पार्वती माँ शिव जी को मन में वर चुकी थीं। उनके पिता ने विष्णु जी से वचन दे रखा था, और बात लगभग तय थी।
तब उनकी सखी उन्हें ले गई — हरित, यानी हर ली गईं; आलिका, यानी सखी द्वारा — उस वन में, जहाँ कोई खोजने न आए। वहाँ बेल के पेड़ के नीचे पार्वती माँ ने नदी की रेत हाथ में ली और उससे शिवलिंग बनाया। न अन्न, न जल — पूरा दिन उसके सामने बैठी रहीं, और पूरी रात सोईं नहीं।
भाद्रपद शुक्ल तृतीया को शिव जी आए और वचन दिया। पिता ने जब उन्हें पाया, तब कहने को कुछ बचा ही नहीं था।
दिन का नाम वधू का नहीं, सखी का है — उसका, जो उन्हें ले जाने को तैयार हुई।
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