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स्तोत्र · माँ दुर्गा

दुर्गा सप्तशती, तेरहवाँ अध्याय (सुरथ-वैश्य वरप्रदान)

29 पंक्तियाँ · बोलने में लगभग 1 मिनट · Durga Saptashati, chapter 13 (Gita Press)

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माँ दुर्गा

माँ दुर्गा

नवरात्रि की देवी

ऋषिरुवाच ॥
१ ॥

ऋषि कहते हैं —

एतत्ते कथितं भूप देवीमाहात्म्यमुत्तमम् ।
एवंप्रभावा सा देवी ययेदं धार्यते जगत् ॥
२ ॥

हे राजन, इस प्रकार मैंने तुमसे देवी के उत्तम माहात्म्य का वर्णन किया। जो इस जगत को धारण करती हैं, उन देवी का ऐसा ही प्रभाव है।

विद्या तथैव क्रियते भगवद्विष्णुमायया ।
तया त्वमेष वैश्यश्च तथैवान्ये विवेकिनः ॥
३ ॥

वे ही विद्या (ज्ञान) भी उत्पन्न करती हैं। भगवान विष्णु की मायास्वरूपा उन भगवती के द्वारा ही तुम, यह वैश्य और अन्य विवेकी जन…

मोह्यन्ते मोहिताश्चैव मोहमेष्यन्ति चापरे ।
तामुपैहि महाराज शरणं परमेश्वरीम् ॥
४ ॥

…मोहित होते हैं, मोहित हुए हैं और आगे भी दूसरे मोहित होंगे। हे महाराज, तुम उन्हीं परमेश्वरी की शरण में जाओ।

आराधिता सैव नृणां भोगस्वर्गापवर्गदा ॥
५ ॥

आराधना करने पर वे ही मनुष्यों को भोग, स्वर्ग और मोक्ष प्रदान करती हैं।

मार्कण्डेय उवाच ॥
६ ॥

मार्कण्डेय जी कहते हैं —

इति तस्य वचः श्रुत्वा सुरथः स नराधिपः ॥
७ ॥

ऋषि के ये वचन सुनकर राजा सुरथ ने…

प्रणिपत्य महाभागं तमृषिं शंसितव्रतम् ।
निर्विण्णोऽतिममत्वेन राज्यापहरणेन च ॥
८ ॥

…उत्तम व्रत का पालन करनेवाले उन महाभाग ऋषि को प्रणाम किया। अत्यधिक ममता और राज्य छिन जाने से वे विरक्त हो चुके थे…

जगाम सद्यस्तपसे स च वैश्यो महामुने ।
सन्दर्शनार्थमम्बाया नदीपुलिनसंस्थितः ॥
९ ॥

…हे महामुनि, वे राजा और वह वैश्य तुरंत तपस्या के लिए चले गए, और जगदंबा के दर्शन के लिए नदी के तट पर रहने लगे।

स च वैश्यस्तपस्तेपे देवीसूक्तं परं जपन् ।
तौ तस्मिन् पुलिने देव्याः कृत्वा मूर्तिं महीमयीम् ॥
१० ॥

वह वैश्य परम देवीसूक्त का जप करते हुए तपस्या करने लगा। उन दोनों ने उस नदी तट पर देवी की मिट्टी की मूर्ति बनाकर…

अर्हणां चक्रतुस्तस्याः पुष्पधूपाग्नितर्पणैः ।
निराहारौ यताहारौ तन्मनस्कौ समाहितौ ॥
११ ॥

…पुष्प, धूप, अग्नि और जल-तर्पण से उनकी पूजा करने लगे। पहले आहार को संयमित किया, फिर पूरी तरह निराहार रहकर, देवी में ही मन लगाए, एकाग्र होकर…

ददतुस्तौ बलिं चैव निजगात्रासृगुक्षितम् ।
एवं समाराधयतोस्त्रिभिर्वर्षैर्यतात्मनोः ॥
१२ ॥

…उन्होंने अपने शरीर के रक्त से प्रोक्षित बलि भी अर्पित की। इस प्रकार संयमपूर्वक तीन वर्ष तक आराधना करने पर…

परितुष्टा जगद्धात्री प्रत्यक्षं प्राह चण्डिका ॥
१३ ॥

…जगत को धारण करनेवाली चंडिका देवी ने प्रसन्न होकर प्रत्यक्ष दर्शन दिए और कहा।

देव्युवाच ॥
१४ ॥

देवी ने कहा —

यत्प्रार्थ्यते त्वया भूप त्वया च कुलनन्दन ।
मत्तस्तत्प्राप्यतां सर्वं परितुष्टा ददामि तत् ॥
१५ ॥

“हे राजन, और हे अपने कुल को आनंद देनेवाले वैश्य, तुम जो कुछ माँगते हो, वह सब मुझसे प्राप्त करो; मैं प्रसन्न हूँ, इसलिए वह सब दूँगी।”

मार्कण्डेय उवाच ॥
१६ ॥

मार्कण्डेय जी कहते हैं —

ततो वव्रे नृपो राज्यमविभ्रंश्यन्यजन्मनि ।
अत्रैव च निजं राज्यं हतशत्रुबलं बलात् ॥
१७ ॥

तब राजा ने दूसरे जन्म में भी नष्ट न होनेवाला राज्य माँगा, और इसी जन्म में शत्रुओं की सेना को बलपूर्वक नष्ट करके अपना राज्य फिर पाने का वर माँगा।

सोऽपि वैश्यस्ततो ज्ञानं वव्रे निर्विण्णमानसः ।
ममेत्यहमिति प्राज्ञः सङ्गविच्युतिकारकम् ॥
१८ ॥

और वैश्य ने, जिसका मन संसार से विरक्त हो चुका था और जो बड़ा बुद्धिमान था, ‘मैं’ और ‘मेरा’ रूपी आसक्ति का नाश करनेवाला ज्ञान माँगा।

देव्युवाच ॥
१९ ॥

देवी ने कहा —

स्वल्पैरहोभिर्नृपते स्वं राज्यं प्राप्स्यते भवान् ॥
२० ॥

“हे राजन, तुम थोड़े ही दिनों में अपना राज्य प्राप्त कर लोगे।”

हत्वा रिपूनस्खलितं तव तत्र भविष्यति ॥
२१ ॥

“शत्रुओं को मारकर वहाँ तुम्हारा राज्य स्थिर रहेगा।”

मृतश्च भूयः सम्प्राप्य जन्म देवाद्विवस्वतः ॥
२२ ॥

“और मृत्यु के बाद तुम विवस्वान (सूर्य) देव से फिर जन्म लेकर…”

सावर्णिको नाम मनुर्भवान् भुवि भविष्यति ॥
२३ ॥

“…इस पृथ्वी पर सावर्णिक नाम के मनु होओगे।”

वैश्यवर्य त्वया यश्च वरोऽस्मत्तोऽभिवाञ्छितः ॥
२४ ॥

“हे वैश्यश्रेष्ठ, तुमने मुझसे जो वर पाने की इच्छा की है…”

तं प्रयच्छामि संसिद्ध्यै तव ज्ञानं भविष्यति ॥
२५ ॥

“…वह मैं देती हूँ; मोक्ष के लिए तुम्हें ज्ञान प्राप्त होगा।”

मार्कण्डेय उवाच ॥
२६ ॥

मार्कण्डेय जी कहते हैं —

इति दत्त्वा तयोर्देवी यथाभिलषितं वरम् ॥
२७ ॥

इस प्रकार उन दोनों को मनचाहा वर देकर…

बभूवान्तर्हिता सद्यो भक्त्या ताभ्यामभिष्टुता ।
एवं देव्या वरं लब्ध्वा सुरथः क्षत्रियर्षभः ॥
२८ ॥

…उनके द्वारा भक्तिपूर्वक स्तुति की जाती हुई देवी तुरंत अंतर्धान हो गईं। इस प्रकार देवी से वर पाकर क्षत्रियों में श्रेष्ठ सुरथ…

सूर्याज्जन्म समासाद्य सावर्णिर्भविता मनुः ॥
२९ ॥

…सूर्य से जन्म लेकर सावर्णि मनु होंगे।

इन दिनों पर