राजोवाच ॥
१ ॥
राजा ने कहा —
विचित्रमिदमाख्यातं भगवन् भवता मम ।
देव्याश्चरितमाहात्म्यं रक्तबीजवधाश्रितम् ॥
२ ॥
भगवन्! आपने रक्तबीज के वध से जुड़ा देवी के चरित्र का यह अद्भुत माहात्म्य मुझे सुनाया।
भूयश्चेच्छाम्यहं श्रोतुं रक्तबीजे निपातिते ।
चकार शुम्भो यत्कर्म निशुम्भश्चातिकोपनः ॥
३ ॥
अब मैं सुनना चाहता हूँ कि रक्तबीज के मारे जाने पर शुम्भ ने और अत्यंत क्रोधी निशुम्भ ने क्या किया।
ऋषिरुवाच ॥
४ ॥
ऋषि कहते हैं —
चकार कोपमतुलं रक्तबीजे निपातिते ।
शुम्भासुरो निशुम्भश्च हतेष्वन्येषु चाहवे ॥
५ ॥
युद्ध में रक्तबीज और दूसरे दैत्यों के मारे जाने पर असुर शुम्भ और निशुम्भ के क्रोध की सीमा न रही।
हन्यमानं महासैन्यं विलोक्यामर्षमुद्वहन् ।
अभ्यधावन्निशुम्भोऽथ मुख्ययासुरसेनया ॥
६ ॥
अपनी विशाल सेना को इस प्रकार मरते देखकर निशुम्भ अमर्ष से भरकर असुरों की प्रधान सेना के साथ देवी की ओर दौड़ा।
तस्याग्रतस्तथा पृष्ठे पार्श्वयोश्च महासुराः ।
सन्दष्टौष्ठपुटाः क्रुद्धा हन्तुं देवीमुपाययुः ॥
७ ॥
उसके आगे, पीछे और दोनों ओर बड़े-बड़े असुर थे, जो क्रोध से होंठ चबाते हुए देवी को मारने आए।
आजगाम महावीर्यः शुम्भोऽपि स्वबलैर्वृतः ।
निहन्तुं चण्डिकां कोपात् कृत्वा युद्धं तु मातृभिः ॥
८ ॥
महापराक्रमी शुम्भ भी अपनी सेना के साथ मातृगणों से युद्ध करके क्रोधवश चण्डिका को मारने आ पहुँचा।
ततो युद्धमतीवासीद्देव्या शुम्भनिशुम्भयोः ।
शरवर्षमतीवोग्रं मेघयोरिव वर्षतोः ॥
९ ॥
तब देवी के साथ शुम्भ और निशुम्भ का घोर संग्राम छिड़ गया। वे दोनों दैत्य बरसते हुए दो मेघों की भाँति बाणों की भयंकर वर्षा कर रहे थे।
चिच्छेदास्ताञ्छरांस्ताभ्यां चण्डिका स्वशरोत्करैः ।
ताडयामास चाङ्गेषु शस्त्रौघैरसुरेश्वरौ ॥
१० ॥
उन दोनों के चलाए बाणों को चण्डिका ने अपने बाणों के समूह से काट डाला, और शस्त्रों की बौछार से उन दोनों दैत्यराजों के अंगों पर चोट पहुँचाई।
निशुम्भो निशितं खड्गं चर्म चादाय सुप्रभम् ।
अताडयन्मूर्ध्नि सिंहं देव्या वाहनमुत्तमम् ॥
११ ॥
निशुम्भ ने तीखी तलवार और चमकती ढाल लेकर देवी के श्रेष्ठ वाहन सिंह के मस्तक पर प्रहार किया।
ताडिते वाहने देवी क्षुरप्रेणासिमुत्तमम् ।
निशुम्भस्याशु चिच्छेद चर्म चाप्यष्टचन्द्रकम् ॥
१२ ॥
अपने वाहन पर चोट पड़ते ही देवी ने क्षुरप्र नामक बाण से निशुम्भ की श्रेष्ठ तलवार तुरंत काट डाली, और आठ चाँदों से जड़ी उसकी ढाल को भी।
छिन्ने चर्मणि खड्गे च शक्तिं चिक्षेप सोऽसुरः ।
तामप्यस्य द्विधा चक्रे चक्रेणाभिमुखागताम् ॥
१३ ॥
ढाल और तलवार कट जाने पर उस असुर ने शक्ति चलाई, किंतु सामने आते ही देवी ने चक्र से उसके भी दो टुकड़े कर दिए।
कोपाध्मातो निशुम्भोऽथ शूलं जग्राह दानवः ।
आयातं मुष्टिपातेन देवी तच्चाप्यचूर्णयत् ॥
१४ ॥
तब क्रोध से फूले हुए दानव निशुम्भ ने शूल उठाया; किंतु पास आते ही देवी ने मुक्के के प्रहार से उसे भी चूर-चूर कर दिया।
आविध्याथ गदां सोऽपि चिक्षेप चण्डिकां प्रति ।
सापि देव्या त्रिशूलेन भिन्ना भस्मत्वमागता ॥
१५ ॥
तब उसने गदा घुमाकर चण्डिका पर चलाई, परंतु वह भी देवी के त्रिशूल से कटकर भस्म हो गई।
ततः परशुहस्तं तमायान्तं दैत्यपुङ्गवम् ।
आहत्य देवी बाणौघैरपातयत भूतले ॥
१६ ॥
तब फरसा हाथ में लेकर आते हुए उस दैत्यश्रेष्ठ को देवी ने बाणों के समूह से घायल करके धरती पर गिरा दिया।
तस्मिन्निपतिते भूमौ निशुम्भे भीमविक्रमे ।
भ्रातर्यतीव सङ्क्रुद्धः प्रययौ हन्तुमम्बिकाम् ॥
१७ ॥
भयंकर पराक्रमी भाई निशुम्भ के धराशायी हो जाने पर शुम्भ अत्यंत क्रोधित होकर अम्बिका का वध करने आगे बढ़ा।
स रथस्थस्तथात्युच्चैर्गृहीतपरमायुधैः ।
भुजैरष्टाभिरतुलैर्व्याप्याशेषं बभौ नभः ॥
१८ ॥
रथ पर बैठे-बैठे ही उत्तम आयुधों को थामे अपनी आठ अनुपम, ऊँची उठी भुजाओं से सारे आकाश को ढककर वह शोभा पाने लगा।
तमायान्तं समालोक्य देवी शङ्खमवादयत् ।
ज्याशब्दं चापि धनुषश्चकारातीव दुःसहम् ॥
१९ ॥
उसे आते देखकर देवी ने शंख बजाया और धनुष की प्रत्यंचा का भी अत्यंत दुस्सह शब्द किया।
पूरयामास ककुभो निजघण्टास्वनेन च ।
समस्तदैत्यसैन्यानां तेजोवधविधायिना ॥
२० ॥
साथ ही अपने घंटे के नाद से, जो समस्त दैत्य-सेनाओं का तेज नष्ट करनेवाला था, उन्होंने सारी दिशाओं को भर दिया।
ततः सिंहो महानादैस्त्याजितेभमहामदैः ।
पूरयामास गगनं गां तथैव दिशो दश ॥
२१ ॥
तब सिंह ने भी अपनी दहाड़ से, जिसे सुनकर बड़े-बड़े गजराजों का मद उतर जाता था, आकाश, पृथ्वी और दसों दिशाओं को गुँजा दिया।
ततः काली समुत्पत्य गगनं क्ष्मामताडयत् ।
कराभ्यां तन्निनादेन प्राक्स्वनास्ते तिरोहिताः ॥
२२ ॥
फिर काली ने आकाश में उछलकर दोनों हाथों से पृथ्वी पर आघात किया। उससे ऐसा शब्द हुआ कि पहले के सभी शब्द उसमें डूब गए।
अट्टाट्टहासमशिवं शिवदूती चकार ह ।
तैः शब्दैरसुरास्त्रेसुः शुम्भः कोपं परं ययौ ॥
२३ ॥
तत्पश्चात् शिवदूती ने असुरों के लिए अमंगलकारी अट्टहास किया; उन शब्दों से असुर थर्रा उठे और शुम्भ को बड़ा क्रोध हुआ।
दुरात्मंस्तिष्ठ तिष्ठेति व्याजहाराम्बिका यदा ।
तदा जयेत्यभिहितं देवैराकाशसंस्थितैः ॥
२४ ॥
जब अम्बिका ने कहा, “ओ दुरात्मा! खड़ा रह, खड़ा रह,” तभी आकाश में खड़े देवता बोल उठे, “जय हो!”
शुम्भेनागत्य या शक्तिर्मुक्ता ज्वालातिभीषणा ।
आयान्ती वह्निकूटाभा सा निरस्ता महोल्कया ॥
२५ ॥
शुम्भ ने आकर ज्वालाओं से युक्त अत्यंत भयानक शक्ति चलाई। आग के पहाड़ के समान आती हुई उस शक्ति को देवी ने एक बड़ी उल्का से दूर हटा दिया।
सिंहनादेन शुम्भस्य व्याप्तं लोकत्रयान्तरम् ।
निर्घातनिःस्वनो घोरो जितवानवनीपते ॥
२६ ॥
राजन्! शुम्भ के सिंहनाद से तीनों लोक गूँज उठे; परंतु वज्रपात के समान एक भयानक गर्जना ने उस पर भी विजय पा ली।
शुम्भमुक्ताञ्छरान् देवी शुम्भस्तत्प्रहिताञ्छरान् ।
चिच्छेद स्वशरैरुग्रैः शतशोऽथ सहस्रशः ॥
२७ ॥
शुम्भ के चलाए बाणों को देवी ने, और देवी के चलाए बाणों को शुम्भ ने, अपने भयंकर बाणों से सैकड़ों-हज़ारों टुकड़ों में काट डाला।
ततः सा चण्डिका क्रुद्धा शूलेनाभिजघान तम् ।
स तदाभिहतो भूमौ मूर्च्छितो निपपात ह ॥
२८ ॥
तब क्रोध में भरी चण्डिका ने शुम्भ को शूल से मारा; उस आघात से मूर्च्छित होकर वह पृथ्वी पर गिर पड़ा।
ततो निशुम्भः सम्प्राप्य चेतनामात्तकार्मुकः ।
आजघान शरैर्देवीं कालीं केसरिणं तथा ॥
२९ ॥
इतने में निशुम्भ को चेतना लौट आई; उसने धनुष हाथ में लेकर बाणों से देवी, काली और सिंह को घायल कर दिया।
पुनश्च कृत्वा बाहूनामयुतं दनुजेश्वरः ।
चक्रायुधेन दितिजश्छादयामास चण्डिकाम् ॥
३० ॥
फिर उस दैत्यराज ने दस हज़ार भुजाएँ बनाकर चक्रों के प्रहार से चण्डिका को ढक दिया।
ततो भगवती क्रुद्धा दुर्गा दुर्गार्तिनाशिनी ।
चिच्छेद तानि चक्राणि स्वशरैः सायकांश्च तान् ॥
३१ ॥
तब दुर्गम पीड़ा का नाश करनेवाली भगवती दुर्गा ने कुपित होकर अपने बाणों से उन चक्रों और बाणों को काट गिराया।
ततो निशुम्भो वेगेन गदामादाय चण्डिकाम् ।
अभ्यधावत वै हन्तुं दैत्यसेनासमावृतः ॥
३२ ॥
यह देख निशुम्भ दैत्य-सेना के साथ चण्डिका का वध करने के लिए हाथ में गदा लेकर बड़े वेग से दौड़ा।
तस्यापतत एवाशु गदां चिच्छेद चण्डिका ।
खड्गेन शितधारेण स च शूलं समाददे ॥
३३ ॥
उसके आते ही चण्डिका ने तीखी धारवाली तलवार से उसकी गदा तुरंत काट डाली; तब उसने शूल हाथ में ले लिया।
शूलहस्तं समायान्तं निशुम्भममरार्दनम् ।
हृदि विव्याध शूलेन वेगाविद्धेन चण्डिका ॥
३४ ॥
देवताओं को पीड़ा देनेवाले निशुम्भ को शूल लिए आते देख चण्डिका ने वेग से चलाए अपने शूल से उसकी छाती छेद डाली।
भिन्नस्य तस्य शूलेन हृदयान्निःसृतोऽपरः ।
महाबलो महावीर्यस्तिष्ठेति पुरुषो वदन् ॥
३५ ॥
शूल से विदीर्ण हुई उसकी छाती से एक दूसरा महाबली और महापराक्रमी पुरुष “ठहर जा!” कहता हुआ निकला।
तस्य निष्क्रामतो देवी प्रहस्य स्वनवत्ततः ।
शिरश्चिच्छेद खड्गेन ततोऽसावपतद्भुवि ॥
३६ ॥
उसके निकलते ही देवी ठहाका मारकर हँस पड़ीं और तलवार से उसका सिर काट डाला; तब वह पृथ्वी पर गिर पड़ा।
ततः सिंहश्चखादोग्रं दंष्ट्राक्षुण्णशिरोधरान् ।
असुरांस्तांस्तथा काली शिवदूती तथापरान् ॥
३७ ॥
तब सिंह अपनी दाढ़ों से असुरों की गर्दनें कुचलकर उन्हें बड़ी उग्रता से खाने लगा; उधर काली और शिवदूती ने भी दूसरे दैत्यों का भक्षण किया।
कौमारीशक्तिनिर्भिन्नाः केचिन्नेशुर्महासुराः ।
ब्रह्माणीमन्त्रपूतेन तोयेनान्ये निराकृताः ॥
३८ ॥
कौमारी की शक्ति से विदीर्ण होकर कितने ही महादैत्य नष्ट हो गए; ब्रह्माणी के मंत्र से पवित्र किए जल से दूसरे निस्तेज होकर भाग खड़े हुए।
माहेश्वरीत्रिशूलेन भिन्नाः पेतुस्तथापरे ।
वाराहीतुण्डघातेन केचिच्चूर्णीकृता भुवि ॥
३९ ॥
कितने ही दैत्य माहेश्वरी के त्रिशूल से छिन्न-भिन्न होकर गिर पड़े; वाराही के थूथन के आघात से कितने ही धरती पर चूर-चूर हो गए।
खण्डं खण्डं च चक्रेण वैष्णव्या दानवाः कृताः ।
वज्रेण चैन्द्रीहस्ताग्रविमुक्तेन तथाऽपरे ॥
४० ॥
वैष्णवी के चक्र से दानवों के टुकड़े-टुकड़े कर दिए गए, और ऐन्द्री के हाथ से छूटे वज्र से दूसरे भी उसी प्रकार मारे गए।
केचिद्विनेशुरसुराः केचिन्नष्टा महाहवात् ।
भक्षिताश्चापरे कालीशिवदूतीमृगाधिपैः ॥
४१ ॥
कुछ असुर नष्ट हो गए, कुछ उस महायुद्ध से भाग गए, और कितने ही काली, शिवदूती तथा सिंह के ग्रास बन गए।
