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पितृ पक्ष · कथा

स्वर्ग में सोना और धरती पर राख

एक पक्ष जब घर उनकी ओर मुड़ता है जो उससे पहले आए। हर सुबह उनका नाम लेकर जल और तिल दिए जाते हैं, और जिस तिथि को जो गया उस दिन उसका श्राद्ध होता है — पिंड, गाय और कौए का भाग, और परिवार के खाने से पहले किसी अतिथि को भोजन।

महाभारत के कर्ण बड़े दानी थे। जो भी उनके द्वार पर सहायता माँगने आया, उसे उन्होंने कभी खाली हाथ नहीं लौटाया। जब इंद्र ब्राह्मण का वेश धरकर आए, तो कर्ण ने अपने शरीर से जुड़ा कवच तक उतारकर दे दिया। कुरुक्षेत्र में वीरगति पाकर वे स्वर्ग गए।

स्वर्ग में उन्हें भूख लगी। जब उन्होंने भोजन माँगा, तो उनके आगे थाल भरकर सोना और गहने रख दिए गए। कर्ण की समझ में कुछ नहीं आया। उन्होंने कहा, 'भूख को अन्न चाहिए, सोना नहीं।' और उन्होंने देवराज इंद्र से पूछा कि उन्हें खाने के लिए सोना क्यों दिया जा रहा है।

इंद्र ने कहा, 'कर्ण, जीवन भर तुमने जो भी माँगने आया उसे सोना दिया। पर तुमने किसी को मुट्ठी भर अन्न नहीं दिया, और श्राद्ध में अपने पितरों को कभी भोजन नहीं दिया। तुमने जो दिया, यहाँ तुम्हें वही मिलता है।'

कर्ण ने कहा, 'मुझे तो यह भी पता नहीं था कि मुझे जन्म देने वाले कौन थे, और मेरे पितर कौन थे। जो मेरे पास आते थे, वे सहायता माँगते थे; किसी ने कभी नहीं कहा कि वह भूखा है। इसलिए मैंने सोना दिया। इससे आगे मैं कुछ नहीं जानता था।'

तब कर्ण को अपनी भूल सुधारने का अवसर दिया गया, और वे सोलह दिन के लिए फिर धरती पर भेजे गए। वहाँ उन्होंने अपने पितरों को याद करते हुए उनका श्राद्ध किया, तर्पण किया, और गरीबों को जितना हो सका उतना अन्न दिया। फिर वे स्वर्ग लौटे, और इस बार वहाँ उन्हें भोजन मिला। वही सोलह दिन पितृ पक्ष कहलाए।

पितृ पक्ष में एक लोककथा भी सुनाई जाती है। जोगे और भोगे दो भाई थे, जो अलग-अलग रहते थे। जोगे धनी था और भोगे निर्धन, पर दोनों में बड़ा प्रेम था। जोगे की पत्नी को अपने धन का अभिमान था, और भोगे की पत्नी बड़ी सरल मन की थी।

पितृ पक्ष आया तो जोगे की पत्नी ने उससे पितरों का श्राद्ध करने को कहा। जोगे इसे व्यर्थ का काम समझकर टालने लगा। पर उसकी पत्नी जानती थी कि श्राद्ध न हुआ तो लोग बातें बनाएँगे; और उसे अपने मायके वालों को दावत पर बुलाकर अपनी शान दिखाने का यह अच्छा अवसर लगा। वह बोली, 'शायद आप मेरी परेशानी सोचकर मना कर रहे हैं, पर मुझे कोई परेशानी नहीं होगी। मैं भोगे की पत्नी को बुला लूँगी, हम दोनों मिलकर सारा काम कर लेंगी।' फिर उसने जोगे को अपने मायके न्योता देने भेज दिया।

अगले दिन उसके बुलाने पर भोगे की पत्नी सुबह-सवेरे आई और काम में जुट गई। उसने रसोई तैयार की, अनेक पकवान बनाए, और सारा काम निपटाकर अपने घर लौट गई — आखिर उसे भी तो अपने पितरों का श्राद्ध और तर्पण करना था। न जोगे की पत्नी ने उसे रोका, न वह रुकी।

जल्दी ही दोपहर हो गई और पितर धरती पर उतरे। जोगे-भोगे के पितर पहले जोगे के घर गए। वहाँ उन्होंने देखा कि उसके ससुराल वाले भोजन पर जुटे हैं। निराश होकर वे भोगे के घर गए। वहाँ क्या था? पितरों के नाम पर केवल एक अगियारी दे दी गई थी। पितरों ने उसकी राख चाटी, और भूखे ही नदी के तट पर जा पहुँचे।

थोड़ी देर में सारे पितर नदी के तट पर इकट्ठे हो गए और अपने-अपने घर के श्राद्ध की बड़ाई करने लगे। जोगे-भोगे के पितरों ने भी अपनी बात सुनाई। फिर वे सोचने लगे — अगर भोगे समर्थ होता तो शायद उन्हें भूखा न रहना पड़ता; पर भोगे के घर में तो दो जून की रोटी भी नहीं थी। यह सोचकर उन्हें भोगे पर दया आ गई, और वे अचानक नाच-नाचकर गाने लगे, 'भोगे के घर धन हो जाए, भोगे के घर धन हो जाए।'

साँझ होने को आई। भोगे के बच्चों को दिन भर खाने को कुछ नहीं मिला था। उन्होंने माँ से कहा, 'भूख लगी है।' उन्हें टालने के लिए भोगे की पत्नी बोली, 'जाओ, आँगन में हौदी औंधी रखी है। उसे खोल लो, और जो मिले, बाँटकर खा लेना।' बच्चे वहाँ पहुँचे तो देखा कि हौदी मोहरों से भरी पड़ी है। वे दौड़कर माँ के पास आए और सब बताया। आँगन में आकर भोगे की पत्नी ने यह देखा तो वह भी हैरान रह गई।

इस तरह भोगे भी धनी हो गया, पर धन पाकर उसे घमंड नहीं हुआ। अगले वर्ष पितृ पक्ष फिर आया। श्राद्ध के दिन भोगे की पत्नी ने छप्पन प्रकार के व्यंजन बनाए। उन्होंने ब्राह्मणों को बुलाकर श्राद्ध किया, भोजन कराया और दक्षिणा दी, और जेठ-जेठानी को आदर से सोने-चाँदी के बर्तनों में भोजन कराया। इससे पितर बहुत प्रसन्न हुए, और तृप्त हुए।

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पितृ पक्ष

दिन

पितृ पक्ष