पुरट्टासी वह महीना है जिसमें पेरुमाळ — तमिल घरों में विष्णु जी को इसी नाम से पुकारा जाता है — कलियुग के कष्टों से लोगों को बचाने के लिए वेंकटाचलपति बनकर धरती पर उतरे, और तिरुपति की पहाड़ी पर अपना चरण रखा। इसीलिए यह महीना उनका है।
कहते हैं कि शनि देव का जन्म पुरट्टासी के एक शनिवार को हुआ था, इसलिए उनसे आने वाले कष्टों से बचने के लिए इस महीने घर-परिवार रक्षा करने वाले पेरुमाळ की शरण लेते हैं। स्वयं शनि देव ने पेरुमाळ के सामने तप किया, अपने दोषों से मुक्त होने और अपनी उग्रता को शांत करने के लिए। एक शनिवार को पेरुमाळ ने उन्हें दर्शन दिए और यह वर दिया: जो लोग पुरट्टासी के शनिवारों को व्रत रखकर पेरुमाळ की पूजा करें, शनि उन्हें कष्ट न दें। कुछ लोग इसे वेंकटेश्वर को दिया शनि देव का अपना वचन बताते हैं: जो शनिवार को उनकी पूजा करे, वह शनि के दिए कष्टों से बचा रहता है। इसलिए घर में इस महीने के शनिवार पेरुमाळ के होते हैं।
इस व्रत की महिमा बताने के लिए परिवार कुम्हार भीम की कथा सुनाते हैं। उन दिनों राजा तोंडैमान, जिन्होंने तिरुपति में वेंकटेश्वर का पहला मंदिर बनवाया था, रोज़ पूजा करते थे। उनके पुजारी एक हज़ार आठ नाम बोलते, और हर नाम पर राजा भगवान के चरणों में सोने का एक तुलसी पत्र रखते; शनिवार को वे उनके गले में सोने के फूलों की माला पहनाते। धीरे-धीरे राजा को लगने लगा कि जो वे पेरुमाळ को चढ़ाते हैं, वैसा कोई नहीं चढ़ा सकता, और उन्हें इसका गर्व हो गया।
तिरुपति में भीम नाम का एक कुम्हार रहता था, जो मंदिर के काम आने वाले मिट्टी के बर्तन बनाता था। वह पेरुमाळ से प्रेम करता था, और उसने जीवन भर शनिवार का व्रत रखने का संकल्प लिया था। पर वह गरीब था, और काम उसे छोड़ता ही न था। शनिवार को उसे मंदिर जाने का समय न मिलता, और जब कभी जाता भी, तो पूजा की विधि न जानता; बस इतना कहकर लौट आता: 'पेरुमाळ, तुम ही सब कुछ हो।'
एक दिन उसके मन में विचार आया: मैं पेरुमाळ के पास नहीं जा सकता, तो क्यों न पेरुमाळ को यहीं बुला लूँ? उसने झटपट मिट्टी से पेरुमाळ की एक छोटी मूर्ति बना ली; तिरुमला की कथा में वह लकड़ी में गढ़ी मूर्ति है। फूल ख़रीदने के पैसे उसके पास नहीं थे, इसलिए दिन भर के काम के बाद बची मिट्टी से वह छोटे-छोटे फूल बनाता, उन्हें पिरोकर माला बनाता, मूर्ति के गले में पहनाता, और पूरे प्रेम से पूजा करता।
अगले शनिवार राजा तोंडैमान मंदिर आए और ठिठक गए। वेंकटेश्वर के गले में मिट्टी के फूलों की माला लटक रही थी; उनके चरणों में मिट्टी के फूल पड़े थे, और सोने के तुलसी पत्र उनके पीछे खिसका दिए गए थे। राजा कुछ समझ न पाए, और सोचने लगे कि कहीं पुजारियों से कोई भूल तो नहीं हुई।
उसी रात पेरुमाळ ने स्वप्न में आकर उन्हें सारी बात बताई। तिरुमला में इसे भगवान की अपनी वाणी के रूप में कहा जाता है, जो मंदिर में गूँजी: 'मुझे बहुत से लोग प्रिय हैं। उनमें एक है भीम, एक कुम्हार, जो उत्तर की ओर एक गाँव में रहता है। उसके पास लकड़ी में गढ़ी मेरी एक मूर्ति है, वह मिट्टी के फूल बनाकर मुझे चढ़ाता है, और वे मुझे प्रिय हैं। यह मत सोचो कि केवल तुम ही मुझे प्रिय हो।' राजा की आँखें खुल गईं।
राजा ने अपना राजसी ठाट-बाट छोड़ा, पैदल चलकर कुम्हार के गाँव पहुँचे, और पेरुमाळ के उस प्रिय के आगे सिर झुकाया। रास्ते की थकान से वे वहीं मूर्छित होकर गिर पड़े। राजा ने भीम को जितना धन चाहिए था, सब दिया; पर कुम्हार उस धन से चकाचौंध नहीं हुआ, और पहले की तरह पेरुमाळ की सेवा करता रहा।
तब स्वयं वेंकटेश्वर कुम्हार के घर प्रकट हुए; कुछ कहते हैं, वे गरुड़ पर आए। भीम ने उनसे रुककर भोजन करने की विनती की, और वेंकटेश्वर ने प्रेम से मिट्टी की थाली में परोसे रागी के गोले खाए। उन्होंने भीम और उसकी पत्नी पर कृपा की, और समय पूरा होने पर दोनों वैकुंठ पहुँचे; तिरुमला में कहते हैं कि आकाश से एक रथ उतरा और कुम्हार और उसकी पत्नी को सशरीर स्वर्ग ले गया।
पेरुमाळ की अपनी आज्ञा से, उस कुम्हार के सम्मान में, तिरुपति में सात पहाड़ियों वाले एळुमलैयान को आज भी मिट्टी के पात्र में नैवेद्य चढ़ाया जाता है। तिरुमला में वह एक टूटा हुआ मिट्टी का पात्र होता है, हर दिन नया, जिसे 'ओडु' कहते हैं, और केवल उसी में रखा भोग भीतर ले जाकर उनके सामने रखा जाता है। भीम आगे चलकर कुरुव नंबि के नाम से जाने गए।
यह कथा परिवार से सीधी बात कहती है: वेंकटेश्वर हृदय देखते हैं, सोना नहीं; कोई कौन है और उसके पास क्या है, इससे कुछ नहीं बदलता। जैसे गीता में कृष्ण कहते हैं, प्रेम से दिया एक पत्ता भी स्वीकार होता है। इसलिए इन शनिवारों को जो घर तिरुपति नहीं जा पाता, वह जो उसके पास है वही उनके चित्र के सामने रख देता है; और जहाँ परिवार 'गोविंदा' कहता है, वहाँ पेरुमाळ स्वयं पधारते हैं।
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