहनाशिनी ।
निर्ममा ममताहन्त्री निष्पापा पापनाशिनी ॥
४७ ॥

वे चिन्ता से रहित, अहंकार से रहित, मोह से रहित हैं और मोह का नाश करती हैं; वे ममता से रहित हैं और ममता को मिटाती हैं; वे निष्पाप हैं और पापों का नाश करती हैं।

निष्क्रोधा क्रोधशमनी निर्लोभा लोभनाशिनी ।
निःसंशया संशयघ्नी निर्भवा भवनाशिनी ॥
४८ ॥

वे क्रोध से रहित हैं और क्रोध को शान्त करती हैं; लोभ से रहित हैं और लोभ का नाश करती हैं; संशय से रहित हैं और संशय मिटाती हैं; वे जन्म से रहित हैं और संसार के बन्धन का नाश करती हैं।

निर्विकल्पा निराबाधा निर्भेदा भेदनाशिनी ।
निर्नाशा मृत्युमथनी निष्क्रिया निष्परिग्रहा ॥
४९ ॥

वे निर्विकल्प हैं, निर्बाध हैं, भेद से रहित हैं और भेद-बुद्धि का नाश करती हैं; वे अविनाशी हैं और मृत्यु को मथ डालती हैं; वे निष्क्रिय हैं और कुछ भी ग्रहण नहीं करतीं।

निस्तुला नीलचिकुरा निरपाया निरत्यया ।
दुर्लभा दुर्गमा दुर्गा दुःखहन्त्री सुखप्रदा ॥
५० ॥

वे अतुलनीय हैं, काले चमकते केशों वाली हैं, अविनाशी हैं, उनकी मर्यादा कोई लाँघ नहीं सकता; वे दुर्लभ हैं, दुर्गम हैं, दुर्गा हैं, दुःख हरने वाली और सुख देने वाली हैं।

दुष्टदूरा दुराचारशमनी दोषवर्जिता ।
सर्वज्ञा सान्द्रकरुणा समानाधिकवर्जिता ॥
५१ ॥

दुष्ट उनसे दूर रहते हैं, वे दुराचार को शान्त करती हैं, सब दोषों से रहित हैं; वे सर्वज्ञ हैं, उनकी करुणा गहरी है, और कोई उनके समान या उनसे बड़ा नहीं।

सर्वशक्तिमयी सर्वमङ्गला सद्गतिप्रदा ।
सर्वेश्वरी सर्वमयी सर्वमन्त्रस्वरूपिणी ॥
५२ ॥

वे सर्वशक्तिमयी हैं, सर्वमंगला हैं, सद्गति देने वाली हैं; वे सबकी ईश्वरी हैं, सबमें व्याप्त हैं और सब मन्त्रों का स्वरूप हैं।

सर्वयन्त्रात्मिका सर्वतन्त्ररूपा मनोन्मनी ।
माहेश्वरी महादेवी महालक्ष्मीर्मृडप्रिया ॥
५३ ॥

वे सब यन्त्रों की आत्मा हैं, सब तन्त्रों का रूप हैं, मनोन्मनी हैं; वे माहेश्वरी हैं, महादेवी हैं, महालक्ष्मी हैं और मृड (शिव) की प्रिया हैं।

महारूपा महापूज्या महापातकनाशिनी ।
महामाया महासत्त्वा महाशक्तिर्महारतिः ॥
५४ ॥

उनका रूप महान है, वे परम पूज्या हैं, बड़े से बड़े पाप का नाश करती हैं; वे महामाया हैं, महासत्त्वा हैं, महाशक्ति हैं, महारति हैं।

महाभोगा महैश्वर्या महावीर्या महाबला ।
महाबुद्धिर्महासिद्धिर्महायोगेश्वरेश्वरी ॥
५५ ॥

उनके भोग महान हैं, ऐश्वर्य महान है, पराक्रम और बल महान हैं; उनकी बुद्धि और सिद्धि महान है; वे महान योगेश्वरों की भी ईश्वरी हैं।

महातन्त्रा महामन्त्रा महायन्त्रा महासना ।
महायागक्रमाराध्या महाभैरवपूजिता ॥
५६ ॥

वे महातन्त्र हैं, महामन्त्र हैं, महायन्त्र हैं, महान आसन पर विराजती हैं; महायाग के क्रम से उनकी आराधना होती है और महाभैरव उनकी पूजा करते हैं।

महेश्वरमहाकल्पमहाताण्डवसाक्षिणी ।
महाकामेशमहिषी महात्रिपुरसुन्दरी ॥
५७ ॥

महाकल्प के अन्त में महेश्वर के महाताण्डव की वे साक्षी हैं; वे महाकामेश्वर की पटरानी हैं, महात्रिपुरसुन्दरी हैं।

चतुःषष्ट्युपचाराढ्या चतुःषष्टिकलामयी ।
महाचतुःषष्टिकोटियोगिनीगणसेविता ॥
५८ ॥

चौंसठ उपचारों से उनका पूजन होता है, वे चौंसठ कलाओं से युक्त हैं; चौंसठ करोड़ योगिनियों के महान समूह उनकी सेवा करते हैं।

मनुविद्या चन्द्रविद्या चन्द्रमण्डलमध्यगा ।
चारुरूपा चारुहासा चारुचन्द्रकलाधरा ॥
५९ ॥

वे मनुविद्या हैं, चन्द्रविद्या हैं, चन्द्रमण्डल के मध्य में रहती हैं; उनका रूप सुन्दर है, हँसी सुन्दर है, और वे सुन्दर चन्द्रकला धारण करती हैं।

चराचरजगन्नाथा चक्रराजनिकेतना ।
पार्वती पद्मनयना पद्मरागसमप्रभा ॥
६० ॥

वे चर-अचर जगत की स्वामिनी हैं, श्रीचक्र उनका निवास है; वे पार्वती हैं, कमलनयनी हैं, पद्मराग मणि-सी प्रभा वाली हैं।

पञ्चप्रेतासनासीना पञ्चब्रह्मस्वरूपिणी ।
चिन्मयी परमानन्दा विज्ञानघनरूपिणी ॥
६१ ॥

वे पंचप्रेत-आसन पर विराजती हैं — उन पाँच ब्रह्मों पर जो उनके बिना निष्प्राण हैं — और स्वयं पंचब्रह्म का स्वरूप हैं; वे चिन्मयी हैं, परमानन्दा हैं, घनीभूत विज्ञान का रूप हैं।

ध्यानध्यातृध्येयरूपा धर्माधर्मविवर्जिता ।
विश्वरूपा जागरिणी स्वपन्ती तैजसात्मिका ॥
६२ ॥

वे ही ध्यान, ध्याता और ध्येय हैं; धर्म और अधर्म से परे हैं; सारा विश्व उनका रूप है; वे जाग्रत अवस्था हैं, स्वप्न अवस्था हैं और स्वप्न देखने वाले जीव (तैजस) की आत्मा हैं।

सुप्ता प्राज्ञात्मिका तुर्या सर्वावस्थाविवर्जिता ।
सृष्टिकर्त्री ब्रह्मरूपा गोप्त्री गोविन्दरूपिणी ॥
६३ ॥

वे सुषुप्ति हैं और प्राज्ञ की आत्मा हैं, तुरीय हैं, सब अवस्थाओं से परे हैं; वे ब्रह्मा के रूप में सृष्टि करती हैं, गोविन्द के रूप में रक्षा करती हैं।

संहारिणी रुद्ररूपा तिरोधानकरीश्वरी ।
सदाशिवानुग्रहदा पञ्चकृत्यपरायणा ॥
६४ ॥

रुद्र के रूप में वे संहार करती हैं, ईश्वरी के रूप में सबको तिरोहित करती हैं; सदाशिव के रूप में अनुग्रह करती हैं; वे पाँचों कृत्यों में लगी रहती हैं।

भानुमण्डलमध्यस्था भैरवी भगमालिनी ।
पद्मासना भगवती पद्मनाभसहोदरी ॥
६५ ॥

वे सूर्यमण्डल के मध्य में रहती हैं, भैरवी हैं, छह ऐश्वर्यों की माला धारण करती हैं; वे कमल पर आसीन हैं, भगवती हैं, पद्मनाभ (विष्णु) की बहन हैं।

उन्मेषनिमिषोत्पन्नविपन्नभुवनावली ।
सहस्रशीर्षवदना सहस्राक्षी सहस्रपात् ॥
६६ ॥

उनकी पलकें खुलने पर लोकों की पंक्तियाँ उत्पन्न होती हैं और मुँदने पर विलीन हो जाती हैं; उनके हज़ार सिर और मुख हैं, हज़ार नेत्र हैं, हज़ार चरण हैं।

आब्रह्मकीटजननी वर्णाश्रमविधायिनी ।
निजाज्ञारूपनिगमा पुण्यापुण्यफलप्रदा ॥
६७ ॥

ब्रह्मा से लेकर छोटे-से कीड़े तक वे सबकी जननी हैं, वर्ण और आश्रम की व्यवस्था करती हैं; वेद उनकी अपनी आज्ञा हैं, और वे पुण्य-पाप का फल देती हैं।

श्रुतिसीमन्तसिन्दूरीकृतपादाब्जधूलिका ।
सकलागमसन्दोहशुक्तिसम्पुटमौक्तिका ॥
६८ ॥

उनके चरण-कमलों की धूल वेदों की माँग का सिन्दूर है; वे सब आगमों की सीप में बन्द मोती हैं।

पुरुषार्थप्रदा पूर्णा भोगिनी भुवनेश्वरी ।
अम्बिकाऽनादिनिधना हरिब्रह्मेन्द्रसेविता ॥
६९ ॥

वे चारों पुरुषार्थ देती हैं, पूर्णा हैं, भोगिनी हैं, भुवनेश्वरी हैं; वे अम्बिका हैं, आदि और अन्त से रहित हैं, हरि, ब्रह्मा और इन्द्र उनकी सेवा करते हैं।

नारायणी नादरूपा नामरूपविवर्जिता ।
ह्रीङ्कारी ह्रीमती हृद्या हेयोपादेयवर्जिता ॥
७० ॥

वे नारायणी हैं, नाद उनका रूप है, वे नाम और रूप से परे हैं; वे ह्रींकार हैं, लज्जाशील हैं, हृदय में रहती हैं, उनके लिए न कुछ त्याज्य है न ग्राह्य।

राजराजार्चिता राज्ञी रम्या राजीवलोचना ।
रञ्जनी रमणी रस्या रणत्किङ्किणिमेखला ॥
७१ ॥

राजाओं के राजा उनकी पूजा करते हैं; वे रानी हैं, रमणीय हैं, कमलनयनी हैं; वे मन को रंजित करती हैं, आनन्द देती हैं, रसमयी हैं और रुनझुन करती घुँघरियों की करधनी पहनती हैं।

रमा राकेन्दुवदना रतिरूपा रतिप्रिया ।
रक्षाकरी राक्षसघ्नी रामा रमणलम्पटा ॥
७२ ॥

वे रमा हैं, पूर्णिमा के चन्द्र-से मुख वाली, रति का रूप और रति की प्रिया; वे रक्षा करती हैं, राक्षसों का वध करती हैं, वे आनन्द हैं और अपने प्रियतम में रमती हैं।

काम्या कामकलारूपा कदम्बकुसुमप्रिया ।
कल्याणी जगतीकन्दा करुणारससागरा ॥
७३ ॥

वे काम्या हैं, कामकला का रूप हैं, कदम्ब के फूल उन्हें प्रिय हैं; वे कल्याणी हैं, जगत की जड़ हैं, करुणा-रस का सागर हैं।

कलावती कलालापा कान्ता कादम्बरीप्रिया ।
वरदा वामनयना वारुणीमदविह्वला ॥
७४ ॥

वे सब कलाओं से युक्त हैं, मधुर बोलने वाली हैं, सुन्दर हैं, कादम्बरी उन्हें प्रिय है; वे वर देती हैं, उनके नेत्र सुन्दर हैं, और वे वारुणी (आनन्द-रस) के मद में मग्न रहती हैं।

विश्वाधिका वेदवेद्या विन्ध्याचलनिवासिनी ।
विधात्री वेदजननी विष्णुमाया विलासिनी ॥
७५ ॥

वे विश्व से परे हैं, वेदों से जानी जाती हैं, विन्ध्याचल पर निवास करती हैं; वे सृष्टि और पालन करती हैं, वेदों की जननी हैं, विष्णुमाया हैं, लीलामयी हैं।

क्षेत्रस्वरूपा क्षेत्रेशी क्षेत्रक्षेत्रज्ञपालिनी ।
क्षयवृद्धिविनिर्मुक्ता क्षेत्रपालसमर्चिता ॥
७६ ॥

वे क्षेत्र (शरीर) का स्वरूप हैं, क्षेत्र की स्वामिनी हैं, क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ दोनों की रक्षक हैं; वे क्षय और वृद्धि से मुक्त हैं, और क्षेत्रपाल उनकी पूजा करते हैं।

विजया विमला वन्द्या वन्दारुजनवत्सला ।
वाग्वादिनी वामकेशी वह्निमण्डलवासिनी ॥
७७ ॥

वे विजया हैं, विमला हैं, वन्दनीय हैं, प्रणाम करने वालों पर वात्सल्य रखती हैं; वे वाणी देने वाली हैं, सुन्दर केशों वाली हैं, अग्निमण्डल में रहती हैं।

भक्तिमत्कल्पलतिका पशुपाशविमोचिनी ।
संहृताशेषपाषण्डा सदाचारप्रवर्तिका ॥
७८ ॥

भक्तिमानों के लिए वे कल्पलता हैं, जीवों को बन्धन से छुड़ाती हैं; वे सब पाखण्ड का नाश करती हैं और सदाचार का प्रवर्तन करती हैं।

तापत्रयाग्निसन्तप्तसमाह्लादनचन्द्रिका ।
तरुणी तापसाराध्या तनुमध्या तमोऽपहा ॥
७९ ॥

तीन तापों की आग से जले हुओं को वे चाँदनी बनकर शीतल आनन्द देती हैं; वे तरुणी हैं, तपस्वी उनकी आराधना करते हैं, वे पतली कमर वाली हैं और अन्धकार हरती हैं।

चितिस्तत्पदलक्ष्यार्था चिदेकरसरूपिणी ।
स्वात्मानन्दलवीभूतब्रह्माद्यानन्दसन्ततिः ॥
८० ॥

वे चिति (चेतना) हैं, 'तत्' पद का लक्ष्य अर्थ हैं, एकरस चैतन्य का रूप हैं; ब्रह्मा आदि का सारा आनन्द उनके अपने आनन्द का एक कण भर है।

परा प्रत्यक्चितीरूपा पश्यन्ती परदेवता ।
मध्यमा वैखरीरूपा भक्तमानसहंसिका ॥
८१ ॥

वे परा हैं, अन्तर्मुखी चेतना का रूप हैं, पश्यन्ती हैं, परदेवता हैं; वे मध्यमा हैं, वैखरी वाणी का रूप हैं, भक्तों के मन-सरोवर की हंसिनी हैं।

कामेश्वरप्राणनाडी कृतज्ञा कामपूजिता ।
शृङ्गाररससम्पूर्णा जया जालन्धरस्थिता ॥
८२ ॥

वे कामेश्वर की प्राण-नाड़ी हैं, कृतज्ञा हैं (सबके कर्म जानती हैं), कामदेव उनकी पूजा करते हैं; वे शृंगार-रस से परिपूर्ण हैं, जया हैं, जालन्धर पीठ में स्थित हैं।

ओड्याणपीठनिलया बिन्दुमण्डलवासिनी ।
रहोयागक्रमाराध्या रहस्तर्पणतर्पिता ॥
८३ ॥

ओड्याण पीठ उनका निवास है, वे बिन्दुमण्डल में रहती हैं; रहस्य-याग के क्रम से उनकी आराधना होती है और गुप्त तर्पण से वे तृप्त होती हैं।

सद्यःप्रसादिनी विश्वसाक्षिणी साक्षिवर्जिता ।
षडङ्गदेवतायुक्ता षाड्गुण्यपरिपूरिता ॥
८४ ॥

वे तुरन्त प्रसन्न होती हैं; वे सारे विश्व की साक्षी हैं और उनका कोई साक्षी नहीं; छह अंगों के देवता उनके साथ हैं, और वे छह ऐश्वर्यों से परिपूर्ण हैं।

नित्यक्लिन्ना निरुपमा निर्वाणसुखदायिनी ।
नित्याषोडशिकारूपा श्रीकण्ठार्धशरीरिणी ॥
८५ ॥

वे नित्य करुणा से आर्द्र हैं, अनुपम हैं, निर्वाण का सुख देती हैं; वे सोलह नित्याओं का रूप हैं और श्रीकण्ठ (शिव) के आधे शरीर वाली हैं।

प्रभावती प्रभारूपा प्रसिद्धा परमेश्वरी ।
मूलप्रकृतिरव्यक्ता व्यक्ताव्यक्तस्वरूपिणी ॥
८६ ॥

वे प्रभावती हैं, स्वयं प्रभा हैं, प्रसिद्ध हैं, परमेश्वरी हैं; वे मूल प्रकृति हैं, अव्यक्त हैं, और व्यक्त-अव्यक्त दोनों का स्वरूप हैं।

व्यापिनी विविधाकारा विद्याऽविद्यास्वरूपिणी ।
महाकामेशनयनकुमुदाह्लादकौमुदी ॥
८७ ॥

वे सर्वव्यापिनी हैं, अनेक रूपों वाली हैं, विद्या और अविद्या दोनों का स्वरूप हैं; वे महाकामेश्वर के नेत्र-रूपी कुमुदों को आनन्द देने वाली चाँदनी हैं।

भक्तहार्दतमोभेदभानुमद्भानुसन्ततिः ।
शिवदूती शिवाराध्या शिवमूर्तिः शिवङ्करी ॥
८८ ॥

वे भक्तों के हृदय का अन्धकार भेदने वाली सूर्य-किरणों की धारा हैं; वे शिवदूती हैं (जिनके लिए शिव दूत बने), शिव उनकी आराधना करते हैं, वे शिव-स्वरूपा हैं और कल्याण करने वाली हैं।

शिवप्रिया शिवपरा शिष्टेष्टा शिष्टपूजिता ।
अप्रमेया स्वप्रकाशा मनोवाचामगोचरा ॥
८९ ॥

वे शिव की प्रिया हैं, शिव में ही लीन हैं, सज्जनों को प्रिय हैं और सज्जन उनकी पूजा करते हैं; वे अप्रमेय हैं, स्वयंप्रकाश हैं, मन और वाणी की पहुँच से परे हैं।

चिच्छक्तिश्चेतनारूपा जडशक्तिर्जडात्मिका ।
गायत्री व्याहृतिः सन्ध्या द्विजवृन्दनिषेविता ॥
९० ॥

वे चित्-शक्ति हैं, चेतना का रूप हैं; जड़ की शक्ति हैं और जड़ जगत का स्वरूप भी; वे गायत्री हैं, व्याहृति हैं, सन्ध्या हैं, द्विजों के समूह उनकी सेवा करते हैं।

तत्त्वासना तत्त्वमयी पञ्चकोशान्तरस्थिता ।
निःसीममहिमा नित्ययौवना मदशालिनी ॥
९१ ॥

तत्त्व उनका आसन हैं और वे तत्त्वमयी हैं (वे ही 'तत्' हैं, वे ही 'त्वम्' हैं); वे पाँच कोशों के भीतर स्थित हैं; उनकी महिमा असीम है, वे नित्य युवा हैं और आनन्द के मद से दीप्त हैं।

मदघूर्णितरक्ताक्षी मदपाटलगण्डभूः ।
चन्दनद्रवदिग्धाङ्गी चाम्पेयकुसुमप्रिया ॥
९२ ॥

आनन्द के मद से उनकी लाल आँखें घूमती हैं, उसी से उनके गाल गुलाबी हैं; उनके अंगों पर चन्दन का लेप है, और चम्पा का फूल उन्हें प्रिय है।

कुशला कोमलाकारा कुरुकुल्ला कुलेश्वरी ।
कुलकुण्डालया कौलमार्गतत्परसेविता ॥
९३ ॥

वे कुशल हैं, कोमल आकार वाली हैं, कुरुकुल्ला हैं, कुलेश्वरी हैं; वे कुलकुण्ड में रहती हैं और कौलमार्ग में लगे साधक उनकी सेवा करते हैं।

कुमारगणनाथाम्बा तुष्टिः पुष्टिर्मतिर्धृतिः ।
शान्तिः स्वस्तिमती कान्तिर्नन्दिनी विघ्ननाशिनी ॥
९४ ॥

वे कुमार (कार्तिकेय) और गणेश की माता हैं; वे तुष्टि, पुष्टि, मति और धृति हैं; वे शान्ति, स्वस्ति, कान्ति और आनन्द देने वाली हैं, और विघ्नों का नाश करती हैं।

तेजोवती त्रिनयना लोलाक्षीकामरूपिणी ।
मालिनी हंसिनी माता मलयाचलवासिनी ॥
९५ ॥

वे तेजोमयी हैं, तीन नेत्रों वाली हैं, चंचल नेत्रों वाली हैं, इच्छानुसार रूप धारण करती हैं; वे माला धारण करती हैं, हंसिनी हैं, माता हैं, मलय पर्वत पर रहती हैं।

सुमुखी नलिनी सुभ्रूः शोभना सुरनायिका ।
कालकण्ठी कान्तिमती क्षोभिणी सूक्ष्मरूपिणी ॥
९६ ॥

वे सुन्दर मुख वाली हैं, कमल-सी कोमल, सुन्दर भौंहों वाली, शोभायमान, देवताओं की नायिका; वे कालकण्ठी (शिव की पत्नी) हैं, कान्तिमयी हैं, मन में हलचल जगाने वाली और अत्यन्त सूक्ष्म रूप वाली हैं।

वज्रेश्वरी वामदेवी वयोऽवस्थाविवर्जिता ।
सिद्धेश्वरी सिद्धविद्या सिद्धमाता यशस्विनी ॥
९७ ॥

वे वज्रेश्वरी हैं, वामदेवी हैं, आयु की अवस्थाओं से परे हैं; वे सिद्धेश्वरी हैं, सिद्धविद्या हैं, सिद्धों की माता हैं और यशस्विनी हैं।

विशुद्धिचक्रनिलयाऽऽरक्तवर्णा त्रिलोचना ।
खट्वाङ्गादिप्रहरणा वदनैकसमन्विता ॥
९८ ॥

वे विशुद्धि चक्र में रहती हैं, हल्के लाल वर्ण की हैं, तीन नेत्रों वाली हैं; वे खट्वांग आदि आयुध धारण करती हैं और उनका एक मुख है।

पायसान्नप्रिया त्वक्स्था पशुलोकभयङ्करी ।
अमृतादिमहाशक्तिसंवृता डाकिनीश्वरी ॥
९९ ॥

उन्हें खीर प्रिय है, वे त्वचा में रहती हैं, बन्धन में पड़े जीवों को भय देती हैं; अमृता आदि महाशक्तियाँ उन्हें घेरे हैं, वे डाकिनीश्वरी हैं।

अनाहताब्जनिलया श्यामाभा वदनद्वया ।
दंष्ट्रोज्ज्वलाऽक्षमालादिधरा रुधिरसंस्थिता ॥
१०० ॥

वे अनाहत कमल में रहती हैं, श्याम वर्ण की हैं, दो मुखों वाली हैं; चमकती दाढ़ों वाली, अक्षमाला आदि धारण करने वाली, वे रक्त में स्थित हैं।

कालरात्र्यादिशक्त्यौघवृता स्निग्धौदनप्रिया ।
महावीरेन्द्रवरदा राकिण्यम्बास्वरूपिणी ॥
१०१ ॥

कालरात्रि आदि शक्तियों का समूह उन्हें घेरे है, उन्हें घी से स्निग्ध अन्न प्रिय है; वे महावीरों को वर देती हैं, वे राकिणी अम्बा का स्वरूप हैं।

मणिपूराब्जनिलया वदनत्रयसंयुता ।
वज्रादिकायुधोपेता डामर्यादिभिरावृता ॥
१०२ ॥

वे मणिपूर कमल में रहती हैं, तीन मुखों वाली हैं; वे वज्र आदि आयुध धारण करती हैं और डामरी आदि शक्तियाँ उन्हें घेरे हैं।

रक्तवर्णा मांसनिष्ठा गुडान्नप्रीतमानसा ।
समस्तभक्तसुखदा लाकिन्यम्बास्वरूपिणी ॥
१०३ ॥

वे लाल वर्ण की हैं, मांस में स्थित हैं, गुड़ वाला अन्न उन्हें प्रिय है; वे सब भक्तों को सुख देती हैं, लाकिनी अम्बा का स्वरूप हैं।

स्वाधिष्ठानाम्बुजगता चतुर्वक्त्रमनोहरा ।
शूलाद्यायुधसम्पन्ना पीतवर्णाऽतिगर्विता ॥
१०४ ॥

वे स्वाधिष्ठान कमल में रहती हैं, चार मुखों से मनोहर हैं; वे त्रिशूल आदि आयुधों से युक्त हैं, पीत वर्ण की हैं और अत्यन्त गर्विता हैं।

मेदोनिष्ठा मधुप्रीता बन्धिन्यादिसमन्विता ।
दध्यन्नासक्तहृदया काकिनीरूपधारिणी ॥
१०५ ॥

वे मेद में स्थित हैं, मधु उन्हें प्रिय है, बन्धिनी आदि शक्तियाँ उनके साथ हैं; दही-भात में उनका मन रमता है, वे काकिनी का रूप धारण करती हैं।

मूलाधाराम्बुजारूढा पञ्चवक्त्राऽस्थिसंस्थिता ।
अङ्कुशादिप्रहरणा वरदादिनिषेविता ॥
१०६ ॥

वे मूलाधार कमल पर आरूढ़ हैं, पाँच मुखों वाली हैं, अस्थियों में स्थित हैं; वे अंकुश आदि आयुध धारण करती हैं और वरदा आदि शक्तियाँ उनकी सेवा करती हैं।

मुद्गौदनासक्तचित्ता साकिन्यम्बास्वरूपिणी ।
आज्ञाचक्राब्जनिलया शुक्लवर्णा षडानना ॥
१०७ ॥

मूँग-भात में उनका मन रमता है, वे साकिनी अम्बा का स्वरूप हैं; वे आज्ञा चक्र के कमल में रहती हैं, शुक्ल वर्ण की हैं, छह मुखों वाली हैं।

मज्जासंस्था हंसवतीमुख्यशक्तिसमन्विता ।
हरिद्रान्नैकरसिका हाकिनीरूपधारिणी ॥
१०८ ॥

वे मज्जा में स्थित हैं, हंसवती आदि प्रमुख शक्तियाँ उनके साथ हैं; हल्दी वाला अन्न ही उन्हें प्रिय है, वे हाकिनी का रूप धारण करती हैं।

सहस्रदलपद्मस्था सर्ववर्णोपशोभिता ।
सर्वायुधधरा शुक्लसंस्थिता सर्वतोमुखी ॥
१०९ ॥

वे सहस्रदल कमल में रहती हैं, सब वर्णों से सुशोभित हैं; वे सब आयुध धारण करती हैं, शुक्ल (जीवन के बीज) में स्थित हैं और उनके मुख सब दिशाओं में हैं।

सर्वौदनप्रीतचित्ता याकिन्यम्बास्वरूपिणी ।
स्वाहा स्वधाऽमतिर्मेधा श्रुतिः स्मृतिरनुत्तमा ॥
११० ॥

हर प्रकार का अन्न उन्हें प्रसन्न करता है, वे याकिनी अम्बा का स्वरूप हैं; वे स्वाहा हैं, स्वधा हैं, अमति और मेधा हैं, श्रुति और स्मृति हैं, सर्वश्रेष्ठ हैं।

पुण्यकीर्तिः पुण्यलभ्या पुण्यश्रवणकीर्तना ।
पुलोमजार्चिता बन्धमोचनी बर्बरालका ॥
१११ ॥

उनकी कीर्ति पवित्र है, वे पुण्य से प्राप्त होती हैं, उनका नाम सुनना और गाना पुण्य है; इन्द्राणी शची उनकी पूजा करती हैं; वे बन्धन से छुड़ाती हैं और उनके केश घुँघराले हैं।

विमर्शरूपिणी विद्या वियदादिजगत्प्रसूः ।
सर्वव्याधिप्रशमनी सर्वमृत्युनिवारिणी ॥
११२ ॥

वे विमर्श-रूपिणी हैं, विद्या हैं, आकाश आदि से बने जगत की जननी हैं; वे सब रोगों को शान्त करती हैं और हर मृत्यु को टालती हैं।

अग्रगण्याऽचिन्त्यरूपा कलिकल्मषनाशिनी ।
कात्यायनी कालहन्त्री कमलाक्षनिषेविता ॥
११३ ॥

वे सबमें अग्रगण्य हैं, उनका रूप चिन्तन से परे है, वे कलियुग के पापों का नाश करती हैं; वे कात्यायनी हैं, काल का अन्त करने वाली हैं, कमलनयन विष्णु उनकी सेवा करते हैं।

ताम्बूलपूरितमुखी दाडिमीकुसुमप्रभा ।
मृगाक्षी मोहिनी मुख्या मृडानी मित्ररूपिणी ॥
११४ ॥

उनका मुख पान से भरा है, वे अनार के फूल-सी दमकती हैं; वे मृगनयनी हैं, मोहिनी हैं, सबमें मुख्य हैं, मृडानी (शिव की पत्नी) हैं, सबकी मित्र हैं।

नित्यतृप्ता भक्तनिधिर्नियन्त्री निखिलेश्वरी ।
मैत्र्यादिवासनालभ्या महाप्रलयसाक्षिणी ॥
११५ ॥

वे नित्यतृप्त हैं, भक्तों की निधि हैं, सबका नियमन करती हैं, सबकी ईश्वरी हैं; वे मैत्री आदि शुभ भावों से प्राप्त होती हैं और महाप्रलय की साक्षी हैं।

पराशक्तिः परानिष्ठा प्रज्ञानघनरूपिणी ।
माध्वीपानालसा मत्ता मातृकावर्णरूपिणी ॥
११६ ॥

वे पराशक्ति हैं, परम निष्ठा हैं, प्रज्ञानघन स्वरूप हैं; माध्वी (मधुर आनन्द-रस) के पान से अलसाई, उसमें मग्न, वे मातृका वर्णों (अक्षरों) का रूप हैं।

महाकैलासनिलया मृणालमृदुदोर्लता ।
महनीया दयामूर्तिर्महासाम्राज्यशालिनी ॥
११७ ॥

वे महाकैलास पर रहती हैं, उनकी भुजाएँ कमलनाल-सी कोमल हैं; वे पूजनीय हैं, दया की मूर्ति हैं और महान साम्राज्य की स्वामिनी हैं।

आत्मविद्या महाविद्या श्रीविद्या कामसेविता ।
श्रीषोडशाक्षरीविद्या त्रिकूटा कामकोटिका ॥
११८ ॥

वे आत्मविद्या हैं, महाविद्या हैं, श्रीविद्या हैं, कामदेव उनकी सेवा करते हैं; वे षोडशाक्षरी श्रीविद्या हैं, त्रिकूटा हैं, कामकोटिका हैं।

कटाक्षकिङ्करीभूतकमलाकोटिसेविता ।
शिरःस्थिता चन्द्रनिभा भालस्थेन्द्रधनुःप्रभा ॥
११९ ॥

उनकी एक कटाक्ष से दासी बनी करोड़ों लक्ष्मियाँ उनकी सेवा करती हैं; सिर में वे चन्द्रमा-सी और ललाट पर इन्द्रधनुष-सी शोभती हैं।

हृदयस्था रविप्रख्या त्रिकोणान्तरदीपिका ।
दाक्षायणी दैत्यहन्त्री दक्षयज्ञविनाशिनी ॥
१२० ॥

हृदय में वे सूर्य-सी दीप्त हैं, त्रिकोण के भीतर दीपक हैं; वे दाक्षायणी हैं, दैत्यों का वध करती हैं, दक्ष के यज्ञ का विनाश करने वाली हैं।

दरान्दोलितदीर्घाक्षी दरहासोज्ज्वलन्मुखी ।
गुरुमूर्तिर्गुणनिधिर्गोमाता गुहजन्मभूः ॥
१२१ ॥

उनकी लम्बी आँखें धीरे-धीरे डोलती हैं, मन्द हँसी से उनका मुख उज्ज्वल है; वे गुरु-मूर्ति हैं, गुणों की निधि हैं, गोमाता हैं और गुह (कार्तिकेय) की जन्मभूमि हैं।

देवेशी दण्डनीतिस्था दहराकाशरूपिणी ।
प्रतिपन्मुख्यराकान्ततिथिमण्डलपूजिता ॥
१२२ ॥

वे देवेशी हैं, दण्डनीति (न्याय) में स्थित हैं, हृदय के भीतर के आकाश का रूप हैं; प्रतिपदा से पूर्णिमा तक तिथियों के मण्डल में उनकी पूजा होती है।

कलात्मिका कलानाथा काव्यालापविनोदिनी ।
सचामररमावाणीसव्यदक्षिणसेविता ॥
१२३ ॥

वे कलात्मिका हैं, कलाओं की स्वामिनी हैं, काव्य-चर्चा में आनन्द लेती हैं; चँवर लिए लक्ष्मी और सरस्वती उनके बाएँ और दाएँ सेवा करती हैं।

आदिशक्तिरमेयात्मा परमा पावनाकृतिः ।
अनेककोटिब्रह्माण्डजननी दिव्यविग्रहा ॥
१२४ ॥

वे आदिशक्ति हैं, अमेय आत्मा हैं, परमा हैं, पवित्र आकृति वाली हैं; वे अनेक करोड़ ब्रह्माण्डों की जननी हैं, दिव्य विग्रह वाली हैं।

क्लीङ्कारी केवला गुह्या कैवल्यपददायिनी ।
त्रिपुरा त्रिजगद्वन्द्या त्रिमूर्तिस्त्रिदशेश्वरी ॥
१२५ ॥

वे क्लींकार हैं, केवला (अद्वितीय) हैं, गुह्या हैं, कैवल्य पद देती हैं; वे त्रिपुरा हैं, तीनों लोक उनकी वन्दना करते हैं, वे त्रिमूर्ति हैं, देवताओं की ईश्वरी हैं।

त्र्यक्षरी दिव्यगन्धाढ्या सिन्दूरतिलकाञ्चिता ।
उमा शैलेन्द्रतनया गौरी गन्धर्वसेविता ॥
१२६ ॥

वे त्र्यक्षरी हैं, दिव्य सुगन्ध से भरी हैं, सिन्दूर के तिलक से शोभित हैं; वे उमा हैं, गिरिराज की पुत्री हैं, गौरी हैं, गन्धर्व उनकी सेवा करते हैं।

विश्वगर्भा स्वर्णगर्भाऽवरदा वागधीश्वरी ।
ध्यानगम्याऽपरिच्छेद्या ज्ञानदा ज्ञानविग्रहा ॥
१२७ ॥

सारा विश्व उनके गर्भ में है, वे स्वर्णगर्भा हैं, अधम का नाश करती हैं, वाणी की अधीश्वरी हैं; वे ध्यान से प्राप्त होती हैं, अपरिच्छेद्य हैं, ज्ञान देती हैं, ज्ञान का विग्रह हैं।

सर्ववेदान्तसंवेद्या सत्यानन्दस्वरूपिणी ।
लोपामुद्रार्चिता लीलाकॢप्तब्रह्माण्डमण्डला ॥
१२८ ॥

सारा वेदान्त उन्हें ही जानता है, वे सत्य और आनन्द का स्वरूप हैं; लोपामुद्रा उनकी पूजा करती हैं, और उन्होंने लीला से ब्रह्माण्डों की रचना की है।

अदृश्या दृश्यरहिता विज्ञात्री वेद्यवर्जिता ।
योगिनी योगदा योग्या योगानन्दा युगन्धरा ॥
१२९ ॥

वे अदृश्य हैं, उनके लिए देखने को कुछ नहीं, वे ज्ञाता हैं और उनके लिए जानने को कुछ शेष नहीं; वे योगिनी हैं, योग देती हैं, योग्या हैं, योगानन्दा हैं, युगों को धारण करती हैं।

इच्छाशक्तिज्ञानशक्तिक्रियाशक्तिस्वरूपिणी ।
सर्वाधारा सुप्रतिष्ठा सदसद्रूपधारिणी ॥
१३० ॥

वे इच्छाशक्ति, ज्ञानशक्ति और क्रियाशक्ति का स्वरूप हैं; वे सबका आधार हैं, सुप्रतिष्ठित हैं, सत् और असत् दोनों का रूप धारण करती हैं।

अष्टमूर्तिरजाजैत्री लोकयात्राविधायिनी ।
एकाकिनी भूमरूपा निर्द्वैता द्वैतवर्जिता ॥
१३१ ॥

वे अष्टमूर्ति हैं, अविद्या को जीतने वाली हैं, लोकों की यात्रा का विधान करती हैं; वे एकाकिनी हैं, भूमा (सब कुछ) हैं, अद्वैत हैं, द्वैत से परे हैं।

अन्नदा वसुदा वृद्धा ब्रह्मात्मैक्यस्वरूपिणी ।
बृहती ब्राह्मणी ब्राह्मी ब्रह्मानन्दा बलिप्रिया ॥
१३२ ॥

वे अन्न देती हैं, धन देती हैं, वे वृद्धा (सनातन) हैं, ब्रह्म और आत्मा की एकता का स्वरूप हैं; वे बृहती हैं, ब्राह्मणी हैं, ब्राह्मी हैं, ब्रह्मानन्दा हैं, बलि (भेंट) उन्हें प्रिय है।

भाषारूपा बृहत्सेना भावाभावविवर्जिता ।
सुखाराध्या शुभकरी शोभना सुलभा गतिः ॥
१३३ ॥

वे भाषा का रूप हैं, विशाल सेना वाली हैं, भाव और अभाव से परे हैं; उनकी आराधना सहज है, वे शुभ करती हैं, शोभना हैं, सुलभ हैं, वे ही गति हैं।

राजराजेश्वरी राज्यदायिनी राज्यवल्लभा ।
राजत्कृपा राजपीठनिवेशितनिजाश्रिता ॥
१३४ ॥

वे राजराजेश्वरी हैं, राज्य देने वाली और राज्य को प्रिय रखने वाली; उनकी कृपा दमकती है, और अपनी शरण आए लोगों को वे राजसिंहासन पर बिठाती हैं।

राज्यलक्ष्मीः कोशनाथा चतुरङ्गबलेश्वरी ।
साम्राज्यदायिनी सत्यसन्धा सागरमेखला ॥
१३५ ॥

वे राज्यलक्ष्मी हैं, कोश की स्वामिनी हैं, चतुरंगिणी सेना की ईश्वरी हैं; वे साम्राज्य देती हैं, सत्य-प्रतिज्ञ हैं, समुद्र उनकी करधनी है।

दीक्षिता दैत्यशमनी सर्वलोकवशङ्करी ।
सर्वार्थदात्री सावित्री सच्चिदानन्दरूपिणी ॥
१३६ ॥

वे दीक्षिता हैं, दैत्यों का शमन करती हैं, सब लोकों को वश में रखती हैं; वे सब अर्थ देती हैं, सावित्री हैं, सच्चिदानन्द-रूपिणी हैं।

देशकालापरिच्छिन्ना सर्वगा सर्वमोहिनी ।
सरस्वती शास्त्रमयी गुहाम्बा गुह्यरूपिणी ॥
१३७ ॥

वे देश और काल से अपरिच्छिन्न हैं, सर्वत्र व्याप्त हैं, सबको मोहित करती हैं; वे सरस्वती हैं, शास्त्रमयी हैं, गुह की माता हैं, गुह्य रूप वाली हैं।

सर्वोपाधिविनिर्मुक्ता सदाशिवपतिव्रता ।
सम्प्रदायेश्वरी साध्वी गुरुमण्डलरूपिणी ॥
१३८ ॥

वे सब उपाधियों से मुक्त हैं, सदाशिव की पतिव्रता हैं; वे सम्प्रदायों की ईश्वरी हैं, साध्वी हैं, गुरु-मण्डल का स्वरूप हैं।

कुलोत्तीर्णा भगाराध्या माया मधुमती मही ।
गणाम्बा गुह्यकाराध्या कोमलाङ्गी गुरुप्रिया ॥
१३९ ॥

वे कुल से परे हैं, सूर्यमण्डल में आराध्या हैं, माया हैं, मधुमती हैं, मही (पृथ्वी) हैं; वे गणों की माता हैं, गुह्यक उनकी आराधना करते हैं, कोमल अंगों वाली हैं और गुरु को प्रिय हैं।

स्वतन्त्रा सर्वतन्त्रेशी दक्षिणामूर्तिरूपिणी ।
सनकादिसमाराध्या शिवज्ञानप्रदायिनी ॥
१४० ॥

वे स्वतन्त्र हैं, सब तन्त्रों की ईश्वरी हैं, दक्षिणामूर्ति का रूप हैं; सनक आदि ऋषि उनकी आराधना करते हैं, और वे शिव-ज्ञान देती हैं।

चित्कलाऽऽनन्दकलिका प्रेमरूपा प्रियङ्करी ।
नामपारायणप्रीता नन्दिविद्या नटेश्वरी ॥
१४१ ॥

वे चित्कला हैं, आनन्द की कली हैं, प्रेम का रूप हैं, प्रिय करने वाली हैं; नामों के पारायण से वे प्रसन्न होती हैं, वे नन्दिविद्या हैं, नटेश्वरी हैं।

मिथ्याजगदधिष्ठाना मुक्तिदा मुक्तिरूपिणी ।
लास्यप्रिया लयकरी लज्जा रम्भादिवन्दिता ॥
१४२ ॥

वे मिथ्या जगत का अधिष्ठान हैं, मुक्ति देती हैं, मुक्ति का रूप हैं; लास्य नृत्य उन्हें प्रिय है, वे लय करती हैं, वे लज्जा हैं, रम्भा आदि अप्सराएँ उनकी वन्दना करती हैं।

भवदावसुधावृष्टिः पापारण्यदवानला ।
दौर्भाग्यतूलवातूला जराध्वान्तरविप्रभा ॥
१४३ ॥

संसार के दावानल पर वे अमृत की वर्षा हैं, पाप के वन के लिए दावानल हैं; दुर्भाग्य की रुई के लिए आँधी हैं, बुढ़ापे के अन्धकार के लिए सूर्य की प्रभा हैं।

भाग्याब्धिचन्द्रिका भक्तचित्तकेकिघनाघना ।
रोगपर्वतदम्भोलिर्मृत्युदारुकुठारिका ॥
१४४ ॥

वे सौभाग्य-सागर के लिए चाँदनी हैं, भक्तों के मन-मयूरों के लिए घने बादल हैं; रोग के पर्वत के लिए वज्र हैं, मृत्यु रूपी वृक्ष के लिए कुल्हाड़ी हैं।

महेश्वरी महाकाली महाग्रासा महाशना ।
अपर्णा चण्डिका चण्डमुण्डासुरनिषूदिनी ॥
१४५ ॥

वे महेश्वरी हैं, महाकाली हैं, महान को भी ग्रस लेने वाली, सबको खा जाने वाली; वे अपर्णा हैं, चण्डिका हैं, चण्ड और मुण्ड असुरों का वध करने वाली हैं।

क्षराक्षरात्मिका सर्वलोकेशी विश्वधारिणी ।
त्रिवर्गदात्री सुभगा त्र्यम्बका त्रिगुणात्मिका ॥
१४६ ॥

वे क्षर और अक्षर दोनों का स्वरूप हैं, सब लोकों की ईश्वरी हैं, विश्व को धारण करती हैं; वे धर्म, अर्थ और काम देती हैं, सुभगा हैं, त्र्यम्बका हैं, त्रिगुणात्मिका हैं।

स्वर्गापवर्गदा शुद्धा जपापुष्पनिभाकृतिः ।
ओजोवती द्युतिधरा यज्ञरूपा प्रियव्रता ॥
१४७ ॥

वे स्वर्ग और मोक्ष देती हैं, शुद्ध हैं, उनका रूप गुड़हल के फूल-सा है; वे ओजस्विनी हैं, कान्तिमयी हैं, यज्ञ-रूपा हैं, व्रत उन्हें प्रिय हैं।

दुराराध्या दुराधर्षा पाटलीकुसुमप्रिया ।
महती मेरुनिलया मन्दारकुसुमप्रिया ॥
१४८ ॥

उनकी आराधना कठिन है, उन्हें कोई दबा नहीं सकता, पाटली का फूल उन्हें प्रिय है; वे महती हैं, मेरु पर रहती हैं, मन्दार का फूल उन्हें प्रिय है।

वीराराध्या विराड्रूपा विरजा विश्वतोमुखी ।
प्रत्यग्रूपा पराकाशा प्राणदा प्राणरूपिणी ॥
१४९ ॥

वीर उनकी आराधना करते हैं; वे विराट् रूप हैं, रजोगुण से रहित हैं, सब ओर मुख वाली हैं; वे अन्तरात्मा हैं, परम आकाश हैं, प्राण देती हैं और स्वयं प्राण हैं।

मार्ताण्डभैरवाराध्या मन्त्रिणीन्यस्तराज्यधूः ।
त्रिपुरेशी जयत्सेना निस्त्रैगुण्या परापरा ॥
१५० ॥

मार्तण्ड भैरव उनकी आराधना करते हैं; उन्होंने राज्य का भार मन्त्रिणी को सौंपा है; वे त्रिपुरेशी हैं, उनकी सेना सदा विजयी है, वे तीनों गुणों से परे हैं, परा भी हैं और अपरा भी।

सत्यज्ञानानन्दरूपा सामरस्यपरायणा ।
कपर्दिनी कलामाला कामधुक्कामरूपिणी ॥
१५१ ॥

वे सत्य, ज्ञान और आनन्द का रूप हैं, शिव-शक्ति के सामरस्य में लीन हैं; वे कपर्दिनी (जटाधारी शिव की पत्नी) हैं, कलाओं की माला हैं, कामधेनु हैं, कामरूपिणी हैं।

कलानिधिः काव्यकला रसज्ञा रसशेवधिः ।
पुष्टा पुरातना पूज्या पुष्करा पुष्करेक्षणा ॥
१५२ ॥

वे कलाओं की निधि हैं, काव्य-कला हैं, रसों की ज्ञाता हैं, रस का भण्डार हैं; वे पुष्टा हैं, पुरातना हैं, पूज्या हैं, पुष्करा हैं, कमल-नयनी हैं।

परञ्ज्योतिः परन्धाम परमाणुः परात्परा ।
पाशहस्ता पाशहन्त्री परमन्त्रविभेदिनी ॥
१५३ ॥

वे परम ज्योति हैं, परम धाम हैं, परम अणु हैं, परात्परा हैं; वे हाथ में पाश लिए हैं, पाश काटती हैं, और दूसरों के मन्त्रों को तोड़ देती हैं।

मूर्ताऽमूर्ताऽनित्यतृप्ता मुनिमानसहंसिका ।
सत्यव्रता सत्यरूपा सर्वान्तर्यामिणी सती ॥
१५४ ॥

वे मूर्त भी हैं, अमूर्त भी, नश्वर वस्तुओं की भेंट से भी तृप्त होती हैं, मुनियों के मन की हंसिनी हैं; वे सत्यव्रता हैं, सत्य-रूपा हैं, सबकी अन्तर्यामी हैं, सती हैं।

ब्रह्माणी ब्रह्मजननी बहुरूपा बुधार्चिता ।
प्रसवित्री प्रचण्डाऽऽज्ञा प्रतिष्ठा प्रकटाकृतिः ॥
१५५ ॥

वे ब्रह्माणी हैं, ब्रह्मा की जननी हैं, बहुरूपा हैं, ज्ञानी उनकी पूजा करते हैं; वे सबको जन्म देती हैं, उनकी आज्ञा प्रचण्ड है, वे प्रतिष्ठा (आधार) हैं, प्रकट रूप वाली हैं।

प्राणेश्वरी प्राणदात्री पञ्चाशत्पीठरूपिणी ।
विशृङ्खला विविक्तस्था वीरमाता वियत्प्रसूः ॥
१५६ ॥

वे प्राणों की ईश्वरी हैं, प्राण देती हैं, पचास पीठों का रूप हैं; वे बन्धनरहित हैं, एकान्त में रहती हैं, वीरों की माता हैं, आकाश की जननी हैं।

मुकुन्दा मुक्तिनिलया मूलविग्रहरूपिणी ।
भावज्ञा भवरोगघ्नी भवचक्रप्रवर्तिनी ॥
१५७ ॥

वे मुकुन्दा हैं, मुक्ति का धाम हैं, मूल-विग्रह का स्वरूप हैं; वे सब भावों को जानती हैं, संसार-रोग का नाश करती हैं और भवचक्र को चलाती हैं।

छन्दःसारा शास्त्रसारा मन्त्रसारा तलोदरी ।
उदारकीर्तिरुद्दामवैभवा वर्णरूपिणी ॥
१५८ ॥

वे वेदों का सार हैं, शास्त्रों का सार हैं, मन्त्रों का सार हैं, पतली कमर वाली हैं; उनकी कीर्ति उदार है, वैभव असीम है, वे वर्णों का रूप हैं।

जन्ममृत्युजरातप्तजनविश्रान्तिदायिनी ।
सर्वोपनिषदुद्घुष्टा शान्त्यतीतकलात्मिका ॥
१५९ ॥

जन्म, मृत्यु और जरा से तपे लोगों को वे विश्राम देती हैं; सब उपनिषद् उनकी घोषणा करते हैं, वे शान्ति से भी परे की कला हैं।

गम्भीरा गगनान्तस्था गर्विता गानलोलुपा ।
कल्पनारहिता काष्ठाऽकान्ता कान्तार्धविग्रहा ॥
१६० ॥

वे गम्भीर हैं, आकाश में स्थित हैं, गर्विता हैं, संगीत की प्रेमी हैं; वे कल्पना से रहित हैं, परम सीमा (लक्ष्य) हैं, दुःख-पाप का अन्त करती हैं, अपने प्रियतम के आधे शरीर वाली हैं।

कार्यकारणनिर्मुक्ता कामकेलितरङ्गिता ।
कनत्कनकताटङ्का लीलाविग्रहधारिणी ॥
१६१ ॥

वे कार्य और कारण से मुक्त हैं, काम-केलि की तरंगों से भरी हैं; वे चमकते सोने के कुण्डल पहनती हैं और लीला से अनेक रूप धारण करती हैं।

अजा क्षयविनिर्मुक्ता मुग्धा क्षिप्रप्रसादिनी ।
अन्तर्मुखसमाराध्या बहिर्मुखसुदुर्लभा ॥
१६२ ॥

वे अजन्मा हैं, क्षय से मुक्त हैं, मुग्धा हैं, शीघ्र प्रसन्न होती हैं; अन्तर्मुखी साधक उनकी आराधना करते हैं, बहिर्मुखी लोगों के लिए वे अत्यन्त दुर्लभ हैं।

त्रयी त्रिवर्गनिलया त्रिस्था त्रिपुरमालिनी ।
निरामया निरालम्बा स्वात्मारामा सुधासृतिः ॥
१६३ ॥

वे त्रयी (तीनों वेद) हैं, धर्म-अर्थ-काम का धाम हैं, तीनों में स्थित हैं, त्रिपुरमालिनी हैं; वे निरामया हैं, निरालम्बा हैं, अपने आत्मा में रमती हैं, अमृत की धारा हैं।

संसारपङ्कनिर्मग्नसमुद्धरणपण्डिता ।
यज्ञप्रिया यज्ञकर्त्री यजमानस्वरूपिणी ॥
१६४ ॥

संसार के कीचड़ में डूबे लोगों को उबारने में वे निपुण हैं; वे यज्ञ-प्रिया हैं, यज्ञ करने वाली हैं और स्वयं यजमान का स्वरूप हैं।

धर्माधारा धनाध्यक्षा धनधान्यविवर्धिनी ।
विप्रप्रिया विप्ररूपा विश्वभ्रमणकारिणी ॥
१६५ ॥

वे धर्म का आधार हैं, धन की अध्यक्षा हैं, धन-धान्य बढ़ाती हैं; विद्वान उन्हें प्रिय हैं, वे विप्र-रूपा हैं, और विश्व को घुमाती हैं।

विश्वग्रासा विद्रुमाभा वैष्णवी विष्णुरूपिणी ।
अयोनिर्योनिनिलया कूटस्था कुलरूपिणी ॥
१६६ ॥

वे विश्व को ग्रस लेती हैं, मूँगे-सी दमकती हैं, वैष्णवी हैं, विष्णु-रूपिणी हैं; वे अयोनि हैं, सब योनियों का धाम हैं, कूटस्थ हैं, कुल-रूपिणी हैं।

वीरगोष्ठीप्रिया वीरा नैष्कर्म्या नादरूपिणी ।
विज्ञानकलना कल्या विदग्धा बैन्दवासना ॥
१६७ ॥

वीरों की गोष्ठी उन्हें प्रिय है, वे वीरा हैं, नैष्कर्म्य हैं, नाद-रूपिणी हैं; वे विज्ञान की पूर्णता हैं, सृष्टि में समर्थ हैं, विदग्धा हैं, बिन्दु-आसन पर विराजती हैं।

तत्त्वाधिका तत्त्वमयी तत्त्वमर्थस्वरूपिणी ।
सामगानप्रिया सौम्या सदाशिवकुटुम्बिनी ॥
१६८ ॥

वे तत्त्वों से परे हैं और तत्त्वमयी हैं, 'तत्' और 'त्वम्' का अर्थ हैं; सामगान उन्हें प्रिय है, वे सौम्या हैं, सदाशिव की पत्नी हैं।

सव्यापसव्यमार्गस्था सर्वापद्विनिवारिणी ।
स्वस्था स्वभावमधुरा धीरा धीरसमर्चिता ॥
१६९ ॥

वे सव्य और अपसव्य दोनों मार्गों में स्थित हैं, सब आपदाओं को दूर करती हैं; वे स्वस्था हैं, स्वभाव से मधुर हैं, धीरा हैं, धीर पुरुष उनकी पूजा करते हैं।

चैतन्यार्घ्यसमाराध्या चैतन्यकुसुमप्रिया ।
सदोदिता सदातुष्टा तरुणादित्यपाटला ॥
१७० ॥

चैतन्य के अर्घ्य से उनकी आराधना होती है, चैतन्य-रूपी पुष्प उन्हें प्रिय है; वे सदा उदित हैं, सदा तुष्ट हैं, बाल-सूर्य-सी अरुण हैं।

दक्षिणादक्षिणाराध्या दरस्मेरमुखाम्बुजा ।
कौलिनीकेवलाऽनर्घ्यकैवल्यपददायिनी ॥
१७१ ॥

ज्ञानी और साधारण दोनों उनकी आराधना करते हैं, उनका मुख-कमल मन्द मुस्कान से खिला है; वे कौलिनी हैं, केवला हैं, और अमूल्य कैवल्य-पद देती हैं।

स्तोत्रप्रिया स्तुतिमती श्रुतिसंस्तुतवैभवा ।
मनस्विनी मानवती महेशी मङ्गलाकृतिः ॥
१७२ ॥

स्तोत्र उन्हें प्रिय हैं, सब स्तुतियाँ उन्हीं की हैं, श्रुतियाँ उनके वैभव का गान करती हैं; वे मनस्विनी हैं, मानवती हैं, महेश की पत्नी हैं, मंगलमय आकृति वाली हैं।

विश्वमाता जगद्धात्री विशालाक्षी विरागिणी ।
प्रगल्भा परमोदारा परामोदा मनोमयी ॥
१७३ ॥

वे विश्व की माता हैं, जगत का पालन करने वाली हैं, विशाल नेत्रों वाली हैं, वैराग्यमयी हैं; वे प्रगल्भा हैं, परम उदार हैं, परम आनन्दमयी हैं, मनोमयी हैं।

व्योमकेशी विमानस्था वज्रिणी वामकेश्वरी ।
पञ्चयज्ञप्रिया पञ्चप्रेतमञ्चाधिशायिनी ॥
१७४ ॥

आकाश उनके केश हैं, वे दिव्य विमान में विराजती हैं, वज्र धारण करती हैं, वामकेश्वरी हैं; पाँच यज्ञ उन्हें प्रिय हैं, और वे पंचप्रेत के मंच पर शयन करती हैं।

पञ्चमी पञ्चभूतेशी पञ्चसङ्ख्योपचारिणी ।
शाश्वती शाश्वतैश्वर्या शर्मदा शम्भुमोहिनी ॥
१७५ ॥

वे पंचमी हैं, पंचभूतों की ईश्वरी हैं, पाँच उपचारों से पूजी जाती हैं; वे शाश्वती हैं, उनका ऐश्वर्य शाश्वत है, वे सुख देती हैं, शम्भु को मोहित करती हैं।

धरा धरसुता धन्या धर्मिणी धर्मवर्धिनी ।
लोकातीता गुणातीता सर्वातीता शमात्मिका ॥
१७६ ॥

वे धरा हैं, पर्वतराज की पुत्री हैं, धन्या हैं, धर्मिणी हैं, धर्म को बढ़ाती हैं; वे लोकों से परे हैं, गुणों से परे हैं, सबसे परे हैं, शान्ति-स्वरूपा हैं।

बन्धूककुसुमप्रख्या बाला लीलाविनोदिनी ।
सुमङ्गली सुखकरी सुवेषाढ्या सुवासिनी ॥
१७७ ॥

वे बन्धूक के फूल-सी दमकती हैं, बाला हैं, लीला में आनन्द लेती हैं; वे सुमंगली हैं, सुख देने वाली हैं, सुन्दर वेश से सजी हैं, सुवासिनी हैं।

सुवासिन्यर्चनप्रीताऽऽशोभना शुद्धमानसा ।
बिन्दुतर्पणसन्तुष्टा पूर्वजा त्रिपुराम्बिका ॥
१७८ ॥

सुवासिनियों की पूजा से वे प्रसन्न होती हैं, शोभना हैं, शुद्ध मन वाली हैं; बिन्दु-तर्पण से वे सन्तुष्ट होती हैं, वे पूर्वजा हैं, त्रिपुराम्बिका हैं।

दशमुद्रासमाराध्या त्रिपुराश्रीवशङ्करी ।
ज्ञानमुद्रा ज्ञानगम्या ज्ञानज्ञेयस्वरूपिणी ॥
१७९ ॥

दस मुद्राओं से उनकी आराधना होती है, त्रिपुराश्री उनके वश में हैं; वे ज्ञानमुद्रा हैं, ज्ञान से प्राप्त होती हैं, ज्ञान और ज्ञेय दोनों का स्वरूप हैं।

योनिमुद्रा त्रिखण्डेशी त्रिगुणाऽम्बा त्रिकोणगा ।
अनघाऽद्भुतचारित्रा वाञ्छितार्थप्रदायिनी ॥
१८० ॥

वे योनिमुद्रा हैं, त्रिखण्डेशी हैं, त्रिगुणा हैं, अम्बा हैं, त्रिकोण में रहती हैं; वे निष्पाप हैं, उनके चरित्र अद्भुत हैं, और वे मनचाहा फल देती हैं।

अभ्यासातिशयज्ञाता षडध्वातीतरूपिणी ।
अव्याजकरुणामूर्तिरज्ञानध्वान्तदीपिका ॥
१८१ ॥

वे निरन्तर गहन अभ्यास से जानी जाती हैं, उनका रूप छह मार्गों से परे है; वे अकारण करुणा की मूर्ति हैं, अज्ञान के अन्धकार को मिटाने वाला दीपक हैं।

आबालगोपविदिता सर्वानुल्लङ्घ्यशासना ।
श्रीचक्रराजनिलया श्रीमत्त्रिपुरसुन्दरी ॥
१८२ ॥

बालक और ग्वाले तक उन्हें जानते हैं, उनकी आज्ञा कोई नहीं टाल सकता; वे चक्रराज श्रीचक्र में निवास करती हैं, श्रीमत् त्रिपुरसुन्दरी हैं।

श्रीशिवा शिवशक्त्यैक्यरूपिणी ललिताम्बिका ।
एवं श्रीललितादेव्या नाम्नां साहस्रकं जगुः ॥
१८३ ॥

वे श्रीशिवा हैं, शिव और शक्ति की एकता का स्वरूप हैं, ललिताम्बिका हैं। इस प्रकार वशिनी आदि वाग्देवियों ने श्री ललिता देवी के सहस्र नामों का गान किया।

इन दिनों पर