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लोहड़ी · कथा

दुल्ला भट्टी

सबसे ठंडे महीने की आख़िरी रात, अलाव में जला दी जाती है। वर्ष की नई बहू और नए बच्चे को उसके सामने लाया जाता है, और अग्नि को शीत की अपनी फ़सल दी जाती है — तिल, गुड़, रेवड़ी, फुल्ले।

अकबर के पंजाब में वे एक ज़मींदार थे, जो वसूली करने वालों से लेकर गाँवों को लौटा देते थे, और जो लड़कियों को उठाकर बेचे जाने से रोकते थे।

दो का विवाह उन्होंने स्वयं कराया — कोई घरवाला नहीं था, तो वे भाई बनकर खड़े हुए, जितना दहेज जुटा सके जुटाया, और खेत की आग के सामने मुट्ठी भर शक्कर से विवाह कर दिया।

लोहड़ी का हर गीत आज भी उनका नाम लेता है। बच्चे घर-घर जाकर सुंदर-मुंदरिये गाते हैं, और द्वार उन्हें रेवड़ी और गुड़ देता है, और किसी को बताना नहीं पड़ता कि वे कौन थे।

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