ऋषिरुवाच ॥
१ ॥
ऋषि कहते हैं —
आज्ञप्तास्ते ततो दैत्याश्चण्डमुण्डपुरोगमाः ।
चतुरङ्गबलोपेता ययुरभ्युद्यतायुधाः ॥
२ ॥
तब शुम्भ की आज्ञा पाकर चण्ड और मुण्ड के नेतृत्व में दैत्य अपनी चतुरंगिणी सेना के साथ अस्त्र-शस्त्र उठाए चल पड़े।
ददृशुस्ते ततो देवीमीषद्धासां व्यवस्थिताम् ।
सिंहस्योपरि शैलेन्द्रशृङ्गे महति काञ्चने ॥
३ ॥
वहाँ उन्होंने गिरिराज हिमालय के विशाल सुनहरे शिखर पर सिंह पर विराजमान देवी को देखा। वे मंद-मंद मुस्करा रही थीं।
ते दृष्ट्वा तां समादातुमुद्यमं चक्रुरुद्यताः ।
आकृष्टचापासिधरास्तथान्ये तत्समीपगाः ॥
४ ॥
उन्हें देखकर दैत्य तत्परता से उन्हें पकड़ने का यत्न करने लगे। किसी ने धनुष ताना, किसी ने तलवार उठाई, और कुछ उनके पास आ खड़े हुए।
ततः कोपं चकारोच्चैरम्बिका तानरीन् प्रति ।
कोपेन चास्या वदनं मषीवर्णमभूत्तदा ॥
५ ॥
तब अम्बिका ने उन शत्रुओं पर बड़ा क्रोध किया। उस क्रोध से उनका मुख स्याही के समान काला पड़ गया।
भ्रुकुटीकुटिलात्तस्या ललाटफलकाद्द्रुतम् ।
काली करालवदना विनिष्क्रान्तासिपाशिनी ॥
६ ॥
भौंहें तनने से टेढ़े हुए उनके ललाट से तुरंत विकराल मुखवाली काली प्रकट हुईं, जो तलवार और पाश धारण किए थीं।
विचित्रखट्वाङ्गधरा नरमालाविभूषणा ।
द्वीपिचर्मपरीधाना शुष्कमांसातिभैरवा ॥
७ ॥
वे विचित्र खट्वांग धारण किए थीं, नरमुंडों की माला से सजी थीं और चीते की खाल पहने थीं। उनके शरीर का मांस सूख गया था, जिससे वे अत्यंत भयंकर दिखती थीं।
अतिविस्तारवदना जिह्वाललनभीषणा ।
निमग्नारक्तनयना नादापूरितदिङ्मुखा ॥
८ ॥
उनका मुख अत्यंत विशाल था और लपलपाती जीभ से वे और भी भयावह लगती थीं। उनकी आँखें भीतर धँसी हुई और कुछ लाल थीं, और उनकी गर्जना से सारी दिशाएँ गूँज उठी थीं।
सा वेगेनाभिपतिता घातयन्ती महासुरान् ।
सैन्ये तत्र सुरारीणामभक्षयत तद्बलम् ॥
९ ॥
वे बड़े वेग से टूट पड़ीं और बड़े-बड़े असुरों को मारती हुई देवताओं के शत्रुओं की उस सेना को खाने लगीं।
पार्ष्णिग्राहाङ्कुशग्राहियोधघण्टासमन्वितान् ।
समादायैकहस्तेन मुखे चिक्षेप वारणान् ॥
१० ॥
वे पार्श्व-रक्षकों, अंकुश लिए महावतों, योद्धाओं और घंटों सहित हाथियों को एक ही हाथ से पकड़कर मुँह में डाल लेती थीं।
तथैव योधं तुरगै रथं सारथिना सह ।
निक्षिप्य वक्त्रे दशनैश्चर्वयन्त्यतिभैरवम् ॥
११ ॥
इसी प्रकार घोड़ों सहित योद्धाओं को और सारथियों सहित रथों को मुँह में डालकर वे उन्हें दाँतों से बड़े भयानक ढंग से चबा डालती थीं।
एकं जग्राह केशेषु ग्रीवायामथ चापरम् ।
पादेनाक्रम्य चैवान्यमुरसान्यमपोथयत् ॥
१२ ॥
किसी को उन्होंने बालों से पकड़ा, किसी का गला पकड़ा; किसी को पैरों से कुचल दिया और किसी को छाती के धक्के से गिराकर मार डाला।
तैर्मुक्तानि च शस्त्राणि महास्त्राणि तथासुरैः ।
मुखेन जग्राह रुषा दशनैर्मथितान्यपि ॥
१३ ॥
असुरों के छोड़े हुए शस्त्रों और बड़े-बड़े अस्त्रों को वे मुँह से पकड़ लेतीं और क्रोध में भरकर दाँतों से पीस डालती थीं।
बलिनां तद्बलं सर्वमसुराणां दुरात्मनाम् ।
ममर्दाभक्षयच्चान्यानन्यांश्चाताडयत्तथा ॥
१४ ॥
बलवान और दुष्ट असुरों की उस सारी सेना को उन्होंने रौंद डाला; कितनों को खा गईं और कितनों को मार गिराया।
असिना निहताः केचित्केचित्खट्वाङ्गताडिताः ।
जग्मुर्विनाशमसुरा दन्ताग्राभिहतास्तथा ॥
१५ ॥
कुछ असुर तलवार से मारे गए, कुछ खट्वांग से पीटे गए, और कितने ही दाँतों की नोकों से कुचले जाकर नष्ट हो गए।
क्षणेन तद्बलं सर्वमसुराणां निपातितम् ।
दृष्ट्वा चण्डोऽभिदुद्राव तां कालीमतिभीषणाम् ॥
१६ ॥
पल भर में असुरों की वह सारी सेना धराशायी देखकर चण्ड उन अत्यंत भयानक काली की ओर दौड़ा।
शरवर्षैर्महाभीमैर्भीमाक्षीं तां महासुरः ।
छादयामास चक्रैश्च मुण्डः क्षिप्तैः सहस्रशः ॥
१७ ॥
महादैत्य चण्ड ने अत्यंत भयंकर बाणों की वर्षा से, और मुण्ड ने हज़ारों की संख्या में चलाए चक्रों से, उन भयानक नेत्रोंवाली देवी को ढक दिया।
तानि चक्राण्यनेकानि विशमानानि तन्मुखम् ।
बभुर्यथार्कबिम्बानि सुबहूनि घनोदरम् ॥
१८ ॥
उनके मुख में समाते हुए वे अनेक चक्र ऐसे जान पड़े मानो सूर्य के बहुत-से मंडल बादल के भीतर प्रवेश कर रहे हों।
ततो जहासातिरुषा भीमं भैरवनादिनी ।
काली करालवक्त्रान्तर्दुर्दर्शदशनोज्ज्वला ॥
१९ ॥
तब भयंकर गर्जना करनेवाली काली ने अत्यंत क्रोध में भरकर विकट अट्टहास किया। उनके विकराल मुख के भीतर कठिनाई से देखे जा सकनेवाले दाँतों की प्रभा से वे दमक रही थीं।
उत्थाय च महासिंहं देवी चण्डमधावत ।
गृहीत्वा चास्य केशेषु शिरस्तेनासिनाच्छिनत् ॥
२० ॥
तब देवी ने महासिंह पर चढ़कर चण्ड पर धावा किया और उसके केश पकड़कर उसी तलवार से उसका सिर काट डाला।
अथ मुण्डोऽभ्यधावत्तां दृष्ट्वा चण्डं निपातितम् ।
तमप्यपातयद्भूमौ सा खड्गाभिहतं रुषा ॥
२१ ॥
चण्ड को मारा गया देखकर मुण्ड भी देवी की ओर दौड़ा। तब देवी ने रोष में भरकर उसे भी तलवार से घायल करके धरती पर गिरा दिया।
हतशेषं ततः सैन्यं दृष्ट्वा चण्डं निपातितम् ।
मुण्डं च सुमहावीर्यं दिशो भेजे भयातुरम् ॥
२२ ॥
महापराक्रमी चण्ड और मुण्ड को मारा गया देखकर बची हुई सेना भय से व्याकुल होकर चारों ओर भाग गई।
शिरश्चण्डस्य काली च गृहीत्वा मुण्डमेव च ।
प्राह प्रचण्डाट्टहासमिश्रमभ्येत्य चण्डिकाम् ॥
२३ ॥
तब काली चण्ड और मुण्ड के सिर हाथ में लेकर चण्डिका के पास गईं और प्रचंड अट्टहास करती हुई बोलीं —
मया तवात्रोपहृतौ चण्डमुण्डौ महापशू ।
युद्धयज्ञे स्वयं शुम्भं निशुम्भं च हनिष्यसि ॥
२४ ॥
“मैंने चण्ड और मुण्ड नाम के इन दो महापशुओं को यहाँ आपको भेंट किया है। अब युद्ध-यज्ञ में शुम्भ और निशुम्भ का वध आप स्वयं करेंगी।”
ऋषिरुवाच ॥
२५ ॥
ऋषि कहते हैं —
तावानीतौ ततो दृष्ट्वा चण्डमुण्डौ महासुरौ ।
उवाच कालीं कल्याणी ललितं चण्डिका वचः ॥
२६ ॥
वहाँ लाए गए उन महादैत्य चण्ड और मुण्ड को देखकर कल्याणमयी चण्डिका ने काली से मधुर वाणी में कहा —
यस्माच्चण्डं च मुण्डं च गृहीत्वा त्वमुपागता ।
चामुण्डेति ततो लोके ख्याता देवि भविष्यसि ॥
२७ ॥
“देवी! आप चण्ड और मुण्ड को लेकर मेरे पास आई हैं, इसलिए संसार में आप ‘चामुण्डा’ नाम से विख्यात होंगी।”
