1. त्योहार
  2. श्री नारायण गुरु समाधि
  3. कथा

श्री नारायण गुरु समाधि · कथा

परम शांति

कन्नी की पाँचवीं तिथि को वे गए, और केरल उनका एक वाक्य फिर कहकर यह दिन रखता है: मनुष्य के लिए एक जाति, एक धर्म, एक ईश्वर। घर सुबह भजन गाते हैं और उनके लेखन का एक पृष्ठ पढ़ते हैं, और उनके बनाए मंदिर इसे अपना दिन मानते हैं।

साल उन्नीस सौ अट्ठाईस की बात है, श्री नारायण गुरु अपने जीवन के अंतिम वर्षों में विश्राम कर रहे थे। उनके शिष्य टी.के. माधवन उनके पास एक सच्ची विनती लेकर आए। उन्होंने गुरु जी से कोट्टायम जिले के नागम्पडम में एसएनडीपी योगम की एक विशेष सभा में शामिल होने को कहा। गुरु जी मान गए और उन्होंने यात्रा की। यह उनकी आखिरी सार्वजनिक सभा बन गई। सभा में, वह लोगों के सामने बैठे और संस्था की एक सौ आठ शाखाओं के लिए पंजीकरण प्रमाण पत्र बांटे। उन्होंने लोगों के काम के लिए अपना समय दिया, और यह सुनिश्चित किया कि शाखाएं ठीक से बनें।

काम पूरा होने के बाद, गुरु जी नागम्पडम मंदिर में आराम करने गए। दिन शांत था। दो भक्त, वल्लभासेरी गोविंदन वैद्यन और टी.के. कृष्णन, उस जगह आए जहां वह आराम कर रहे थे। उन्होंने हाथ जोड़े और अपने मन की बात साझा की। उन्होंने पूछा कि क्या वे शिवगिरि के लिए वार्षिक तीर्थयात्रा शुरू कर सकते हैं। श्री नारायण गुरु ने उनकी विनती सुनी। उन्होंने उन्हें अपनी अनुमति दी और उस यात्रा के लिए अपना आशीर्वाद दिया जो वे शुरू करना चाहते थे।

इस दिन के कुछ ही समय बाद, गुरु जी को एक गंभीर बीमारी ने घेर लिया। उन्हें प्रोस्टेट की एक गंभीर बीमारी हो गई जिससे पेशाब रुकने के कारण बहुत दर्द होता था। दर्द बहुत ज्यादा था, और उनका शरीर कमजोर हो गया। इस कष्ट से राहत पाने के लिए, वह नागम्पडम से निकलकर वायकॉम के वेल्लूर मठ चले गए। उनके शिष्य भी उनके साथ गए, इस उम्मीद में कि जगह बदलने और सही देखभाल से उनकी हालत में सुधार होगा।

वेल्लूर मठ में, उनकी बीमारी की खबर सुनकर वैद्य उनके पास आए। डॉक्टर राव नाम के एक वैद्य आए और उन्होंने ध्यान से उनका इलाज किया। बाद में, डॉक्टर राघवन भी अपनी चिकित्सा सेवा देने पहुंचे, जो गुरु जी के भक्त डॉक्टर कृष्णन के बेटे थे। डॉक्टरों ने अपनी पूरी कोशिश की। उन्होंने उन्हें दवा दी और उनकी देखभाल की, लेकिन इलाज से उनके शरीर को कोई शारीरिक राहत नहीं मिली। दर्द बना रहा।

यह देखकर कि दवा शरीर को ठीक नहीं कर सकती, गुरु जी ने अपने आश्रम लौटने का फैसला किया। उन्होंने वर्कला में शिवगिरि मठ वापस जाने की यात्रा की। दिन बीतते गए और बीस सितंबर का दिन आ गया, जो कन्नी महीने का पांचवां दिन था। इस दिन, आश्रम का माहौल एकदम शांत था। गुरु जी जानते थे कि उनके भौतिक शरीर का समय अब समाप्त होने वाला है।

एक शिष्य गुरु जी को देखने के लिए चुपचाप उनके कमरे में गया। गुरु जी ने शिष्य की ओर देखा। उन्होंने उस शांत कमरे में साफ शब्दों में कहा कि राहु ने उन्हें ग्रस लिया है, और अब जाने का समय आ गया है। शिष्य ने ये शब्द सुने और समझ गया कि विदाई का समय पास है।

उसी दोपहर बाद, बाहर की रोशनी बदलने लगी। गुरु जी ने अपने पास जमा हुए शिष्यों से फिर बात की। उन्होंने उनसे कहा कि उन्हें उठना चाहिए, क्योंकि उन्हें एक परम शांति महसूस हो रही थी। उनके शिष्य आगे आए और धीरे से उन्हें हिलने में मदद की। उन्होंने उनके शरीर को सहारा दिया और उन्हें बिस्तर पर उठकर बैठने में मदद की। उन्होंने उनके पैरों को मोड़कर पद्मासन की मुद्रा में रख दिया।

माम्बलम वैद्यनानंद स्वामी ठीक बिस्तर के पास बैठ गए। उन्होंने योग वासिष्ठ के प्राचीन पन्ने खोले। उन्होंने इस जीवन में मुक्ति वाले अध्याय को निकाला। उन्होंने उस शांत कमरे में शब्दों को जोर से पढ़ना शुरू किया। उस ग्रंथ में आत्मा और सच्ची स्वतंत्रता के मार्ग के बारे में बताया गया था। पढ़ते हुए शब्दों की आवाज शांति से बैठे गुरु जी के चारों ओर गूंजने लगी।

ग्रंथ का पाठ चलता रहा। फिर गुरु जी ने उन शिष्यों की ओर देखा जो वहां खड़े थे। श्रीधर्मतीर्थर स्वामी, नरसिम्हास्वामी, सुगुनानंद स्वामी और वैद्यनानंद स्वामी वहां मौजूद थे। गुरु जी ने उन्हें अपनी लिखी प्रार्थना, दैव दशकम् का पाठ करने को कहा। शिष्यों ने भगवान के उन दस श्लोकों का जप करना शुरू कर दिया। उनकी आवाजें एक साथ उठीं, जिनमें वे शब्द थे जो खुद गुरु जी ने लिखे थे।

जप प्रार्थना के अंतिम श्लोकों तक पहुंच गया। जैसे ही शिष्यों ने आखिरी शब्द कहे, श्री नारायण गुरु ने धीरे से अपनी आंखें बंद कर लीं। उन्होंने अपने मन को भीतर की ओर खींचा और गहरे ध्यान में डूब गए। बिना किसी कष्ट के, उन्होंने अपना भौतिक शरीर त्याग दिया और अपनी अंतिम शांति प्राप्त कर ली।

उनके जाते ही, वह सन्नाटा टूट गया। श्री नारायण मठ के मंदिर की घंटियां बजने लगीं। वे लगातार बजती रहीं, और उनकी साफ, भारी आवाज पूरे वर्कला में गूंजने लगी। घंटियों ने दुनिया को बता दिया कि गुरु जी विदा हो गए हैं। यह आवाज सुनकर, हजारों लोग अपने घरों से निकल पड़े और उन्हें आखिरी बार देखने के लिए शिवगिरि मठ की ओर उमड़ पड़े। उनके भौतिक शरीर को शिवगिरि पहाड़ी की चोटी पर ले जाया गया और वहां समाधि दी गई, जहां उनके विश्राम स्थल के पास बैठने के लिए यात्रियों के वास्ते एक मंडप बनाया गया।

नारायण गुरुकुल आंदोलन से जुड़े परिवार इसे अलग तरह से बताते हैं। वे उनके अंतिम दिनों की कथा नहीं पढ़ते। इसके बजाय, वे बैठकर उनकी दार्शनिक रचनाएं, आत्मोपदेश शतकम् या दर्शन माला पढ़ते हैं। वे पढ़ते हैं कि कैसे यह भौतिक दुनिया एक माया है और कैसे व्यक्ति की आत्मा और ब्रह्मांड एक हैं, जो आध्यात्मिक ज्ञान के चरणों को दर्शाते हैं।

जो लोग उनके अंतिम दिनों की कथा पढ़ते हैं, वे उनकी प्रार्थना की आखिरी पंक्तियां कहकर इसे पूरा करते हैं। वे कहते हैं, आपकी महिमा के उस गहरे सागर में, हम सब एक साथ डूब जाएं, और हमेशा के लिए उसी में निवास करें।

[object Object]

श्री नारायण गुरु समाधि

दिन

श्री नारायण गुरु समाधि