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स्तोत्र · माँ दुर्गा

दुर्गा सप्तशती, दसवाँ अध्याय (शुंभ वध)

32 पंक्तियाँ · बोलने में लगभग 2 मिनट · Durga Saptashati, chapter 10 (Gita Press)

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माँ दुर्गा

माँ दुर्गा

नवरात्रि की देवी

ऋषिरुवाच ॥
१ ॥

ऋषि कहते हैं —

निशुम्भं निहतं दृष्ट्वा भ्रातरं प्राणसम्मितम् ।
हन्यमानं बलं चैव शुम्भः क्रुद्धोऽब्रवीद्वचः ॥
२ ॥

प्राणों के समान प्यारे भाई निशुम्भ को मारा गया और अपनी सेना का संहार होता देखकर शुम्भ ने क्रोध में भरकर कहा —

बलावलेपाद्दुष्टे त्वं मा दुर्गे गर्वमावह ।
अन्यासां बलमाश्रित्य युद्ध्यसे यातिमानिनी ॥
३ ॥

“दुष्ट दुर्गे! बल के घमंड में आकर गर्व मत दिखाओ। इतनी मानिनी होकर भी तुम दूसरों के बल का सहारा लेकर लड़ रही हो।”

देव्युवाच ॥
४ ॥

देवी ने कहा —

एकैवाहं जगत्यत्र द्वितीया का ममापरा ।
पश्यैता दुष्ट मय्येव विशन्त्यो मद्विभूतयः ॥
५ ॥

“इस संसार में मैं अकेली ही हूँ; मेरे सिवा दूसरी कौन है? ओ दुष्ट, देख, ये मेरी ही विभूतियाँ मुझमें ही प्रवेश कर रही हैं।”

ततः समस्तास्ता देव्यो ब्रह्माणीप्रमुखा लयम् ।
तस्या देव्यास्तनौ जग्मुरेकैवासीत्तदाम्बिका ॥
६ ॥

तब ब्रह्माणी आदि वे सभी देवियाँ उन देवी के शरीर में लीन हो गईं, और उस समय केवल अम्बिका ही रह गईं।

देव्युवाच ॥
७ ॥

देवी ने कहा —

अहं विभूत्या बहुभिरिह रूपैर्यदास्थिता ।
तत्संहृतं मयैकैव तिष्ठाम्याजौ स्थिरो भव ॥
८ ॥

“अपनी विभूति से मैं जिन अनेक रूपों में यहाँ उपस्थित थी, उन्हें मैंने समेट लिया है। अब मैं अकेली ही युद्ध में खड़ी हूँ; तुम भी स्थिर हो जाओ।”

ऋषिरुवाच ॥
९ ॥

ऋषि कहते हैं —

ततः प्रववृते युद्धं देव्याः शुम्भस्य चोभयोः ।
पश्यतां सर्वदेवानामसुराणां च दारुणम् ॥
१० ॥

तब सब देवताओं और असुरों के देखते-देखते देवी और शुम्भ दोनों में भयंकर युद्ध छिड़ गया।

शरवर्षैः शितैः शस्त्रैस्तथा चास्त्रैः सुदारुणैः ।
तयोर्युद्धमभूद्भूयः सर्वलोकभयङ्करम् ॥
११ ॥

बाणों की वर्षा, तीखे शस्त्रों और अत्यंत भयंकर अस्त्रों के प्रहार से उन दोनों का युद्ध फिर ऐसा हुआ कि सारे लोक भयभीत हो गए।

दिव्यान्यस्त्राणि शतशो मुमुचे यान्यथाम्बिका ।
बभञ्ज तानि दैत्येन्द्रस्तत्प्रतीघातकर्तृभिः ॥
१२ ॥

अम्बिका ने जो सैकड़ों दिव्य अस्त्र छोड़े, उन्हें दैत्यराज ने उनके निवारक अस्त्रों से काट डाला।

मुक्तानि तेन चास्त्राणि दिव्यानि परमेश्वरी ।
बभञ्ज लीलयैवोग्रहुङ्कारोच्चारणादिभिः ॥
१३ ॥

और शुम्भ ने जो दिव्य अस्त्र चलाए, उन्हें परमेश्वरी ने भयंकर हुंकार आदि के उच्चारण से खेल-खेल में ही नष्ट कर दिया।

ततः शरशतैर्देवीमाच्छादयत सोऽसुरः ।
सापि तत्कुपिता देवी धनुश्चिच्छेद चेषुभिः ॥
१४ ॥

तब उस असुर ने सैकड़ों बाणों से देवी को ढक दिया; इससे कुपित होकर देवी ने भी बाणों से उसका धनुष काट डाला।

छिन्ने धनुषि दैत्येन्द्रस्तथा शक्तिमथाददे ।
चिच्छेद देवी चक्रेण तामप्यस्य करे स्थिताम् ॥
१५ ॥

धनुष कट जाने पर दैत्यराज ने शक्ति उठाई, किंतु देवी ने चक्र से उसके हाथ की उस शक्ति को भी काट गिराया।

ततः खड्गमुपादाय शतचन्द्रं च भानुमत् ।
अभ्यधावत्तदा देवीं दैत्यानामधिपेश्वरः ॥
१६ ॥

तत्पश्चात् दैत्यों के स्वामी शुम्भ ने सौ चाँदोंवाली चमकती ढाल और तलवार हाथ में लेकर उस समय देवी पर धावा किया।

तस्यापतत एवाशु खड्गं चिच्छेद चण्डिका ।
धनुर्मुक्तैः शितैर्बाणैश्चर्म चार्ककरामलम् ॥
१७ ॥

उसके आते ही चण्डिका ने अपने धनुष से छोड़े तीखे बाणों से उसकी तलवार और सूर्य की किरणों के समान उज्ज्वल ढाल को तुरंत काट डाला।

हताश्वः स तदा दैत्यश्छिन्नधन्वा विसारथिः ।
जग्राह मुद्गरं घोरमम्बिकानिधनोद्यतः ॥
१८ ॥

घोड़े मारे गए, धनुष कट चुका था और सारथि भी न रहा; तब वह दैत्य अम्बिका को मारने को उद्यत होकर भयंकर मुद्गर उठा लाया।

चिच्छेदापततस्तस्य मुद्गरं निशितैः शरैः ।
तथापि सोऽभ्यधावत्तां मुष्टिमुद्यम्य वेगवान् ॥
१९ ॥

उसके आते ही देवी ने तीखे बाणों से उसका मुद्गर भी काट डाला; फिर भी वह असुर मुक्का तानकर बड़े वेग से उनकी ओर झपटा।

स मुष्टिं पातयामास हृदये दैत्यपुङ्गवः ।
देव्यास्तं चापि सा देवी तलेनोरस्यताडयत् ॥
२० ॥

उस दैत्यश्रेष्ठ ने देवी की छाती पर मुक्का मारा; तब उन देवी ने भी उसकी छाती पर हथेली से प्रहार किया।

तलप्रहाराभिहतो निपपात महीतले ।
स दैत्यराजः सहसा पुनरेव तथोत्थितः ॥
२१ ॥

हथेली के प्रहार से आहत होकर दैत्यराज पृथ्वी पर गिर पड़ा, किंतु सहसा पहले की तरह फिर उठकर खड़ा हो गया।

उत्पत्य च प्रगृह्योच्चैर्देवीं गगनमास्थितः ।
तत्रापि सा निराधारा युयुधे तेन चण्डिका ॥
२२ ॥

फिर वह उछला और देवी को पकड़कर ऊपर आकाश में जा पहुँचा; वहाँ भी चण्डिका बिना किसी आधार के उससे युद्ध करने लगीं।

नियुद्धं खे तदा दैत्यश्चण्डिका च परस्परम् ।
चक्रतुः प्रथमं सिद्धमुनिविस्मयकारकम् ॥
२३ ॥

उस समय आकाश में दैत्य और चण्डिका आपस में मल्लयुद्ध करने लगे; वह युद्ध ऐसा था जैसा पहले कभी न हुआ, जिसने सिद्धों और मुनियों को भी विस्मय में डाल दिया।

ततो नियुद्धं सुचिरं कृत्वा तेनाम्बिका सह ।
उत्पात्य भ्रामयामास चिक्षेप धरणीतले ॥
२४ ॥

फिर अम्बिका ने शुम्भ के साथ बहुत देर तक युद्ध करने के बाद उसे ऊपर उठाकर घुमाया और पृथ्वी पर पटक दिया।

स क्षिप्तो धरणीं प्राप्य मुष्टिमुद्यम्य वेगितः ।
अभ्यधावत दुष्टात्मा चण्डिकानिधनेच्छया ॥
२५ ॥

पटके जाने पर पृथ्वी पर आते ही वह दुष्टात्मा मुक्का तानकर चण्डिका का वध करने की इच्छा से बड़े वेग से दौड़ा।

तमायान्तं ततो देवी सर्वदैत्यजनेश्वरम् ।
जगत्यां पातयामास भित्त्वा शूलेन वक्षसि ॥
२६ ॥

तब समस्त दैत्यों के राजा शुम्भ को अपनी ओर आते देख देवी ने त्रिशूल से उसकी छाती छेदकर उसे पृथ्वी पर गिरा दिया।

स गतासुः पपातोर्व्यां देवीशूलाग्रविक्षतः ।
चालयन् सकलां पृथ्वीं साब्धिद्वीपां सपर्वताम् ॥
२७ ॥

देवी के शूल की नोक से घायल होकर वह प्राणहीन होकर गिर पड़ा, और समुद्रों, द्वीपों तथा पर्वतों सहित सारी पृथ्वी को कँपा गया।

ततः प्रसन्नमखिलं हते तस्मिन् दुरात्मनि ।
जगत् स्वास्थ्यमतीवाप निर्मलं चाभवन्नभः ॥
२८ ॥

उस दुरात्मा के मारे जाने पर सारा जगत प्रसन्न और पूर्ण स्वस्थ हो गया, और आकाश निर्मल हो गया।

उत्पातमेघाः सोल्का ये प्रागासंस्ते शमं ययुः ।
सरितो मार्गवाहिन्यस्तथासंस्तत्र पातिते ॥
२९ ॥

पहले जो उत्पात-सूचक मेघ और उल्कापात होते थे, वे सब शांत हो गए, और उस दैत्य के गिरने पर नदियाँ भी अपने ठीक मार्ग से बहने लगीं।

ततो देवगणाः सर्वे हर्षनिर्भरमानसाः ।
बभूवुर्निहते तस्मिन् गन्धर्वा ललितं जगुः ॥
३० ॥

उसके मारे जाने पर सभी देवताओं के हृदय हर्ष से भर गए, और गंधर्व मधुर गीत गाने लगे।

अवादयंस्तथैवान्ये ननृतुश्चाप्सरोगणाः ।
ववुः पुण्यास्तथा वाताः सुप्रभोऽभूद्दिवाकरः ॥
३१ ॥

दूसरे गंधर्व बाजे बजाने लगे और अप्सराएँ नाचने लगीं; पवित्र वायु बहने लगी और सूर्य की प्रभा उत्तम हो गई।

जज्वलुश्चाग्नयः शान्ताः शान्ता दिग्जनितस्वनाः ॥
३२ ॥

जो अग्नियाँ बुझ गई थीं, वे फिर से प्रज्वलित हो उठीं, और दिशाओं से उठनेवाले भयंकर शब्द शांत हो गए।

इन दिनों पर