अकबर के पंजाब में वे एक ज़मींदार थे, जो वसूली करने वालों से लेकर गाँवों को लौटा देते थे, और जो लड़कियों को उठाकर बेचे जाने से रोकते थे।
दो का विवाह उन्होंने स्वयं कराया — कोई घरवाला नहीं था, तो वे भाई बनकर खड़े हुए, जितना दहेज जुटा सके जुटाया, और खेत की आग के सामने मुट्ठी भर शक्कर से विवाह कर दिया।
लोहड़ी का हर गीत आज भी उनका नाम लेता है। बच्चे घर-घर जाकर सुंदर-मुंदरिये गाते हैं, और द्वार उन्हें रेवड़ी और गुड़ देता है, और किसी को बताना नहीं पड़ता कि वे कौन थे।
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