एक बार लक्ष्मी माँ पृथ्वी पर भ्रमण करने आईं। रास्ते में उनके मन में एक इच्छा जागी: वे विष्णु जी और शिव जी की पूजा एक साथ, एक ही समय और एक ही स्थान पर करना चाहती थीं। पर दोनों की पूजा एक साथ कैसे हो, जब दोनों अलग-अलग अर्पण से प्रसन्न होते हैं? विष्णु जी को तुलसी प्रिय है, और शिव जी को बेलपत्र।
लक्ष्मी माँ ने इस पर विचार किया, और तब उन्हें ध्यान आया कि तुलसी और बेल, दोनों के गुण एक ही वृक्ष में मिलते हैं, आँवले में। तब उन्होंने आँवले के वृक्ष को विष्णु जी और शिव जी, दोनों का स्वरूप मानकर पूरे मन से उसकी पूजा की।
लक्ष्मी माँ की पूजा से प्रसन्न होकर विष्णु जी और शिव जी, दोनों उनके सामने प्रकट हुए। लक्ष्मी माँ ने आँवले के वृक्ष के नीचे भोजन बनाया और विष्णु जी और शिव जी को परोसा। फिर उन्होंने स्वयं वही भोजन प्रसाद के रूप में ग्रहण किया। जिस दिन यह हुआ, वह कार्तिक शुक्ल पक्ष की नवमी थी, और तभी से यह परंपरा चली आ रही है: इस नवमी को आँवले के वृक्ष की पूजा होती है, और उसकी छाया में भोजन बनाकर खाया जाता है।
इस दिन को अक्षय नवमी कहते हैं, वह नवमी जिसका क्षय नहीं होता, क्योंकि कहा जाता है कि इस दिन किया गया पूजन, जप और दान कभी घटता नहीं, और उसका पुण्य आने वाले जन्मों तक साथ चलता है। शास्त्र इसे सतयुग के आरंभ का दिन मानते हैं, जैसे अक्षय तृतीया त्रेता के आरंभ का दिन है।
आँवला विष्णु जी को प्रिय है, और कहा जाता है कि इस नवमी से कार्तिक पूर्णिमा तक विष्णु जी आँवले के वृक्ष में निवास करते हैं। इसीलिए इस दिन परिवार स्वयं वृक्ष के पास जाता है, उसकी जड़ में जल और दूध चढ़ाता है, उसके तने पर सूत लपेटता है, उसकी परिक्रमा करता है, और उसकी छाया में बैठता है।
इसी नवमी को कूष्माण्ड नवमी भी कहते हैं। कहा जाता है कि इस दिन विष्णु जी ने कूष्माण्डक नामक असुर का वध किया, और उससे कूष्माण्ड, कुम्हड़े की बेल, निकली। इसीलिए इस दिन पका हुआ कुम्हड़ा, उसके भीतर एक सिक्का रखकर, दान में दिया जाता है।
ओडिशा में इस दिन को अँळा नवमी कहते हैं, और वहाँ वर्ष के इसी एक दिन पुरी के पास साक्षीगोपाल के मंदिर में राधा रानी के चरणों के दर्शन होते हैं।
इसीलिए घर की स्त्रियाँ वही करती हैं जो लक्ष्मी माँ ने किया। सुबह के स्नान के बाद वे आँवले के वृक्ष के पास जाकर पूर्व की ओर मुख करके उसकी पूजा करती हैं। वे उसके नीचे भोजन बनाती हैं, पहले विष्णु जी और शिव जी को भोग लगाती हैं, और फिर पूरा परिवार वृक्ष की छाया में साथ बैठकर उसे प्रसाद के रूप में ग्रहण करता है।
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