यह मार्गऴी का अंतिम दिन है, सबसे ठंडा महीना, और आग उसी अँधेरे में जलती है — पुरानी चटाइयाँ, टूटी टोकरियाँ, चटका हुआ बर्तन, वे चीज़ें जो साल भर 'कभी काम आएँगी' कहकर रखी रहीं।
उसी सुबह इंद्र को उस वर्षा के लिए धन्यवाद दिया जाता है जिससे फ़सल हुई, और फिर घर बुहारा जाता है और द्वार पर नया कोलम बनता है।
कुछ भी क्रोध में नहीं फेंका जाता। यह उस घड़ी होता है जब घर देख सकता है कि उसने क्या बरतना छोड़ दिया है — और सूर्योदय तक जगह बन जाती है।
