कराग्रे वसते लक्ष्मीः कर मध्ये सरस्वती ।
हथेली के अग्रभाग में लक्ष्मी, मध्य में सरस्वती,
कर मूले स्थिता गौरी प्रभाते कर दर्शनम् ॥
मूल में गौरी — इसलिए प्रभात में हाथों का दर्शन।
समुद्रवसने देवि पर्वतस्तनमण्डले।
समुद्र जिसका वस्त्र है, पर्वत जिसका वक्ष — हे देवी,
विष्णुपत्नि नमस्तुभ्यं पादस्पर्शं क्षमस्व मे॥
विष्णुपत्नी, तुम्हें नमस्कार; मेरे पैरों का स्पर्श क्षमा करो।