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सामा-चकेवा · कथा

सामा, चकेवा और साम्ब

मिथिला की बहनें ये नौ रातें अपने भाइयों के लिए रखती हैं: छठ के पारण से कार्तिक पूर्णिमा तक वे मिट्टी से सामा, चकेवा और चुगला गढ़ती हैं, हर रात दीया जलाकर डाला लिए निकलती हैं और भाइयों के लिए गाती हैं। पूर्णिमा की रात सामा को बेटी की तरह विदा किया जाता है, अगले बरस फिर आने के बुलावे के साथ।

द्वापर युग में श्रीकृष्ण और जाम्बवती की एक पुत्री थी, जिसका नाम श्यामा था — मिथिला उसे सामा कहती है — और एक पुत्र, साम्ब। सामा सुशील और सरल थी, और उसके रूप की चर्चा दूर-दूर तक होती थी। भाई और बहन में बड़ा स्नेह था।

सामा का विवाह चारुवक्य से हुआ, जिसे गीत चकेवा कहते हैं। वह अक्सर वृंदावन के वन में ऋषियों के आश्रम जाती, और उनके सत्संग में दिन बिताती — अपने पति के लिए और अखंड सौभाग्य के लिए प्रार्थना करती।

द्वारका में एक व्यक्ति था, जिसे कथा चूड़क और गीत चुगला — यानी चुगली करने वाला — कहते हैं। वह सामा को स्वयं पाना चाहता था, और यह सह न सका कि वह किसी और की है। एक सुबह उसने सामा को आश्रम से लौटते देखा, और सीधा श्रीकृष्ण के पास गया। बोला, 'आपकी बेटी वन में किसी मुनि से मिलने जाती है। वह अपने पति के प्रति सच्ची नहीं है।'

श्रीकृष्ण क्रोधित हो गए, और बिना यह पूछे कि बात सच है या नहीं, उन्होंने अपनी बेटी को शाप दे दिया कि वह पक्षी बन जाए। उसी क्षण सामा पक्षी बन गई और उड़कर वृंदावन के वन में चली गई, और वहीं पेड़ों के बीच रहने लगी।

जब चारुवक्य को यह पता चला, तो उसका हृदय टूट गया। वह जानता था कि उसकी पत्नी निर्दोष है, और वह उसके बिना जी नहीं सकता था। उसने माँगा कि वह भी पक्षी बन जाए, ताकि उसके साथ रह सके; और इस तरह चकेवा भी पक्षी बन गया, और दोनों पक्षियों का जोड़ा बनकर वन में साथ रहने लगे।

फिर यह समाचार सामा के भाई साम्ब तक पहुँचा। वह बहन का दुख सह न सका। वह पिता के पास गया और शाप लौटा लेने की विनती की, पर श्रीकृष्ण ने कहा कि जो कह दिया गया, वह लौटाया नहीं जा सकता। तब साम्ब ने पूछा कि और किस उपाय से बहन मुक्त हो सकती है, और वह तपस्या में बैठ गया — इस संकल्प के साथ कि सामा और चकेवा को उनका अपना रूप लौटाकर रहेगा।

स्त्रियाँ उसकी सहायता को आईं। वे जानती थीं कि सामा सच्ची है, और हर संध्या इकट्ठा होकर गातीं — सामा और चकेवा के गीत, उस भाई के गीत जिसने बहन को नहीं छोड़ा, और उस चुगलखोर के विरुद्ध जिसके झूठ ने यह सब किया। उन्होंने मिट्टी से सामा और चकेवा, वृंदावन और ऋषियों को गढ़ा, और चुगला को भी गढ़ा, और उसकी मूँछों में आग लगा दी।

कार्तिक पूर्णिमा को साम्ब की तपस्या पूर्ण हुई। उसकी प्रार्थना स्वीकार हुई, और सामा तथा चकेवा को उनका अपना रूप लौटा दिया गया। चुगलखोर को उसके झूठ का दंड मिला।

इसीलिए मिथिला की बहनें ये रातें अपने भाइयों के लिए रखती हैं। छठ के पारण से कार्तिक पूर्णिमा तक वे मिट्टी से सामा, चकेवा और बाकी सबको गढ़ती हैं, भाइयों की लंबी उम्र के लिए गाती हैं, चुगला की मूँछें जलाती हैं, और पूर्णिमा की रात सामा को वैसे विदा करती हैं जैसे बेटी ससुराल जाती है — अगले बरस फिर आने के बुलावे के साथ।

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सामा-चकेवा

दिन

सामा-चकेवा