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विनायक चतुर्थी · कथा

तिनकों का बालक

अमावस्या के बाद की चतुर्थी, हर महीने गणेश जी के लिए, और उनकी पूजा दोपहर में। उनसे वरद रूप में — वर देने वाले के रूप में — माँगा जाता है, और उस रात चंद्रमा की ओर नहीं देखा जाता।

यह विनायक चतुर्थी की व्रत कथा है, जो हर महीने शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को गणेश जी की पूजा के बाद पढ़ी और सुनी जाती है। कथा पढ़ने वाले के साथ घर के सब लोग गणेश जी के सामने बैठकर इसे सुनते हैं।

एक बार भगवान शिव और माता पार्वती नर्मदा नदी के किनारे बैठे थे। नदी का जल बह रहा था और चारों ओर शांति थी। समय बिताने के लिए माता पार्वती ने भगवान भोलेनाथ से चौपड़ खेलने को कहा। भगवान शंकर चौपड़ खेलने के लिए तैयार तो हो गए, परंतु उनके सामने एक प्रश्न आया — इस खेल में हार-जीत का फ़ैसला कौन करेगा? वहाँ उन दोनों के सिवा और कोई नहीं था।

तब भगवान शिव ने पास पड़े कुछ तिनके इकट्ठे किए और उनसे एक पुतला बनाया। फिर उस पुतले की प्राण-प्रतिष्ठा कर दी, और वह एक बालक बन गया। शिव जी ने उस बालक से कहा, 'बेटा, हम चौपड़ खेलना चाहते हैं, परंतु हमारी हार-जीत का फ़ैसला करने वाला कोई नहीं है। इसलिए खेल के बाद तुम बताना कि हम दोनों में से कौन हारा और कौन जीता।'

इसके बाद चौपड़ का खेल शुरू हुआ। खेल तीन बार खेला गया, और तीनों बार माता पार्वती ही जीतीं। खेल समाप्त होने पर बालक से हार-जीत का फ़ैसला करने को कहा गया। तब उस बालक ने महादेव को विजयी बताया।

यह सुनकर माता पार्वती को बहुत क्रोध आया। क्रोध में उन्होंने बालक को श्राप दे दिया कि वह लंगड़ा हो जाए और कीचड़ में पड़ा रहे। बालक ने हाथ जोड़कर माता से क्षमा माँगी और कहा, 'माँ, यह मुझसे अज्ञानता के कारण हुआ है। मैंने किसी द्वेष से ऐसा नहीं कहा।'

बालक को क्षमा माँगते देख माता का मन पसीज गया। उन्होंने कहा, 'यहाँ गणेश पूजन के लिए नाग कन्याएँ आएँगी। उनके कहे अनुसार तुम गणेश जी का व्रत करना। ऐसा करने से तुम मुझे प्राप्त करोगे।' यह कहकर माता पार्वती भगवान शिव के साथ कैलाश पर्वत पर चली गईं।

ठीक एक वर्ष बाद उसी स्थान पर नाग कन्याएँ गणेश जी की पूजा करने आईं। बालक ने उनसे श्री गणेश के व्रत की विधि पूछी। उनसे विधि जानकर उस बालक ने लगातार इक्कीस दिन तक गणेश जी का व्रत किया। उसकी श्रद्धा देखकर गणेश जी प्रसन्न हुए, उसके सामने प्रकट हुए, और बोले, 'जो चाहो, माँग लो।'

बालक ने कहा, 'हे विनायक! मुझे इतनी शक्ति दीजिए कि मैं अपने पैरों से चलकर अपने माता-पिता के पास कैलाश पर्वत तक पहुँच सकूँ, और वे यह देखकर प्रसन्न हों।' गणेश जी बालक को यह वरदान देकर अंतर्धान हो गए।

इसके बाद वह बालक अपने पैरों से चलकर कैलाश पर्वत पहुँचा, और वहाँ पहुँचने की पूरी कथा उसने भगवान महादेव को सुनाई। उधर चौपड़ वाले दिन से ही माता पार्वती शिव जी से विमुख थीं। देवी को प्रसन्न करने के लिए भगवान शंकर ने भी बालक के बताए अनुसार इक्कीस दिन तक गणेश जी का व्रत किया। इस व्रत के प्रभाव से माता के मन में भगवान भोलेनाथ के प्रति जो नाराज़गी थी, वह समाप्त हो गई।

तब भगवान शिव ने यह व्रत-विधि माता पार्वती को बताई। यह सुनकर माता पार्वती के मन में भी अपने पुत्र कार्तिकेय से मिलने की इच्छा जागी। माता ने भी इक्कीस दिन तक श्री गणेश का व्रत किया, और दूर्वा, फूल और लड्डुओं से गणेश जी की पूजा की। व्रत के इक्कीसवें दिन कार्तिकेय स्वयं माता पार्वती से आ मिले।

उसी दिन से श्री गणेश चतुर्थी का यह व्रत मनोकामना पूरी करने वाला व्रत माना जाता है। जैसे गणेश जी ने उस बालक की, भगवान शिव की और माता पार्वती की मनोकामना पूरी की, वैसे ही वे इस व्रत को रखने वाले और यह कथा कहने-सुनने वाले सबकी मनोकामना पूरी करें। बोलो गणपति बप्पा की जय।

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विनायक चतुर्थी

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