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कृष्ण जन्माष्टमी · कथा

जिस नदी ने जाने दिया

उनका जन्म आधी रात को कारागार में हुआ, इसलिए घर सुबह की नहीं, आधी रात की प्रतीक्षा करता है। व्रत तभी खुलता है जब शंख बजता है, उससे पहले नहीं।

आठवीं संतान वही थी जिसकी कंस प्रतीक्षा कर रहा था। माता-पिता कारागार में थे और द्वार पर पहरा।

आधी रात को कारागार का सब कुछ एक साथ सो गया — पहरेदार, ताले, बेड़ियाँ। वसुदेव ने बालक को टोकरी में उठाया और बाहर निकल आए।

यमुना उफान पर थी। वे फिर भी उतरे, टोकरी सिर पर उठाए, और जल कंठ तक आया और फिर — जैसा कहा जाता है — बालक के चरण को छूकर उतर गया।

उन्होंने उसे गोकुल में छोड़ा, वहाँ उसी रात जन्मी कन्या को उठाया, और लौटकर उसी कोठरी में चले गए और द्वार अपने पीछे बंद हो जाने दिया।

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