सूत जी ने ऋषियों से कहा — पूर्वकाल में कैलास पर ऋषियों ने भगवान कार्तिकेय से भगवती के ऐसे व्रत के बारे में पूछा, जिसके करने से मनचाही वस्तुएँ अनायास मिल जाएँ। कार्तिकेय जी बोले — 'तुमने अच्छा पूछा। महादेवी के उस व्रत का माहात्म्य सुनो, जो सब कल्याण करता है।'
भृगुक्षेत्र में गौतम नाम के एक विद्वान और धनवान ब्राह्मण रहते थे। वृद्धावस्था में उनकी पत्नी ने दो पुत्रों को जन्म दिया — श्रीपति और गोपति। कुछ समय बाद गौतम का देहांत हो गया, और उनकी पत्नी भी उनके साथ अग्नि में प्रवेश कर गईं। लोभ में आकर बालकों के सौतेले चाचा ने दोनों भाइयों का सारा धन हड़प लिया। यज्ञोपवीत के बाद जब बालकों ने उससे पिता का धन माँगा, तो वह बोला — 'वह धन तो कब का नष्ट हो गया,' और उन्हें घर से निकाल दिया। किसी से कुछ कहे बिना दोनों भाई उत्तर दिशा की ओर चल पड़े।
भिक्षा से पेट भरते हुए वे संध्या के समय विशालापुरी पहुँचे, और भूख से व्याकुल होकर विवेक नाम के एक ब्राह्मण के आँगन में बैठ गए। विवेक उस समय अपना बलिवैश्वदेव पूरा कर रहे थे। उन्होंने बालकों का आदर-सत्कार किया, उन्हें भोजन कराया, श्रीपति से उनकी व्यथा सुनी, और उन्हें अपने घर रखकर दूसरे शिष्यों के साथ वेद पढ़ाने लगे।
शरद ऋतु में आचार्य विवेक एक व्रत कर रहे थे। बालकों के पूछने पर वे बोले — 'यह उपांग ललिता देवी का व्रत है। इससे सब मनोरथ पूरे होते हैं। जिसे विद्या, धन या पुत्र की कामना हो, उसे यह व्रत करना चाहिए।' पहले वर्ष दोनों भाइयों ने गुरु के साथ यह व्रत किया और वेदों और शास्त्रों में निपुण हो गए। दूसरे वर्ष उन्होंने विवाह की कामना से व्रत किया, और आचार्य विवेक ने अपनी कन्या गुणवती का विवाह श्रीपति से कर दिया। तीसरे वर्ष उन्होंने धन की कामना से व्रत किया, और उन्हें नाना प्रकार का धन मिला।
व्रत के पुण्य से चाचा का हृदय भी बदल गया। सब लोग उसी की निंदा करते थे, इसलिए वह बालकों को खोजने निकला, और एक नगर में उसकी भेंट आचार्य विवेक से हुई, जो दोनों को उनके गाँव पहुँचाने आ रहे थे। आचार्य ने कहा — 'ये तुम्हारे भाई के पुत्र हैं, जिनका धन तुमने हर लिया था। मैंने इन्हें पाला और पढ़ाया है।' चाचा रोते हुए दोनों से गले मिला, और समय आने पर उसने उनके पिता का धन लौटा दिया। दोनों भाई अपने घर आ गए, और श्रीपति ने गोपति का विवाह किया।
श्रीपति श्रद्धा से दान देता और हर दिन ब्राह्मणों को भोजन कराता था, पर गोपति धन खर्च करने से डरता था। पत्नी की सलाह पर उसने अपना भाग लेकर अलग घर बसा लिया और भोगों में डूब गया। धन के मद में वह प्रमादी हो गया और उसने उपांग ललिता देवी की पूजा छोड़ दी। थोड़े ही समय में उसका धन नष्ट हो गया। जब खाने को कुछ न रहा, तो वह और उसकी पत्नी हर दिन श्रीपति के घर भोजन करने जाने लगे, जहाँ बहुत से ब्राह्मण भोजन करते थे।
एक दिन सब आसन भर चुके थे, और भूखा गोपति भंडारगृह के पास बैठ गया। श्रीपति की पत्नी गुणवती ने उसे रोका — 'यहाँ मत बैठो, नहीं तो सारा अन्न जूठा हो जाएगा। इन लोगों के खा लेने के बाद तुम भी खा लेना।' गोपति बिना खाए घर लौट आया और पत्नी से बोला — 'भाई का कोई दोष नहीं। हम दोनों ने गुरु के घर उपांग ललिता देवी का व्रत किया था, और उसी से हमें विद्या और धन मिला। अभिमान में मैंने वह व्रत छोड़ दिया, पर भाई उसे करता रहा। इसी से इतना खर्च करने पर भी लक्ष्मी उसके घर में बसती हैं। अब मैं उन देवी के दर्शन करके ही भोजन करूँगा।'
वह बिना भोजन किए घर से निकल गया। पाँच दिन तक वह वनों और नदियों को पार करता, लोगों से देवी का स्थान पूछता रहा, और अंत में भूख-प्यास से मूर्च्छित हो गया। उसकी दशा देखकर देवी को उस पर दया आई। होश आने पर एक ग्वाले ने उसे बताया — 'यह उपांग नगर है, यहाँ के राजा का नाम भी उपांग है, और यहाँ उपांग ललिता देवी का मंदिर है।' मंदिर में गोपति ने देवी को दंडवत प्रणाम करके प्रार्थना की — 'हे माँ! मैं अपराधी हूँ, मुझे क्षमा कीजिए, मैं आपकी शरण में हूँ,' और वहीं भूखा ही सो गया।
स्वप्न में देवी ने दर्शन देकर कहा — 'उठो, गोपति! मैं तुम्हारी भक्ति से प्रसन्न हूँ। राजा उपांग के पास जाकर उनसे मेरी पूजा की पिटारी का ढक्कन माँगना। उसे घर ले जाकर उसी ढक्कन की पूजा करना; तुम्हें परम सुख मिलेगा।' सुबह राजा ने उसे देवी की पूजा का करंड और पूजा की दूसरी सामग्री दे दी। गोपति ने घर आकर ढक्कन की पूजा की, व्रत का पारण किया, और फिर हर दिन उस ढक्कन की पूजा करने लगा। जल्दी ही उसके घर फिर समृद्धि आ गई।
उसके घर ललिता नाम की एक कन्या जन्मी। बचपन में वह हर दिन खेलने जाते समय वह ढक्कन साथ ले जाती थी। बड़ी होने पर एक दिन वह सखियों के साथ गंगा जी में खेल रही थी, तभी सर्पदंश से मरे एक युवक का शव बहता हुआ आया। ललिता ने देवी के ढक्कन से उस पर जल डाला, और देवी की कृपा से वह जी उठा — गुणराशि नाम का एक ब्राह्मण युवक। ललिता ने उसे वर के रूप में चुना और पिता से उसे माँगने का उपाय बताया। गोपति ने गुणराशि की विद्या, कुल और शील की परख करके दोनों का विवाह कर दिया, और अपने घर के पास उनके लिए घर बनवा दिया।
ललिता ढक्कन अपने साथ ससुराल ले गई और हर दिन उसकी पूजा करती रही, जिससे गुणराशि का घर धन से भर गया। गोपति के घर ढक्कन नहीं रहा, इसलिए वहाँ पूजा भी नहीं हुई, और उसकी संपत्ति फिर नष्ट हो गई। ललिता की माँ ने बार-बार ढक्कन माँगा, पर ललिता ने उसे नहीं लौटाया। तब माँ ने एक दिन, जब गुणराशि होम की समिधा लेने वन में गया था, उसकी हत्या करवा दी। पर देवी की कृपा से गुणराशि सकुशल घर लौट आया। उसे देखकर माँ लज्जित हुई, बार-बार धरती पर माथा टेककर उसने अपना पाप कह सुनाया, और गुणराशि के बताए प्रायश्चित किए।
श्रीपति के घर लक्ष्मी को सदा बसते देखकर गोपति ने भाई से इसका कारण पूछा। श्रीपति ने उसे गुरु के घर किए उपांग ललिता व्रत की याद दिलाई। भाई के कहे अनुसार गोपति ने फिर से विधिपूर्वक व्रत किया, और उसे सुख, समृद्धि और संतान मिली।
कार्तिकेय जी ने ऋषियों से कहा — 'इसलिए उपांग ललिता देवी की आराधना करनी चाहिए। जो इस व्रत को श्रद्धा से करता है, उसे वह मिलता है जो उसके पास नहीं: पुत्रहीन को पुत्र, धन चाहने वाले को धन, स्त्री को सौभाग्य और कन्या को श्रेष्ठ वर; और व्रती को विजय, आरोग्य और सब सुख। इस कथा को सुनने से सुख और समृद्धि मिलती है।' इस प्रकार स्कंद पुराण में कही गई उपांग ललिता व्रत की कथा पूरी होती है।
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