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आरती · विष्णु जी

जय लक्ष्मी रमणा

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विष्णु जी

विष्णु जी

पालनहार; एकादशी इन्हीं की है

जय लक्ष्मी रमणा, स्वामी जय लक्ष्मी रमणा।

हे लक्ष्मीरमण, आपकी जय हो; हे स्वामी, लक्ष्मीरमण की जय हो।

सत्यनारायण स्वामी, जन-पातक-हरणा॥

हे सत्यनारायण स्वामी, आप लोगों के पाप हरने वाले हैं।

रत्नजड़ित सिंहासन, अद्भुत छवि राजै।

रत्नों से जड़े सिंहासन पर आपकी अद्भुत छवि शोभा पाती है।

नारद करत निराजन, घण्टा ध्वनि बाजै॥

नारद जी आपकी आरती उतारते हैं, और घंटों की ध्वनि गूँजती है।

जय लक्ष्मी रमणा, स्वामी जय लक्ष्मी रमणा।

हे लक्ष्मीरमण, आपकी जय हो; हे स्वामी, लक्ष्मीरमण की जय हो।

प्रकट भये कलि कारण, द्विज को दर्श दियो।

कलियुग के कारण आप प्रकट हुए और एक ब्राह्मण को दर्शन दिए।

बूढ़ो ब्राह्मण बनकर, कंचन महल कियो॥

बूढ़े ब्राह्मण का रूप धरकर आपने उसके लिए सोने का महल बना दिया।

जय लक्ष्मी रमणा, स्वामी जय लक्ष्मी रमणा।

हे लक्ष्मीरमण, आपकी जय हो; हे स्वामी, लक्ष्मीरमण की जय हो।

दुर्बल भील कठारो, जिन पर कृपा करी।

आपने निर्धन भील लकड़हारे पर कृपा की,

चन्द्रचूड़ एक राजा, तिनकी विपत्ति हरी॥

और चंद्रचूड़ नाम के एक राजा की विपत्ति हर ली।

जय लक्ष्मी रमणा, स्वामी जय लक्ष्मी रमणा।

हे लक्ष्मीरमण, आपकी जय हो; हे स्वामी, लक्ष्मीरमण की जय हो।

वैश्य मनोरथ पायो, श्रद्धा तज दीन्ही।

वैश्य का मनोरथ पूरा हुआ, पर उसने श्रद्धा छोड़ दी;

सो फल भोग्यो प्रभुजी, फिर स्तुति कीन्हीं॥

हे प्रभु, उसने उसका फल भोगा और फिर आपकी स्तुति की।

जय लक्ष्मी रमणा, स्वामी जय लक्ष्मी रमणा।

हे लक्ष्मीरमण, आपकी जय हो; हे स्वामी, लक्ष्मीरमण की जय हो।

भाव भक्ति के कारण, छिन-छिन रूप धरयो।

भाव और भक्ति के कारण आपने क्षण-क्षण रूप धारण किए;

श्रद्धा धारण कीनी, तिनको काज सरयो॥

जिन्होंने श्रद्धा धारण की, उनके काम सिद्ध हुए।

जय लक्ष्मी रमणा, स्वामी जय लक्ष्मी रमणा।

हे लक्ष्मीरमण, आपकी जय हो; हे स्वामी, लक्ष्मीरमण की जय हो।

ग्वाल-बाल संग राजा, वन में भक्ति करी।

राजा ने ग्वाल-बालों के संग वन में भक्ति की;

मनवांछित फल दीन्हों, दीनदयाल हरी॥

दीनदयालु हरि ने उसे मनचाहा फल दिया।

जय लक्ष्मी रमणा, स्वामी जय लक्ष्मी रमणा।

हे लक्ष्मीरमण, आपकी जय हो; हे स्वामी, लक्ष्मीरमण की जय हो।

चढ़त प्रसाद सवायो, कदली फल मेवा।

सवाया प्रसाद चढ़ता है, केले और मेवे के साथ;

धूप-दीप-तुलसी से, राजी सत्यदेवा॥

धूप, दीप और तुलसी से सत्यदेव प्रसन्न होते हैं।

जय लक्ष्मी रमणा, स्वामी जय लक्ष्मी रमणा।

हे लक्ष्मीरमण, आपकी जय हो; हे स्वामी, लक्ष्मीरमण की जय हो।

सत्यनारायण जी की आरती जो कोई नर गावै।

जो कोई सत्यनारायण जी की यह आरती गाए,

तन-मन सुख संपत्ति मनवांछित फल पावै॥

वह तन-मन का सुख, संपत्ति और मनचाहा फल पाता है।

जय लक्ष्मी रमणा, स्वामी जय लक्ष्मी रमणा।

हे लक्ष्मीरमण, आपकी जय हो; हे स्वामी, लक्ष्मीरमण की जय हो।