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स्तोत्र · माँ दुर्गा

दुर्गा सप्तशती, बारहवाँ अध्याय (फलश्रुति)

41 पंक्तियाँ · बोलने में लगभग 2 मिनट · Durga Saptashati, chapter 12 (Gita Press)

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माँ दुर्गा

माँ दुर्गा

नवरात्रि की देवी

देव्युवाच ॥
१ ॥

देवी ने कहा —

एभिः स्तवैश्च मां नित्यं स्तोष्यते यः समाहितः ।
तस्याहं सकलां बाधां नाशयिष्याम्यसंशयम् ॥
२ ॥

“जो एकाग्रचित्त होकर प्रतिदिन इन स्तुतियों से मेरा स्तवन करेगा, उसकी सारी बाधाओं को मैं निःसंदेह नष्ट कर दूँगी।”

मधुकैटभनाशं च महिषासुरघातनम् ।
कीर्तयिष्यन्ति ये तद्वद्वधं शुम्भनिशुम्भयोः ॥
३ ॥

“जो मधु-कैटभ के नाश, महिषासुर के वध और उसी प्रकार शुंभ-निशुंभ के संहार का कीर्तन करेंगे…”

अष्टम्यां च चतुर्दश्यां नवम्यां चैकचेतसः ।
श्रोष्यन्ति चैव ये भक्त्या मम माहात्म्यमुत्तमम् ॥
४ ॥

“…और जो अष्टमी, चतुर्दशी और नवमी को एकाग्रचित्त होकर भक्ति से मेरे इस उत्तम माहात्म्य को सुनेंगे…”

न तेषां दुष्कृतं किञ्चिद्दुष्कृतोत्था न चापदः ।
भविष्यति न दारिद्र्यं न चैवेष्टवियोजनम् ॥
५ ॥

“…उन्हें कोई पाप नहीं छुएगा, न पाप से उपजी आपत्तियाँ आएँगी; उनके घर में दरिद्रता नहीं होगी और प्रियजनों का बिछोह भी नहीं होगा।”

शत्रुतो न भयं तस्य दस्युतो वा न राजतः ।
न शस्त्रानलतोयौघात् कदाचित् सम्भविष्यति ॥
६ ॥

“उसे शत्रु से, लुटेरों से, राजा से, शस्त्र से, अग्नि से या जल की बाढ़ से कभी भय नहीं होगा।”

तस्मान्ममैतन्माहात्म्यं पठितव्यं समाहितैः ।
श्रोतव्यं च सदा भक्त्या परं स्वस्त्ययनं हि तत् ॥
७ ॥

“इसलिए मेरे इस माहात्म्य को सदा एकाग्रचित्त होकर पढ़ना और भक्ति से सुनना चाहिए; यह परम कल्याणकारी है।”

उपसर्गानशेषांस्तु महामारीसमुद्भवान् ।
तथा त्रिविधमुत्पातं माहात्म्यं शमयेन्मम ॥
८ ॥

“मेरा माहात्म्य महामारी से उपजे सब उपद्रवों को और तीनों प्रकार के उत्पातों को शांत कर देता है।”

यत्रैतत्पठ्यते सम्यङ्नित्यमायतने मम ।
सदा न तद्विमोक्ष्यामि सान्निध्यं तत्र मे स्थितम् ॥
९ ॥

“मेरे जिस मंदिर में प्रतिदिन विधिपूर्वक इसका पाठ होता है, उस स्थान को मैं कभी नहीं छोड़ती; वहाँ सदा मेरा सान्निध्य बना रहता है।”

बलिप्रदाने पूजायामग्निकार्ये महोत्सवे ।
सर्वं ममैतच्चरितमुच्चार्यं श्राव्यमेव च ॥
१० ॥

“बलि, पूजा, होम और महोत्सव के अवसर पर मेरे इस पूरे चरित्र का पाठ करना और सुनाना चाहिए।”

जानताऽजानता वापि बलिपूजां तथा कृताम् ।
प्रतीच्छिष्याम्यहं प्रीत्या वह्निहोमं तथा कृतम् ॥
११ ॥

“ऐसा करने पर विधि जानकर या बिना जाने भी जो बलि, पूजा और होम किया जाएगा, उसे मैं बड़ी प्रसन्नता से ग्रहण करूँगी।”

शरत्काले महापूजा क्रियते या च वार्षिकी ।
तस्यां ममैतन्माहात्म्यं श्रुत्वा भक्तिसमन्वितः ॥
१२ ॥

“शरद ऋतु में जो वार्षिक महापूजा की जाती है, उस अवसर पर जो मेरे इस माहात्म्य को भक्तिपूर्वक सुनेगा…”

सर्वाबाधाविनिर्मुक्तो धनधान्यसुतान्वितः ।
मनुष्यो मत्प्रसादेन भविष्यति न संशयः ॥
१३ ॥

“…वह मनुष्य मेरी कृपा से सब बाधाओं से मुक्त होकर धन, धान्य और संतान से संपन्न होगा, इसमें कोई संदेह नहीं।”

श्रुत्वा ममैतन्माहात्म्यं तथा चोत्पत्तयः शुभाः ।
पराक्रमं च युद्धेषु जायते निर्भयः पुमान् ॥
१४ ॥

“मेरे इस माहात्म्य, मेरे प्रकट होने की सुंदर कथाओं और युद्धों में मेरे पराक्रम को सुनकर मनुष्य निर्भय हो जाता है।”

रिपवः सङ्क्षयं यान्ति कल्याणं चोपपद्यते ।
नन्दते च कुलं पुंसां माहात्म्यं मम शृण्वताम् ॥
१५ ॥

“मेरा माहात्म्य सुननेवालों के शत्रु नष्ट हो जाते हैं, उनका कल्याण होता है और उनका कुल आनंदित रहता है।”

शान्तिकर्मणि सर्वत्र तथा दुःस्वप्नदर्शने ।
ग्रहपीडासु चोग्रासु माहात्म्यं शृणुयान्मम ॥
१६ ॥

“सब प्रकार के शांति कर्मों में, बुरे स्वप्न दिखने पर और ग्रहों की कठिन पीड़ा के समय मेरा माहात्म्य सुनना चाहिए।”

उपसर्गाः शमं यान्ति ग्रहपीडाश्च दारुणाः ।
दुःस्वप्नं च नृभिर्दृष्टं सुस्वप्नमुपजायते ॥
१७ ॥

“इससे विघ्न और ग्रहों की भयंकर पीड़ाएँ शांत हो जाती हैं, और मनुष्य का देखा हुआ बुरा स्वप्न शुभ स्वप्न में बदल जाता है।”

बालग्रहाभिभूतानां बालानां शान्तिकारकम् ।
सङ्घातभेदे च नृणां मैत्रीकरणमुत्तमम् ॥
१८ ॥

“बालग्रहों से ग्रस्त बच्चों को यह शांति देता है, और जहाँ लोगों में फूट पड़ गई हो, वहाँ यह भली-भाँति मित्रता करानेवाला है।”

दुर्वृत्तानामशेषाणां बलहानिकरं परम् ।
रक्षोभूतपिशाचानां पठनादेव नाशनम् ॥
१९ ॥

“यह सब दुराचारियों के बल को नष्ट करनेवाला है; इसके पाठ मात्र से राक्षसों, भूतों और पिशाचों का नाश हो जाता है।”

सर्वं ममैतन्माहात्म्यं मम सन्निधिकारकम् ।
पशुपुष्पार्घ्यधूपैश्च गन्धदीपैस्तथोत्तमैः ॥
२० ॥

“मेरा यह संपूर्ण माहात्म्य मेरा सान्निध्य करानेवाला है। पशु, पुष्प, अर्घ्य, धूप, गंध और उत्तम दीपों से…”

विप्राणां भोजनैर्होमैः प्रोक्षणीयैरहर्निशम् ।
अन्यैश्च विविधैर्भोगैः प्रदानैर्वत्सरेण या ॥
२१ ॥

“…ब्राह्मणों को भोजन कराने, होम करने, दिन-रात अभिषेक करने, और अन्य अनेक भोगों तथा दानों से एक वर्ष तक…”

प्रीतिर्मे क्रियते साऽस्मिन् सकृत्सुचरिते श्रुते ।
श्रुतं हरति पापानि तथाऽऽरोग्यं प्रयच्छति ॥
२२ ॥

“…जो प्रसन्नता मुझे होती है, वह मेरे इस उत्तम चरित्र को एक बार सुनने मात्र से हो जाती है। सुनने पर यह पापों को हर लेता है और आरोग्य देता है।”

रक्षां करोति भूतेभ्यो जन्मनां कीर्तनं मम ।
युद्धेषु चरितं यन्मे दुष्टदैत्यनिबर्हणम् ॥
२३ ॥

“मेरे प्रकट होने का कीर्तन सब भूतों से रक्षा करता है; और युद्धों में दुष्ट दैत्यों के संहार का मेरा जो चरित्र है…”

तस्मिञ्छ्रुते वैरिकृतं भयं पुंसां न जायते ।
युष्माभिः स्तुतयो याश्च याश्च ब्रह्मर्षिभिः कृताः ॥
२४ ॥

“…उसे सुनने पर मनुष्यों को शत्रुओं का भय नहीं रहता। तुमने और ब्रह्मर्षियों ने जो स्तुतियाँ की हैं…”

ब्रह्मणा च कृतास्तास्तु प्रयच्छन्ति शुभां मतिम् ।
अरण्ये प्रान्तरे वापि दावाग्निपरिवारितः ॥
२५ ॥

“…और ब्रह्मा जी ने जो स्तुतियाँ की हैं, वे कल्याणमयी बुद्धि देती हैं। वन में, सूने मार्ग में, या दावानल से घिर जाने पर…”

दस्युभिर्वा वृतः शून्ये गृहीतो वापि शत्रुभिः ।
सिंहव्याघ्रानुयातो वा वने वा वनहस्तिभिः ॥
२६ ॥

“…निर्जन स्थान में लुटेरों से घिर जाने पर, शत्रुओं के पकड़ लेने पर, या वन में सिंह, बाघ अथवा जंगली हाथियों के पीछा करने पर…”

राज्ञा क्रुद्धेन चाज्ञप्तो वध्यो बन्धगतोऽपि वा ।
आघूर्णितो वा वातेन स्थितः पोते महार्णवे ॥
२७ ॥

“…क्रुद्ध राजा की आज्ञा से वध या बंधन के लिए ले जाए जाने पर, या महासागर में नाव पर तूफान से डगमगाने पर…”

पतत्सु चापि शस्त्रेषु सङ्ग्रामे भृशदारुणे ।
सर्वाबाधासु घोरासु वेदनाभ्यर्दितोऽपि वा ॥
२८ ॥

“…अत्यंत भयंकर युद्ध में शस्त्रों की बौछार के बीच, सब प्रकार की घोर बाधाओं में, या वेदना से पीड़ित होने पर…”

स्मरन्ममैतच्चरितं नरो मुच्येत सङ्कटात् ।
मम प्रभावात्सिंहाद्या दस्यवो वैरिणस्तथा ॥
२९ ॥

“…जो मेरे इस चरित्र का स्मरण करता है, वह संकट से मुक्त हो जाता है। मेरे प्रभाव से सिंह आदि, लुटेरे और शत्रु…”

दूरादेव पलायन्ते स्मरतश्चरितं मम ॥
३० ॥

“…मेरे चरित्र का स्मरण करनेवाले से दूर ही भाग जाते हैं।”

ऋषिरुवाच ॥
३१ ॥

ऋषि कहते हैं —

इत्युक्त्वा सा भगवती चण्डिका चण्डविक्रमा ॥
३२ ॥

ऐसा कहकर प्रचंड पराक्रमवाली भगवती चंडिका…

पश्यतामेव देवानां तत्रैवान्तरधीयत ।
तेऽपि देवा निरातङ्काः स्वाधिकारान् यथा पुरा ॥
३३ ॥

…देवताओं के देखते-देखते वहीं अंतर्धान हो गईं। फिर निर्भय हुए सब देवता पहले की भाँति अपने-अपने अधिकारों का पालन करने लगे…

यज्ञभागभुजः सर्वे चक्रुर्विनिहतारयः ।
दैत्याश्च देव्या निहते शुम्भे देवरिपौ युधि ॥
३४ ॥

…शत्रुओं के मारे जाने पर सब देवता फिर यज्ञभाग पाने लगे। युद्ध में देवी के हाथों देवशत्रु शुंभ के मारे जाने पर…

जगद्विध्वंसके तस्मिन् महोग्रेऽतुलविक्रमे ।
निशुम्भे च महावीर्ये शेषाः पातालमाययुः ॥
३५ ॥

…संसार का विध्वंस करनेवाले, अत्यंत उग्र और अतुल पराक्रमी उस शुंभ तथा महाबली निशुंभ के मारे जाने पर बचे हुए दैत्य पाताल चले गए।

एवं भगवती देवी सा नित्यापि पुनः पुनः ।
सम्भूय कुरुते भूप जगतः परिपालनम् ॥
३६ ॥

हे राजन, इस प्रकार भगवती देवी नित्य होते हुए भी बार-बार प्रकट होकर जगत की रक्षा करती हैं।

तयैतन्मोह्यते विश्वं सैव विश्वं प्रसूयते ।
सा याचिता च विज्ञानं तुष्टा ऋद्धिं प्रयच्छति ॥
३७ ॥

वे ही इस विश्व को मोहित करती हैं, वे ही इसे जन्म देती हैं; प्रार्थना करने पर वे ही विज्ञान देती हैं और प्रसन्न होकर समृद्धि प्रदान करती हैं।

व्याप्तं तयैतत्सकलं ब्रह्माण्डं मनुजेश्वर ।
महाकाल्या महाकाले महामारीस्वरूपया ॥
३८ ॥

हे राजन, महाप्रलय के समय महामारी का स्वरूप धारण करनेवाली वे महाकाली ही इस समस्त ब्रह्मांड में व्याप्त हैं।

सैव काले महामारी सैव सृष्टिर्भवत्यजा ।
स्थितिं करोति भूतानां सैव काले सनातनी ॥
३९ ॥

वे ही समय आने पर महामारी बनती हैं, वे ही अजन्मा होकर भी सृष्टि के रूप में प्रकट होती हैं, और वे सनातनी देवी ही समय पर सब प्राणियों का पालन करती हैं।

भवकाले नृणां सैव लक्ष्मीर्वृद्धिप्रदा गृहे ।
सैवाभावे तथाऽलक्ष्मीर्विनाशायोपजायते ॥
४० ॥

मनुष्यों के अभ्युदय के समय वे ही घर में लक्ष्मी बनकर उन्नति देती हैं, और अभाव के समय वे ही अलक्ष्मी बनकर विनाश का कारण होती हैं।

स्तुता सम्पूजिता पुष्पैर्धूपगन्धादिभिस्तथा ।
ददाति वित्तं पुत्रांश्च मतिं धर्मे गतिं शुभाम् ॥
४१ ॥

पुष्प, धूप, गंध आदि से पूजा करके उनकी स्तुति करने पर वे धन, संतान, धर्म में बुद्धि और उत्तम गति प्रदान करती हैं।

इन दिनों पर