मार्कण्डेय उवाच ।
ॐ विशुद्धज्ञानदेहाय त्रिवेदीदिव्यचक्षुषे ।
श्रेयःप्राप्तिनिमित्ताय नमः सोमार्धधारिणे॥
mārkaṇḍeya uvāca | oṃ viśuddhajñānadehāya trivedīdivyacakṣuṣe | śreyaḥprāptinimittāya namaḥ somārdhadhāriṇe || 1||
मार्कण्डेय जी ने कहा — ॐ, जिनका शरीर विशुद्ध ज्ञानमय है, तीनों वेद जिनके दिव्य नेत्र हैं, जो कल्याण की प्राप्ति के कारण हैं, उन अर्धचन्द्रधारी शिव को नमस्कार है।
सर्वमेतद्विजानीयान्मन्त्राणामभिकीलकम् ।
सोऽपि क्षेममवाप्नोति सततं जाप्यतत्परः॥
sarvametadvijānīyānmantrāṇāmabhikīlakam | so'pi kṣemamavāpnoti satataṃ jāpyatatparaḥ || 2||
यह सब — यह कीलक स्तोत्र — मन्त्रों का कीलक है, यह जान लेना चाहिए। जो सदा इसके जप में तत्पर रहता है, वह भी क्षेम पाता है।
सिद्ध्यन्त्युच्चाटनादीनि वस्तूनि सकलान्यपि ।
एतेन स्तुवतां देवीं स्तोत्रमात्रेण सिद्ध्यति॥
siddhyantyuccāṭanādīni vastūni sakalānyapi | etena stuvatāṃ devīṃ stotramātreṇa siddhyati || 3||
उच्चाटन आदि सब कर्म सिद्ध होते हैं; इस स्तोत्र मात्र से देवी की स्तुति करने वालों के सब कार्य सिद्ध हो जाते हैं।
न मन्त्रो नौषधं तत्र न किञ्चिदपि विद्यते ।
विना जाप्येन सिद्ध्येत सर्वमुच्चाटनादिकम्॥
na mantro nauṣadhaṃ tatra na kiñcidapi vidyate | vinā jāpyena siddhyeta sarvamuccāṭanādikam || 4||
वहाँ न किसी मन्त्र की आवश्यकता है, न औषधि की, न किसी और चीज़ की; इस जप के बिना उच्चाटन आदि कुछ भी सिद्ध नहीं होता।
समग्राण्यपि सिद्ध्यन्ति लोकशङ्कामिमां हरः ।
कृत्वा निमन्त्रयामास सर्वमेवमिदं शुभम्॥
samagrāṇyapi siddhyanti lokaśaṅkāmimāṃ haraḥ | kṛtvā nimantrayāmāsa sarvamevamidaṃ śubham || 5||
लोगों की इस शंका को — कि क्या इससे ही सब सिद्ध हो जाता है — दूर करने के लिए शिव ने इस सारे शुभ स्तोत्र को कीलित करके नियमित कर दिया।
स्तोत्रं वै चण्डिकायास्तु तच्च गुप्तं चकार सः ।
समाप्तिर्न च पुण्यस्य तां यथावन्नियन्त्रणाम्॥
stotraṃ vai caṇḍikāyāstu tacca guptaṃ cakāra saḥ | samāptirna ca puṇyasya tāṃ yathāvanniyantraṇām || 6||
उन्होंने चण्डिका के इस स्तोत्र को गुप्त कर दिया; जो इसे नियम से पढ़ता है, उसके पुण्य का कभी अन्त नहीं होता।
सोऽपि क्षेममवाप्नोति सर्वमेवं न संशयः ।
कृष्णायां वा चतुर्दश्यामष्टम्यां वा समाहितः॥
so'pi kṣemamavāpnoti sarvamevaṃ na saṃśayaḥ | kṛṣṇāyāṃ vā caturdaśyāmaṣṭamyāṃ vā samāhitaḥ || 7||
वह निःसंदेह सब प्रकार का क्षेम पाता है। जो कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी या अष्टमी को एकाग्र मन से इसका पाठ करता है —
ददाति प्रतिगृह्णाति नान्यथैषा प्रसीदति ।
इत्थंरुपेण कीलेन महादेवेन कीलितम्॥
dadāti pratigṛhṇāti nānyathaiṣā prasīdati | itthaṃrupeṇa kīlena mahādevena kīlitam || 8||
और देवी को सब अर्पित करके उसे प्रसाद रूप में ग्रहण करता है — देवी उसी पर प्रसन्न होती हैं, अन्यथा नहीं। इसी कीलक से महादेव ने इसे कीलित किया है।
यो निष्कीलां विधायैनां नित्यं जपति संस्फुटम् ।
स सिद्धः स गणः सोऽपि गन्धर्वो जायते नरः॥
yo niṣkīlāṃ vidhāyaināṃ nityaṃ japati saṃsphuṭam | sa siddhaḥ sa gaṇaḥ so'pi gandharvo jāyate naraḥ || 9||
जो इसे निष्कीलित करके नित्य स्पष्ट रूप से जप करता है, वह मनुष्य सिद्ध होता है, शिव का गण होता है, गन्धर्व हो जाता है।
न चैवाप्यटतस्तस्य भयं क्वापीह जायते ।
नापमृत्युवशं याति मृतो मोक्षमवाप्नुयात्॥
na caivāpyaṭatastasya bhayaṃ kvāpīha jāyate | nāpamṛtyuvaśaṃ yāti mṛto mokṣamavāpnuyāt || 10||
वह जहाँ भी विचरे, उसे कहीं भय नहीं होता; वह अपमृत्यु के वश में नहीं आता और मरने पर मोक्ष पाता है।
ज्ञात्वा प्रारभ्य कुर्वीत ह्यकुर्वाणो विनश्यति ।
ततो ज्ञात्वैव सम्पूर्णमिदं प्रारभ्यते बुधैः॥
jñātvā prārabhya kurvīta hyakurvāṇo vinaśyati | tato jñātvaiva sampūrṇamidaṃ prārabhyate budhaiḥ || 11||
निष्कीलन की यह विधि जानकर ही पाठ आरम्भ करना चाहिए; बिना जाने करने वाला नष्ट हो जाता है। इसलिए बुद्धिमान इसे पूरी तरह जानकर ही आरम्भ करते हैं।
सौभाग्यादि च यत्किञ्चिद् दृश्यते ललनाजने ।
तत्सर्वं तत्प्रसादेन तेन जाप्यमिदं शुभम्॥
saubhāgyādi ca yatkiñcid dṛśyate lalanājane | tatsarvaṃ tatprasādena tena jāpyamidaṃ śubham || 12||
स्त्रियों में जो कुछ सौभाग्य आदि दिखाई देता है, वह सब देवी की कृपा से है; इसलिए इस शुभ स्तोत्र का जप करना चाहिए।
शनैस्तु जप्यमानेऽस्मिन् स्तोत्रे सम्पत्तिरुच्चकैः ।
भवत्येव समग्रापि ततः प्रारभ्यमेव तत्॥
śanaistu japyamāne'smin stotre sampattiruccakaiḥ | bhavatyeva samagrāpi tataḥ prārabhyameva tat || 13||
इस स्तोत्र का धीरे-धीरे जप करने पर बड़ी सम्पत्ति मिलती है और सब प्रकार की समृद्धि होती है; इसलिए इसका आरम्भ अवश्य करना चाहिए।
ऐश्वर्यं यत्प्रसादेन सौभाग्यारोग्यसम्पदः ।
शत्रुहानिः परो मोक्षः स्तूयते सा न किं जनैः॥
aiśvaryaṃ yatprasādena saubhāgyārogyasampadaḥ | śatruhāniḥ paro mokṣaḥ stūyate sā na kiṃ janaiḥ || 14||
जिनकी कृपा से ऐश्वर्य, सौभाग्य, आरोग्य और सम्पत्ति, शत्रुओं का नाश और परम मोक्ष मिलता है — लोग उनकी स्तुति क्यों न करें?
चण्डिकां हृदयेनापि यः स्मरेत् सततं नरः ।
हृद्यं काममवाप्नोति हृदि देवी सदा वसेत्॥
caṇḍikāṃ hṛdayenāpi yaḥ smaret satataṃ naraḥ | hṛdyaṃ kāmamavāpnoti hṛdi devī sadā vaset || 15||
जो मनुष्य हृदय से भी चण्डिका का सतत स्मरण करता है, वह अपनी मनचाही कामना पाता है और देवी सदा उसके हृदय में निवास करती हैं।
अग्रतोऽमुं महादेवकृतं कीलकवारणम् ।
निष्कीलञ्च तथा कृत्वा पठितव्यं समाहितैः॥
agrato'muṃ mahādevakṛtaṃ kīlakavāraṇam | niṣkīlañca tathā kṛtvā paṭhitavyaṃ samāhitaiḥ || 16||
पहले महादेव के बनाए इस कीलक-बन्धन को हटाना चाहिए; इस प्रकार निष्कीलित करके एकाग्र मन से पाठ करना चाहिए।
