ऋषिरुवाच ॥
१ ॥
ऋषि कहते हैं —
देव्या हते तत्र महासुरेन्द्रे सेन्द्राः सुरा वह्निपुरोगमास्ताम् ।
कात्यायनीं तुष्टुवुरिष्टलाभाद्विकाशिवक्त्राब्जविकाशिताशाः ॥
२ ॥
देवी द्वारा वहाँ महादैत्यों के राजा के मारे जाने पर इंद्र आदि देवता अग्नि को आगे करके कात्यायनी देवी की स्तुति करने लगे। मनचाहा फल पाकर उनके मुखकमल खिल उठे थे और उनकी आभा से दिशाएँ जगमगा रही थीं।
देवि प्रपन्नार्तिहरे प्रसीद प्रसीद मातर्जगतोऽखिलस्य ।
प्रसीद विश्वेश्वरि पाहि विश्वं त्वमीश्वरी देवि चराचरस्य ॥
३ ॥
हे शरणागतों की पीड़ा दूर करनेवाली देवी, प्रसन्न होइए। हे संपूर्ण जगत की माता, प्रसन्न होइए। हे विश्वेश्वरी, प्रसन्न होइए और विश्व की रक्षा कीजिए। हे देवी, आप ही चर और अचर सबकी स्वामिनी हैं।
आधारभूता जगतस्त्वमेका महीस्वरूपेण यतः स्थितासि ।
अपां स्वरूपस्थितया त्वयैतदाप्यायते कृत्स्नमलङ्घ्यवीर्ये ॥
४ ॥
आप ही इस जगत का एकमात्र आधार हैं, क्योंकि पृथ्वी के रूप में आप ही स्थित हैं। हे अलंघनीय पराक्रमवाली देवी, जल के रूप में स्थित होकर आप ही इस संपूर्ण जगत को तृप्त करती हैं।
त्वं वैष्णवी शक्तिरनन्तवीर्या विश्वस्य बीजं परमासि माया ।
सम्मोहितं देवि समस्तमेतत् त्वं वै प्रसन्ना भुवि मुक्तिहेतुः ॥
५ ॥
आप अनंत बलवाली वैष्णवी शक्ति हैं, इस विश्व की बीजरूपा परम माया हैं। हे देवी, आपने ही इस समस्त जगत को मोहित कर रखा है, और आप ही प्रसन्न होने पर इस पृथ्वी पर मोक्ष का कारण बनती हैं।
विद्याः समस्तास्तव देवि भेदाः स्त्रियः समस्ताः सकला जगत्सु ।
त्वयैकया पूरितमम्बयैतत् का ते स्तुतिः स्तव्यपरा परोक्तिः ॥
६ ॥
हे देवी, संपूर्ण विद्याएँ आपके ही भिन्न-भिन्न रूप हैं, और संसार की सब स्त्रियाँ आपकी ही मूर्तियाँ हैं। हे जगदंबा, अकेली आपने ही इस जगत को व्याप्त कर रखा है। आपकी स्तुति क्या हो सकती है? आप तो स्तुति के योग्य सबसे परे, स्वयं परा वाणी हैं।
सर्वभूता यदा देवी स्वर्गमुक्तिप्रदायिनी ।
त्वं स्तुता स्तुतये का वा भवन्तु परमोक्तयः ॥
७ ॥
जब आप सर्वस्वरूपा देवी स्वर्ग और मोक्ष देनेवाली हैं, तब इसी रूप में आपकी स्तुति हो गई। आपकी स्तुति के लिए इससे श्रेष्ठ उक्तियाँ और क्या हो सकती हैं?
सर्वस्य बुद्धिरूपेण जनस्य हृदि संस्थिते ।
स्वर्गापवर्गदे देवि नारायणि नमोऽस्तु ते ॥
८ ॥
बुद्धि के रूप में सब लोगों के हृदय में विराजमान रहनेवाली तथा स्वर्ग और मोक्ष देनेवाली देवी — हे नारायणी, आपको नमस्कार है।
कलाकाष्ठादिरूपेण परिणामप्रदायिनि ।
विश्वस्योपरतौ शक्ते नारायणि नमोऽस्तु ते ॥
९ ॥
कला, काष्ठा आदि समय के रूपों से सब कुछ को परिवर्तन की ओर ले जानेवाली और विश्व का उपसंहार करने में समर्थ देवी — हे नारायणी, आपको नमस्कार है।
सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके ।
शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते ॥
१० ॥
हे सब मंगलों का भी मंगल करनेवाली, हे कल्याणमयी शिवा, सब पुरुषार्थों को सिद्ध करनेवाली, शरण देनेवाली, तीन नेत्रोंवाली गौरी — हे नारायणी, आपको नमस्कार है।
सृष्टिस्थितिविनाशानां शक्तिभूते सनातनि ।
गुणाश्रये गुणमये नारायणि नमोऽस्तु ते ॥
११ ॥
सृष्टि, पालन और संहार की शक्तिस्वरूपा, सनातनी, गुणों की आश्रय और गुणमयी देवी — हे नारायणी, आपको नमस्कार है।
शरणागतदीनार्तपरित्राणपरायणे ।
सर्वस्यार्तिहरे देवि नारायणि नमोऽस्तु ते ॥
१२ ॥
शरण में आए दीनों और पीड़ितों की रक्षा में सदा लगी रहनेवाली, सबकी पीड़ा हरनेवाली देवी — हे नारायणी, आपको नमस्कार है।
हंसयुक्तविमानस्थे ब्रह्माणीरूपधारिणि ।
कौशाम्भःक्षरिके देवि नारायणि नमोऽस्तु ते ॥
१३ ॥
हंसों से जुते विमान पर बैठनेवाली, ब्रह्माणी का रूप धारण करनेवाली, कुश से जल छिड़कनेवाली देवी — हे नारायणी, आपको नमस्कार है।
त्रिशूलचन्द्राहिधरे महावृषभवाहिनि ।
माहेश्वरीस्वरूपेण नारायणि नमोऽस्तु ते ॥
१४ ॥
त्रिशूल, चंद्रमा और सर्प धारण करनेवाली, महान वृषभ पर सवार, माहेश्वरी रूपवाली देवी — हे नारायणी, आपको नमस्कार है।
मयूरकुक्कुटवृते महाशक्तिधरेऽनघे ।
कौमारीरूपसंस्थाने नारायणि नमोऽस्तु ते ॥
१५ ॥
मोर और मुर्गों से घिरी रहनेवाली, महाशक्ति (भाला) धारण करनेवाली, कौमारी रूप में स्थित निष्पाप देवी — हे नारायणी, आपको नमस्कार है।
शङ्खचक्रगदाशार्ङ्गगृहीतपरमायुधे ।
प्रसीद वैष्णवीरूपे नारायणि नमोऽस्तु ते ॥
१६ ॥
शंख, चक्र, गदा और शार्ङ्ग धनुष जैसे उत्तम आयुध धारण करनेवाली वैष्णवी रूपा, प्रसन्न होइए — हे नारायणी, आपको नमस्कार है।
गृहीतोग्रमहाचक्रे दंष्ट्रोद्धृतवसुन्धरे ।
वराहरूपिणि शिवे नारायणि नमोऽस्तु ते ॥
१७ ॥
हाथ में भयंकर महाचक्र धारण करनेवाली और अपनी दाढ़ पर धरती को उठानेवाली, वाराही रूपा कल्याणमयी देवी — हे नारायणी, आपको नमस्कार है।
नृसिंहरूपेणोग्रेण हन्तुं दैत्यान् कृतोद्यमे ।
त्रैलोक्यत्राणसहिते नारायणि नमोऽस्तु ते ॥
१८ ॥
भयंकर नृसिंह रूप से दैत्यों के वध के लिए उद्यत होनेवाली और तीनों लोकों की रक्षा करनेवाली देवी — हे नारायणी, आपको नमस्कार है।
किरीटिनि महावज्रे सहस्रनयनोज्ज्वले ।
वृत्रप्राणहरे चैन्द्रि नारायणि नमोऽस्तु ते ॥
१९ ॥
मुकुट और महावज्र धारण करनेवाली, सहस्र नेत्रों से दीप्त, वृत्रासुर के प्राण हरनेवाली ऐंद्री — हे नारायणी, आपको नमस्कार है।
शिवदूतीस्वरूपेण हतदैत्यमहाबले ।
घोररूपे महारावे नारायणि नमोऽस्तु ते ॥
२० ॥
शिवदूती रूप से दैत्यों की विशाल सेना का संहार करनेवाली, भयंकर रूप और विकट गर्जनावाली देवी — हे नारायणी, आपको नमस्कार है।
दंष्ट्राकरालवदने शिरोमालाविभूषणे ।
चामुण्डे मुण्डमथने नारायणि नमोऽस्तु ते ॥
२१ ॥
दाढ़ों से विकराल मुखवाली, मुंडमाला से विभूषित, मुंड का मर्दन करनेवाली चामुंडा — हे नारायणी, आपको नमस्कार है।
लक्ष्मि लज्जे महाविद्ये श्रद्धे पुष्टि स्वधे ध्रुवे ।
महारात्रि महामाये नारायणि नमोऽस्तु ते ॥
२२ ॥
हे लक्ष्मी, लज्जा, महाविद्या, श्रद्धा, पुष्टि, स्वधा, ध्रुवा, महारात्रि और महामाया — हे नारायणी, आपको नमस्कार है।
मेधे सरस्वति वरे भूति बाभ्रवि तामसि ।
नियते त्वं प्रसीदेशे नारायणि नमोऽस्तु ते ॥
२३ ॥
हे मेधा, सरस्वती, वरा (श्रेष्ठा), भूति (ऐश्वर्यरूपा), बाभ्रवी, तामसी, नियता (संयम में स्थित) और सबकी ईश्वरी, प्रसन्न होइए — हे नारायणी, आपको नमस्कार है।
सर्वस्वरूपे सर्वेशे सर्वशक्तिसमन्विते ।
भयेभ्यस्त्राहि नो देवि दुर्गे देवि नमोऽस्तु ते ॥
२४ ॥
हे सर्वस्वरूपा, सर्वेश्वरी, सब शक्तियों से संपन्न देवी, भयों से हमारी रक्षा कीजिए। हे दुर्गा देवी, आपको नमस्कार है।
एतत्ते वदनं सौम्यं लोचनत्रयभूषितम् ।
पातु नः सर्वभीतिभ्यः कात्यायनि नमोऽस्तु ते ॥
२५ ॥
तीन नेत्रों से सुशोभित आपका यह सौम्य मुख सब प्रकार के भयों से हमारी रक्षा करे। हे कात्यायनी, आपको नमस्कार है।
ज्वालाकरालमत्युग्रमशेषासुरसूदनम् ।
त्रिशूलं पातु नो भीतेर्भद्रकालि नमोऽस्तु ते ॥
२६ ॥
ज्वालाओं से विकराल, अत्यंत भयंकर और समस्त असुरों का संहार करनेवाला आपका त्रिशूल भय से हमारी रक्षा करे। हे भद्रकाली, आपको नमस्कार है।
हिनस्ति दैत्यतेजांसि स्वनेनापूर्य या जगत् ।
सा घण्टा पातु नो देवि पापेभ्यो नः सुतानिव ॥
२७ ॥
हे देवी, जो अपनी ध्वनि से जगत को भरकर दैत्यों का तेज नष्ट कर देता है, आपका वह घंटा हमें पापों से वैसे ही बचाए, जैसे माता अपने बच्चों को बचाती है।
असुरासृग्वसापङ्कचर्चितस्ते करोज्ज्वलः ।
शुभाय खड्गो भवतु चण्डिके त्वां नता वयम् ॥
२८ ॥
असुरों के रक्त और चर्बी से सना, आपके हाथ में चमकता हुआ खड्ग हमारा मंगल करे। हे चंडिका, हम आपको नमस्कार करते हैं।
रोगानशेषानपहंसि तुष्टा रुष्टा तु कामान् सकलानभीष्टान् ।
त्वामाश्रितानां न विपन्नराणां त्वामाश्रिता ह्याश्रयतां प्रयान्ति ॥
२९ ॥
आप प्रसन्न होने पर सब रोगों को नष्ट कर देती हैं और रुष्ट होने पर सभी मनचाही कामनाओं को नष्ट कर देती हैं। जो आपकी शरण में आ चुके हैं, उन पर विपत्ति नहीं आती; आपकी शरण में गए लोग दूसरों को शरण देनेवाले बन जाते हैं।
एतत्कृतं यत्कदनं त्वयाद्य धर्मद्विषां देवि महासुराणाम् ।
रूपैरनेकैर्बहुधाऽऽत्ममूर्ति कृत्वाम्बिके तत्प्रकरोति कान्या ॥
३० ॥
हे देवी, हे अंबिका, आपने अपने स्वरूप को अनेक रूपों में बाँटकर आज धर्म से द्रोह करनेवाले इन महादैत्यों का जो संहार किया है, वह दूसरी कौन कर सकती थी?
विद्यासु शास्त्रेषु विवेकदीपेष्वाद्येषु वाक्येषु च का त्वदन्या ।
ममत्वगर्तेऽतिमहान्धकारे विभ्रामयत्येतदतीव विश्वम् ॥
३१ ॥
विद्याओं में, विवेक का दीप जलानेवाले शास्त्रों में और आदि वाक्यों (वेदों) में आपके सिवा और किसका वर्णन है? और आपके सिवा दूसरी कौन है, जो इस विश्व को ममता रूपी घोर अंधकार भरे गड्ढे में निरंतर भटका रही है?
रक्षांसि यत्रोग्रविषाश्च नागा यत्रारयो दस्युबलानि यत्र ।
दावानलो यत्र तथाब्धिमध्ये तत्र स्थिता त्वं परिपासि विश्वम् ॥
३२ ॥
जहाँ राक्षस हों, जहाँ भयंकर विषवाले सर्प हों, जहाँ शत्रु और लुटेरों की सेनाएँ हों, जहाँ दावानल हो, और समुद्र के बीच भी — वहाँ स्थित होकर आप विश्व की रक्षा करती हैं।
विश्वेश्वरि त्वं परिपासि विश्वं विश्वात्मिका धारयसीति विश्वम् ।
विश्वेशवन्द्या भवती भवन्ति विश्वाश्रया ये त्वयि भक्तिनम्राः ॥
३३ ॥
हे विश्वेश्वरी, आप विश्व का पालन करती हैं; विश्वरूपा होने के कारण आप ही विश्व को धारण करती हैं। आप भगवान विश्वनाथ की भी वंदनीया हैं, और जो भक्ति से आपके आगे नतमस्तक होते हैं, वे पूरे विश्व को आश्रय देनेवाले बन जाते हैं।
देवि प्रसीद परिपालय नोऽरिभीतेर्नित्यं यथासुरवधादधुनैव सद्यः ।
पापानि सर्वजगतां प्रशमं नयाशु उत्पातपाकजनितांश्च महोपसर्गान् ॥
३४ ॥
हे देवी, प्रसन्न होइए। जैसे अभी असुरों का वध करके आपने तुरंत हमारी रक्षा की है, वैसे ही सदा शत्रुओं के भय से हमें बचाइए। संपूर्ण जगत के पापों को शीघ्र शांत कीजिए, और उत्पातों के फलस्वरूप आनेवाले बड़े-बड़े उपद्रवों को दूर कीजिए।
प्रणतानां प्रसीद त्वं देवि विश्वार्तिहारिणि ।
त्रैलोक्यवासिनामीड्ये लोकानां वरदा भव ॥
३५ ॥
हे विश्व की पीड़ा हरनेवाली देवी, हम आपके चरणों में झुके हैं, हम पर प्रसन्न होइए। हे तीनों लोकों के निवासियों की पूजनीया, सब लोकों को वरदान दीजिए।
देव्युवाच ॥
३६ ॥
देवी ने कहा —
वरदाहं सुरगणा वरं यन्मनसेच्छथ ।
तं वृणुध्वं प्रयच्छामि जगतामुपकारकम् ॥
३७ ॥
“हे देवताओ, मैं वर देने को तैयार हूँ। तुम्हारे मन में जिस वर की इच्छा हो, जगत का उपकार करनेवाला वह वर माँग लो; मैं उसे दूँगी।”
देवा ऊचुः ॥
३८ ॥
देवताओं ने कहा —
सर्वाबाधाप्रशमनं त्रैलोक्यस्याखिलेश्वरि ।
एवमेव त्वया कार्यमस्मद्वैरिविनाशनम् ॥
३९ ॥
“हे सर्वेश्वरी, आप इसी प्रकार तीनों लोकों की समस्त बाधाओं को शांत करें और हमारे शत्रुओं का नाश करती रहें।”
देव्युवाच ॥
४० ॥
देवी ने कहा —
वैवस्वतेऽन्तरे प्राप्ते अष्टाविंशतिमे युगे ।
शुम्भो निशुम्भश्चैवान्यावुत्पत्स्येते महासुरौ ॥
४१ ॥
“वैवस्वत मन्वंतर के अट्ठाईसवें युग में शुंभ और निशुंभ नाम के दो अन्य महादैत्य उत्पन्न होंगे।”
नन्दगोपगृहे जाता यशोदागर्भसम्भवा ।
ततस्तौ नाशयिष्यामि विन्ध्याचलनिवासिनी ॥
४२ ॥
“तब मैं नंद गोप के घर में यशोदा के गर्भ से जन्म लेकर, विंध्याचल में निवास करती हुई, उन दोनों का नाश करूँगी।”
पुनरप्यतिरौद्रेण रूपेण पृथिवीतले ।
अवतीर्य हनिष्यामि वैप्रचित्तांस्तु दानवान् ॥
४३ ॥
“फिर अत्यंत भयंकर रूप में पृथ्वी पर अवतार लेकर मैं विप्रचित्ति के वंशज दानवों का वध करूँगी।”
भक्षयन्त्याश्च तानुग्रान् वैप्रचित्तान् महासुरान् ।
रक्ता दन्ता भविष्यन्ति दाडिमीकुसुमोपमाः ॥
४४ ॥
“विप्रचित्ति के वंश के उन भयंकर महादैत्यों का भक्षण करते समय मेरे दाँत अनार के फूल की तरह लाल हो जाएँगे।”
ततो मां देवताः स्वर्गे मर्त्यलोके च मानवाः ।
स्तुवन्तो व्याहरिष्यन्ति सततं रक्तदन्तिकाम् ॥
४५ ॥
“तब स्वर्ग में देवता और मर्त्यलोक में मनुष्य मेरी स्तुति करते हुए मुझे सदा ‘रक्तदंतिका’ कहेंगे।”
भूयश्च शतवार्षिक्यामनावृष्ट्यामनम्भसि ।
मुनिभिः संस्तुता भूमौ सम्भविष्याम्ययोनिजा ॥
४६ ॥
“फिर जब सौ वर्षों तक वर्षा नहीं होगी और पृथ्वी पर जल नहीं रहेगा, तब मुनियों के स्तुति करने पर मैं अयोनिजा रूप में पृथ्वी पर प्रकट होऊँगी।”
ततः शतेन नेत्राणां निरीक्षिष्यामि यन्मुनीन् ।
कीर्तयिष्यन्ति मनुजाः शताक्षीमिति मां ततः ॥
४७ ॥
“मैं सौ नेत्रों से मुनियों को देखूँगी, इसलिए मनुष्य ‘शताक्षी’ नाम से मेरा कीर्तन करेंगे।”
ततोऽहमखिलं लोकमात्मदेहसमुद्भवैः ।
भरिष्यामि सुराः शाकैरावृष्टेः प्राणधारकैः ॥
४८ ॥
“हे देवताओ, तब जब तक वर्षा नहीं होगी, मैं अपने शरीर से उत्पन्न, प्राणों की रक्षा करनेवाले शाकों से पूरे संसार का भरण-पोषण करूँगी।”
शाकम्भरीति विख्यातिं तदा यास्याम्यहं भुवि ।
तत्रैव च वधिष्यामि दुर्गमाख्यं महासुरम् ॥
४९ ॥
“तब पृथ्वी पर मैं ‘शाकंभरी’ नाम से प्रसिद्ध होऊँगी, और उसी अवतार में दुर्गम नाम के महादैत्य का वध करूँगी।”
दुर्गादेवीति विख्यातं तन्मे नाम भविष्यति ।
पुनश्चाहं यदा भीमं रूपं कृत्वा हिमाचले ॥
५० ॥
“इससे मेरा नाम ‘दुर्गादेवी’ के रूप में प्रसिद्ध होगा। फिर जब मैं हिमालय पर भयंकर रूप धारण करके…”
रक्षांसि भक्षयिष्यामि मुनीनां त्राणकारणात् ।
तदा मां मुनयः सर्वे स्तोष्यन्त्यानम्रमूर्तयः ॥
५१ ॥
“…मुनियों की रक्षा के लिए राक्षसों का भक्षण करूँगी, तब सब मुनि नतमस्तक होकर मेरी स्तुति करेंगे।”
भीमादेवीति विख्यातं तन्मे नाम भविष्यति ।
यदारुणाख्यस्त्रैलोक्ये महाबाधां करिष्यति ॥
५२ ॥
“तब मेरा नाम ‘भीमादेवी’ के रूप में प्रसिद्ध होगा। जब अरुण नाम का दैत्य तीनों लोकों में भारी उपद्रव मचाएगा…”
तदाहं भ्रामरं रूपं कृत्वासङ्ख्येयषट्पदम् ।
त्रैलोक्यस्य हितार्थाय वधिष्यामि महासुरम् ॥
५३ ॥
“…तब मैं तीनों लोकों के हित के लिए असंख्य भ्रमरों का रूप धारण करके उस महादैत्य का वध करूँगी।”
भ्रामरीति च मां लोकास्तदा स्तोष्यन्ति सर्वतः ।
इत्थं यदा यदा बाधा दानवोत्था भविष्यति ॥
५४ ॥
“तब लोग चारों ओर ‘भ्रामरी’ नाम से मेरी स्तुति करेंगे। इस प्रकार जब-जब दानवों के कारण बाधा उपस्थित होगी…”
तदा तदावतीर्याहं करिष्याम्यरिसङ्क्षयम् ॥
५५ ॥
“…तब-तब मैं अवतार लेकर शत्रुओं का संहार करूँगी।”
