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स्तोत्र · विष्णु जी

हरिपाठ · पहला अभंग

4 पंक्तियाँ · बोलने में लगभग 1 मिनट · Sant Dnyaneshwar, Haripath, abhanga 1

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विष्णु जी

विष्णु जी

पालनहार; एकादशी इन्हीं की है

देवाचिये द्वारीं उभा क्षणभरी ।
तेणें मुक्ति चारी साधियेल्या ॥

devāciye dvārīṁ ubhā kṣaṇabharī . teṇeṁ mukti cārī sādhiyelyā .

भगवान के द्वार पर क्षण भर भी खड़े रहने से चारों मुक्तियाँ सध जाती हैं।

हरि मुखें म्हणा हरि मुखें म्हणा ।
पुण्याची गणना कोण करी ॥

hari mukheṁ mhaṇā hari mukheṁ mhaṇā . puṇyācī gaṇanā koṇa karī .

मुख से 'हरि' कहो, मुख से 'हरि' कहो — उसके पुण्य की गिनती कौन करे?

असोनि संसारीं जिव्हे वेगु करी ।
वेदशास्त्र उभारी बाह्या सदा ॥

asoni saṁsārīṁ jivhe vegu karī . vedaśāstra ubhārī bāhyā sadā .

संसार में रहते हुए भी जीभ को नाम में तत्पर रखो — वेद और शास्त्र बाँहें उठाकर यही कहते हैं।

ज्ञानदेव म्हणे व्यासाचिया खुणा ।
द्वारकेचा राणा पांडवां घरीं ॥

jñānadeva mhaṇe vyāsāciyā khuṇā . dvārakecā rāṇā pāṁḍavāṁ gharīṁ .

ज्ञानदेव कहते हैं: व्यास की दी हुई पहचान यही है — द्वारका के राजा पांडवों के घर रहे।

इन दिनों पर